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बेख़ुद देहलवी: दाग़ की रिवायत, दिल्ली की ज़बान और इश्क़ की ख़ूबसूरत शायरी

“आइना देख कर वो ये समझे
मिल गया हुस्न-ए-बे-मिसाल हमें।”

यह शेर पढ़ते ही उर्दू शायरी की वह नफ़ासत और दिलकशी सामने आ जाती है, जिसके लिए बेख़ुद देहलवी का नाम हमेशा याद किया जाएगा। उनकी शायरी में इश्क़ है, अदब है, दिल्ली की तहज़ीब है और ऐसी सादगी है जो सीधे दिल पर असर करती है।

बेख़ुद देहलवी का असली नाम सैयद वहीदुद्दीन अहमद था। उनकी पैदाइश 21 मार्च 1863 को राजस्थान के भरतपुर में हुयी। उनके वालिद मशहूर उर्दू शायर सैयद शम्सुद्दीन “सलीम” थे। घर का माहौल अदबी था, इसलिए शायरी का ज़ौक़ उन्हें विरासत में मिला। बचपन से ही उन्हें इल्म, अदब और शेर-ओ-शायरी का अच्छा माहौल नसीब हुआ।

बाद में मशहूर शायर और आलोचक अल्ताफ़ हुसैन हाली उन्हें दिल्ली लेकर आए। हाली की सरपरस्ती में उनकी अदबी तालीम आगे बढ़ी। हाली की सलाह पर साल 1891 में वे उस्ताद दाग़ देहलवी के शागिर्द बने। दाग़ की सोहबत ने उनकी शायरी को नई पहचान दी। उन्होंने अपने उस्ताद की रिवायत को पूरी वफ़ादारी से आगे बढ़ाया। कहा जाता है कि दाग़ का रंग उनकी शायरी पर इतना गहरा था कि उन्होंने अलग अंदाज़ बनाने की कोशिश नहीं की, बल्कि उसी रवायत को ख़ूबसूरती से ज़िंदा रखा।

बेख़ुद देहलवी की शायरी की सबसे बड़ी पहचान उनकी सादा लेकिन असरदार ज़बान है। उनकी ग़ज़लों में दिल्ली की ख़ालिस बोली, नफ़ासत और तहज़ीब साफ़ दिखाई देती है। वे मुश्किल अल्फ़ाज़ से ज़्यादा आसान और दिल में उतर जाने वाले लफ़्ज़ों का इस्तेमाल करते थे। यही वजह है कि उनकी शायरी आज भी उतनी ही ताज़ा महसूस होती है।

उनकी ग़ज़लों में मोहब्बत, जुदाई, वफ़ा, इंतज़ार, इंसानी रिश्ते और ज़िंदगी के नाज़ुक एहसास बड़ी ख़ूबसूरती से बयान हुए हैं। उनके अशआर पढ़ते हुए लगता है जैसे कोई दिल की बात बहुत सादगी से कह रहा हो।

दिल मोहब्बत से भर गया ‘बेख़ुद’
अब किसी पर फ़िदा नहीं होता।

इस शेर में मोहब्बत का वह मुकाम बयान हुआ है जहां इंसान इश्क़ की इंतिहा तक पहुंचकर एक अजीब-सी तसल्ली महसूस करता है।

जादू है या तिलिस्म तुम्हारी ज़बान में
तुम झूट कह रहे थे, मुझे ए’तिबार था।

इस शेर में मोहब्बत, भरोसे और मासूमियत का ऐसा रंग है, जो हर दौर के आशिक़ के दिल की आवाज़ बन जाता है।

सुन के सारी दास्तान-ए-रंज-ओ-ग़म
कह दिया उस ने कि फिर हम क्या करें।

यह शेर इंसानी बेबसी और रिश्तों की ख़ामोशी को बेहद असरदार अंदाज़ में पेश करता है।

बेख़ुद देहलवी सिर्फ़ अच्छे शायर ही नहीं, बल्कि दिल्ली की तहज़ीब के सच्चे नुमाइंदे भी थे। कहा जाता है कि उन्हें अच्छा खाना, अच्छा पहनना और दोस्तों के साथ महफ़िलें सजाना बेहद पसंद था। वे खुलकर जीने वाले इंसान थे और उनकी यही रंगीन-मिज़ाजी उनकी शायरी में भी दिखाई देती है।

उनकी अदबी ख़िदमत को देखते हुए उर्दू दुनिया में उन्हें हमेशा इज़्ज़त की नज़र से देखा गया। उनकी दो अहम किताबें “गुफ़्तार-ए-बेख़ुद” और “शाहसवार-ए-बेख़ुद” उनके ज़िंदगी में ही प्रकाशित हुईं। इन दोनों मजमुओं में उनकी ग़ज़लों का बेहतरीन ख़ज़ाना मौजूद है, जिसे आज भी उर्दू अदब के शौक़ीन बड़े चाव से पढ़ते हैं।

करीब नौ दशकों तक अदबी दुनिया को अपनी शायरी से रोशन करने वाले बेख़ुद देहलवी का इंतिक़ाल 2 अक्टूबर 1955 को दिल्ली में 92 साल की उम्र में हुआ। लेकिन उनकी शायरी आज भी ज़िंदा है और नई नस्ल को उर्दू ग़ज़ल की ख़ूबसूरती से रूबरू कराती है।

बेख़ुद देहलवी ने यह साबित किया कि अच्छी शायरी के लिए मुश्किल ज़बान नहीं, बल्कि सच्चे जज़्बात और ख़ूबसूरत अंदाज़-ए-बयां की ज़रूरत होती है। उनकी ग़ज़लें मोहब्बत, तहज़ीब, वफ़ा और इंसानी एहसासात का ऐसा आईना हैं, जिनमें हर दौर का क़ारी अपना अक्स देख सकता है। यही वजह है कि उर्दू अदब की महफ़िलों में बेख़ुद देहलवी का नाम आज भी उसी अदब और मोहब्बत से लिया जाता है, जैसा उनके ज़माने में लिया जाता था।

ये भी पढ़ें: क़मर जलालाबादी: जिनकी क़लम से निकले सदाबहार नग़मे 

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