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दिलजीत दोसांझ की फ़िल्म ‘सतलुज’ और भाई जसवंत सिंह खालड़ा: पंजाब के पुराने ज़ख्मों को ज़िम्मेदारी से समझने की ज़रूरत

दिलजीत दोसांझ की फ़िल्म “सतलुज” (जिसे पहले “पंजाब ’95” के नाम से जाना जाता था) डिजिटल रिलीज़ के महज़ 48 घंटे के अंदर ZEE5 से हटा दी गई। इसके बाद पंजाब के इतिहास के एक बेहद संवेदनशील दौर पर फिर से बहस शुरू हो गई।

यह फ़िल्म भाई जसवंत सिंह खालड़ा की ज़िंदगी पर आधारित है। उन्होंने 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में कथित तौर पर लावारिस और अज्ञात लोगों के अंतिम संस्कार से जुड़े मामलों की जांच की थी। फ़िल्म हटने के बाद राजनीतिक दलों, सिख संगठनों और अभिव्यक्ति की आज़ादी के समर्थकों ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दीं। कुछ लोगों का कहना है कि फ़िल्म सच सामने लाती है, जबकि कुछ का मानना है कि इसमें इतिहास का सिर्फ़ एक पक्ष दिखाया गया है।

मेरा नज़रिया

मैंने इस मुद्दे पर बरखा दत्त के शो “द मोजो स्टोरी” में भी अपनी राय रखी। मैं सिर्फ़ एक टिप्पणीकार के तौर पर नहीं, बल्कि उस दौर का प्रत्यक्ष गवाह होने के नाते बोल रहा था।

मैं 1992 से 1996 तक अमृतसर का डिप्टी कमिश्नर रहा। भाई जसवंत सिंह खालड़ा मामले में सीबीआई की विशेष अदालत में मैं गवाह भी रहा, जहां छह पंजाब पुलिस अधिकारियों को सज़ा सुनाई गई।

भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी पूरी तरह असीमित नहीं

भारत का संविधान हर नागरिक को बोलने और अपनी बात रखने का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार पूरी तरह असीमित नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और दूसरे संवैधानिक कारणों के आधार पर इस पर उचित पाबंदियां लगाई जा सकती हैं।

बताया जाता है कि सेंट्रल बोर्ड ऑफ फ़िल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) ने इस फ़िल्म में 120 से ज़्यादा बदलाव सुझाए थे। मामला अदालत तक भी पहुंचा, लेकिन बाद में याचिका वापस ले ली गई। इसके बाद फ़िल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ हुई।

भाई खालड़ा की जांच को सही संदर्भ में समझना ज़रूरी

भाई जसवंत सिंह खालड़ा की जांच मुख्य रूप से श्मशान घाटों के रिकॉर्ड पर आधारित थी। उन्होंने उन रजिस्टरों में दर्ज “अज्ञात” लोगों की एंट्रियों की ओर ध्यान दिलाया।

बाद में सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सामने करीब 2,096 अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार का मामला सामने आया। यह बेहद गंभीर विषय है और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लेकिन इस संख्या को बिना संदर्भ के पेश करना भी ठीक नहीं होगा।

पंजाब की पूरी त्रासदी को समझना होगा

1980 और 1990 के दशक में पंजाब ने बेहद दर्दनाक दौर देखा। उस समय करीब 12,000 निर्दोष नागरिक और करीब 1,800 पुलिसकर्मी मारे गए। कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी आतंकवादी हमलों में जान गंवा बैठे। बसों से लोगों को उतारकर गोलियां मारी गईं। हर मज़हब और हर तबके के लोगों ने इस हिंसा का दर्द झेला।

यह भी सच है कि अगर कहीं ग़ैर-कानूनी हत्याएं हुईं या किसी के साथ अन्याय हुआ, तो उसे कभी सही नहीं ठहराया जा सकता। भाई खालड़ा मामले में अदालत ने दोषियों को सज़ा भी दी, जिससे यह साबित होता है कि कानून ने अपना काम किया।

सिर्फ़ एक पहलू दिखाना पूरी तस्वीर नहीं

अगर कोई फ़िल्म सिर्फ़ एक घटना या एक पक्ष को दिखाए और उस दौर की बाकी हक़ीक़त—आतंकवाद, आम लोगों की हत्याएं, पुलिसकर्मियों की शहादत, पाकिस्तान की भूमिका और पूरे माहौल को न दिखाए, तो नई पीढ़ी को अधूरी तस्वीर मिलेगी।

