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जाज़िब क़ुरैशी: उर्दू शायरी की महक से महफ़िलें सजाने वाला फ़नकार 

“तेरी यादों की चमकती हुई मशअल के सिवा,
मेरी आंखों में कोई और उजाला ही नहीं।”

यह शेर मशहूर उर्दू शायर जाज़िब क़ुरैशी की शायरी की गहराई और ख़ूबसूरती का आईना है। उनकी ग़ज़लों में मोहब्बत, तन्हाई, इंसानी जज़्बात, समाज और ज़िंदगी की सच्चाइयां बड़ी सादगी और असरदार अंदाज़ में नज़र आती हैं। वे सिर्फ़ एक बेहतरीन शायर ही नहीं, बल्कि आलोचक, लेखक और उर्दू अदब के अहम नामों में भी शुमार किए जाते हैं।

जाज़िब क़ुरैशी की पैदाइश 3 अगस्त 1940 को लखनऊ में हुयी। बचपन ही में उनके वालिद का इंतिक़ाल हो गया, जिसकी वजह से उन्हें कम उम्र में ही ज़िंदगी की मुश्किलों का सामना करना पड़ा। घर की ज़िम्मेदारियों के चलते उनकी तालीम कुछ समय के लिए रुक गई और रोज़गार के लिए मेहनत करनी पड़ी।

1950 में उनका परिवार पाकिस्तान के लाहौर चला गया। वहां उन्होंने एक प्रिंटिंग प्रेस में काम किया। काम के साथ-साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी और उर्दू अदब से रिश्ता मज़बूत किया। इसी दौर में उन्होंने शायरी कहना शुरू किया और मुशायरों में शिरकत करने लगे। उनका पहला मुशायरा शाही क़िला, लाहौर में हुआ, जिसकी सदारत मशहूर शायर एहसान दानिश ने की थी।

जाज़िब क़ुरैशी को शायरी की बारीकियां सीखने में शाकिर देहलवी की रहनुमाई मिली, जो दाग़ देहलवी की शायरी की रिवायत से जुड़े हुए थे। इस रहनुमाई ने उनकी शायरी को एक अलग पहचान दी।

1962 में वे कराची आ गए। यहां उन्होंने कई अख़बारों और अदबी रिसालों में काम किया। साथ ही कराची यूनिवर्सिटी से मास्टर्स की डिग्री हासिल की और बाद में कॉलेज में अध्यापन भी किया। उन्होंने फ़िल्म “पत्थर के सनम” भी बनाई, लेकिन यह फ़िल्म कामयाब नहीं हो सकी और उन्हें आर्थिक नुक़सान उठाना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने अदब और शायरी का दामन कभी नहीं छोड़ा।

जाज़िब क़ुरैशी ने शायरी, आलोचना और गद्य की कई अहम किताबें लिखीं। उनकी मशहूर किताबों में “तख़लीक़ी आवाज़”, “आंख और चराग़”, “शायरी और तहज़ीब”, “दूसरे किनारे तक”, “मेरी तहरीरें”, “नींद का रेशम”, “शीशे का दरख़्त”, “आशोब-ए-जां”, “उजली आवाज़ें”, “शिकस्ता अक्स”, “शनासाई”, “मुझे याद है”, “नअत के जदीद रंग” और “मेरी शायरी, मेरी मुसव्वरी” जैसी कई अहम किताबें शामिल हैं।

उनकी शायरी में दर्द के साथ उम्मीद भी मिलती है। वे इंसानी रिश्तों, बदलते समाज और दिल के एहसास को बहुत सादा लेकिन असरदार अल्फ़ाज़ में बयां करते थे। उनके कई अशआर आज भी उर्दू अदब के चाहने वालों की ज़ुबान पर हैं।

“क्यूं मांग रहे हो किसी बारिश की दुआएं,
तुम अपने शिकस्ता दर-ओ-दीवार तो देखो।”

इस शेर में वे इंसान को अपनी कमज़ोरियों और हालात पर ग़ौर करने का पैग़ाम देते हैं।

“दफ़्तर की थकन ओढ़ के तुम जिस से मिले हो,
उस शख़्स के ताज़ा लब-ओ-रुख़्सार तो देखो।”

यह शेर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में रिश्तों की अहमियत और इंसानी एहसास की तरफ़ इशारा करता है।

“तेरी यादों की चमकती हुई मशअल के सिवा,
मेरी आंखों में कोई और उजाला ही नहीं।”

“मेरी शायरी में छुप कर कोई और बोलता है,
सर-ए-आईना जो देखूं तो वो शख़्स दूसरा है।”

जाज़िब क़ुरैशी ने अपनी शायरी का पैग़ाम सिर्फ़ पाकिस्तान तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने अमेरिका के 35 शहरों में मुशायरों और अदबी कार्यक्रमों में शिरकत की। इसके अलावा बहरीन, क़तर, दुबई, शारजाह और अबू धाबी में भी कई बार अपनी शायरी पेश की।

21 जून 2021 को कराची में उनका इंतिक़ाल हो गया। उन्हें अज़ीज़ाबाद क़ब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। उनके जाने के बाद भी उनकी ग़ज़लें, किताबें और अल्फ़ाज़ उर्दू अदब के चाहने वालों के दिलों में ज़िंदा हैं।

जाज़िब क़ुरैशी उन शायरों में शुमार होते हैं जिन्होंने अपनी शायरी के ज़रिए मोहब्बत, इंसानियत, तन्हाई और ज़िंदगी के एहसास को हमेशा के लिए अल्फ़ाज़ में ढाल दिया। उनकी ग़ज़लें आज भी पढ़ने वालों के दिलों को छूती हैं और उर्दू अदब की ख़ूबसूरत विरासत का अहम हिस्सा बनी हुई हैं।

ये भी पढ़ें: क़मर जलालाबादी: जिनकी क़लम से निकले सदाबहार नग़मे 

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