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रईस अमरोहवी: अल्फ़ाज़ से फ़िक्र की दुनिया रौशन करने वाले शायर 

उर्दू अदब की दुनिया में रईस अमरोहवी का नाम बड़े एहतराम से लिया जाता है। उनका असली नाम सैयद मुहम्मद मेहदी था। उनकी पैदाइश सितंबर 1914 में उत्तर प्रदेश के अमरोहा में हुयी। वे सिर्फ़ एक शायर ही नहीं, बल्कि लेखक, पत्रकार, मनोविज्ञान और रूहानियत के शोधकर्ता भी थे। उनकी शख़्सियत में इल्म, तफ़क्कुर और अदब का ख़ूबसूरत संगम दिखाई देता है।

रईस अमरोहवी ऐसे दौर के शायर थे जिन्होंने पारंपरिक उर्दू शायरी में नई सोच और नए अंदाज़ को जगह दी। वे ख़ास तौर पर क़िता (चौपाई) लिखने के लिए मशहूर हुए। पाकिस्तान के मशहूर अख़बार ‘जंग’ में उन्होंने करीब 40 साल  तक रोज़ाना एक क़िता लिखा। उनके अशआर समाज, इंसानियत, सियासत और ज़िंदगी की गहरी सच्चाइयों को बेहद सादगी से बयान करते हैं।

आज़ादी और बंटवारे के बाद 1947 में वे पाकिस्तान चले गए और कराची को अपना ठिकाना बनाया। वहां उन्होंने उर्दू ज़बान की तरक़्क़ी और उसके फ़रोग़ के लिए अहम काम किया। उन्होंने ‘रईस अकादमी’ की भी स्थापना की, जहां नौजवान लेखकों और शायरों को अदब, अख़लाक़ और इंसानी क़द्रों की तालीम दी जाती थी।

सिर्फ़ शायरी ही नहीं, रईस अमरोहवी की दिलचस्पी मनोविज्ञान, रूहानियत, ध्यान, योग और परामनोविज्ञान जैसे विषयों में भी थी। उन्होंने इन विषयों पर तीस से ज़्यादा किताबें लिखीं। उनकी किताबें इस बात का सबूत हैं कि वे इंसानी ज़ेहन और रूह की गहराइयों को समझने की लगातार कोशिश करते रहे।

1972 में सिंध में भाषा विवाद के दौरान उन्होंने अपनी मशहूर नज़्म “उर्दू का जनाज़ा है, ज़रा धूम से निकले” लिखी, जिसने उन्हें उर्दू ज़बान के मज़बूत हिमायती के रूप में पहचान दिलाई। वे चाहते थे कि उर्दू सिर्फ़ एक भाषा नहीं, बल्कि तहज़ीब और संस्कृति की पहचान बनकर ज़िंदा रहे।

रईस अमरोहवी मशहूर शायर जौन एलिया के बड़े भाई थे। उनका पूरा परिवार इल्म और अदब से जुड़ा हुआ था, इसलिए उन्हें अक्सर “शायरों का ख़ानदान” भी कहा जाता है।

उनकी शायरी में फ़लसफ़ा, इंसान की तलाश, ख़ुदी और ज़िंदगी के मायने बार-बार नज़र आते हैं। उनके कुछ अशआर आज भी लोगों के दिलों में बसते हैं। 

“आदमी की तलाश में है ख़ुदा,
आदमी को ख़ुदा नहीं मिलता।”

“अपने को तलाश कर रहा हूं,
अपनी ही तलब से डर रहा हूं।”

इन दो मिसरों में इंसान की अंदरूनी जंग और ख़ुद को पहचानने की तड़प साफ़ दिखाई देती है।

22 सितंबर 1988 को एक चरमपंथी हमले में उनकी हत्या कर दी गई। उनका जाना उर्दू अदब के लिए एक बड़ा नुक़सान था, लेकिन उनकी शायरी, किताबें और फ़िक्र आज भी ज़िंदा हैं।

रईस अमरोहवी सिर्फ़ एक शायर नहीं थे, बल्कि एक ऐसे फ़िक्रमंद इंसान थे जिन्होंने अपने क़लम से समाज, इंसानियत और रूहानी दुनिया के कई पहलुओं को रोशन किया। उनकी रचनाएं आज भी यह पैग़ाम देती हैं कि सच्चा अदब वही है जो इंसान को सोचने, समझने और अपने अंदर झांकने की राह दिखाए।

ये भी पढ़ें: क़मर जलालाबादी: जिनकी क़लम से निकले सदाबहार नग़मे 

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