इतिहास को आधा नहीं, पूरा बताया जाना चाहिए।

पुराने ज़ख्मों को समझदारी से संभालना होगा

पंजाब के इतिहास में ऑपरेशन ब्लू स्टार, 1984 के सिख विरोधी दंगे, आतंकवाद और पुलिस कार्रवाई जैसे कई बेहद संवेदनशील अध्याय हैं। इन पर फ़िल्में बन सकती हैं, लेकिन उन्हें ऐसे अंदाज़ में पेश किया जाना चाहिए जिससे समाज में नफ़रत या नए तनाव पैदा न हों।

राजनीति और दोहरे मापदंड

फ़िल्म हटने के बाद कई राजनीतिक दलों ने इसका विरोध किया। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या उनका विरोध सिर्फ़ सिद्धांतों पर आधारित है या फिर राजनीतिक वजहों से?

भाई जसवंत सिंह खालड़ा को आज जिस तरह याद किया जा रहा है, क्या उन्हें पहले भी वही सम्मान मिला था? यह सवाल भी चर्चा का हिस्सा होना चाहिए।

फ़िल्म को लेकर मेरी राय

मेरी राय में, अगर सीबीएफसी ने इतने बड़े पैमाने पर बदलाव सुझाए थे, तो पहले कानूनी प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए थी। अगर निर्माता उन बदलावों से सहमत नहीं थे, तो अदालत का रास्ता अपनाना चाहिए था। ओटीटी के ज़रिए पूरी प्रक्रिया से बचना सही तरीका नहीं माना जा सकता।

फ़िल्म हटाने का उल्टा असर भी हो सकता है

हालांकि फ़िल्म को रिलीज़ के बाद हटाने से लोगों की दिलचस्पी और बढ़ गई है। अब पहले से ज़्यादा लोग इसे देखने की कोशिश करेंगे। इसलिए यह फैसला अपने उल्टे असर भी छोड़ सकता है।

अभिव्यक्ति की आज़ादी पर व्यापक सोच ज़रूरी

मैं अभिव्यक्ति की आज़ादी का समर्थक हूं। लेकिन अगर इस अधिकार को मज़बूत करना है, तो सिर्फ़ फिल्मों की बात नहीं होनी चाहिए। पत्रकारों, लेखकों, व्यंग्यकारों और आम नागरिकों की आवाज़ को भी बिना बेवजह दबाव के अपनी बात कहने का पूरा मौक़ा मिलना चाहिए।

पंजाब का इतिहास पूरा बताया जाए

पंजाब के इतिहास में जो कुछ हुआ, उसे छिपाया भी नहीं जाना चाहिए और न ही सिर्फ़ एक पहलू को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाना चाहिए। ग़ैर-कानूनी हत्याएं, लापता लोग, आतंकवाद, निर्दोष नागरिकों की मौत, पुलिसकर्मियों की कुर्बानी, पाकिस्तान की भूमिका और उस दौर की पूरी सच्चाई—सबको साथ लेकर ही इतिहास समझा जा सकता है।

पंजाब ने बहुत दर्द सहा है। अब ज़रूरत इस बात की है कि इतिहास को ईमानदारी, ज़िम्मेदारी और संतुलन के साथ पेश किया जाए, ताकि आने वाली नस्लें पूरी हक़ीक़त जान सकें और समाज में अमन, इंसाफ़ और भाईचारे का पैग़ाम मज़बूत हो।

ये भी पढ़ें: क़मर जलालाबादी: जिनकी क़लम से निकले सदाबहार नग़मे 

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KBS Sidhu
KBS Sidhu
केबीएस सिद्धू, IAS (रिटायर्ड), पंजाब सरकार में स्पेशल चीफ सेक्रेटरी के तौर पर काम कर चुके हैं। वे द केबीएस क्रॉनिकल के एडिटर-इन-चीफ हैं, जो गवर्नेंस, पब्लिक पॉलिसी, हाई-टेक और स्ट्रेटेजिक मामलों पर इंडिपेंडेंट कमेंट्री देने वाला एक डेली न्यूज़लेटर है।

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