उर्दू अदब और सहाफ़त की दुनिया में लिसान-उल-मुल्क सैय्यद अहमदउल्लाह क़ादरी का नाम बड़े एहतराम से लिया जाता है। वे सिर्फ़ एक शायर या अदीब नहीं थे, बल्कि एक बेबाक सहाफ़ी, तन्क़ीद निगार, तर्जुमान, तालीमदान, सियासतदान और आज़ादी के जद्दोजहद में हिस्सा लेने वाले एक जागरूक शख़्स थे। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इल्म, अदब और मुल्क की ख़िदमत के लिए वक़्फ़ कर दी।
सैय्यद अहमदउल्लाह क़ादरी की पैदाइश 9 अगस्त 1909 को हैदराबाद रियासत में एक इल्मी और अदबी ख़ानदान में हुयी। उनके वालिद सैय्यद शम्सुल्लाह क़ादरी मशहूर अदीब और दक्कन की तहज़ीब के शुरुआती मुहक़्क़िक़ों में शुमार किए जाते थे। घर का माहौल इल्म और अदब से भरा हुआ था, इसलिए बचपन से ही क़ादरी साहब की दिलचस्पी किताबों, तहक़ीक़ और लिखने-पढ़ने की तरफ़ बढ़ती गई।
उन्होंने कम उम्र में ही लिखना शुरू कर दिया और आगे चलकर उर्दू सहाफ़त में अपनी अलग पहचान बनाई। वे उर्दू के मशहूर अख़बार “सल्तनत” और “पैसा अख़बार” के बानी और सरबराह रहे। इससे पहले वे अपने वालिद की तरफ़ से शुरू किए गए “तारीख़” नामी रिसाले की इदारत भी संभाल चुके थे। उनकी तहरीरों में हमेशा सच, इल्म और क़ौमी यकजहती की झलक दिखाई देती थी।
साल 1946 में जब मुल्क तक़सीम की बहस अपने उरूज पर थी, उस वक़्त सैय्यद अहमदउल्लाह क़ादरी ने उर्दू रोज़नामा “सल्तनत” में संयुक्त भारत (United India) और एक राष्ट्र सिद्धांत के हक़ में बेख़ौफ़ होकर लिखा। उनका मानना था कि मुल्क की ताक़त उसकी गंगा-जमुनी तहज़ीब और आपसी भाईचारे में है। यही सोच उन्हें अपने दौर के दूसरे लेखकों से अलग मुक़ाम देती है।
अदबी दुनिया में भी उनका योगदान बेहद अहम रहा। उनकी पहली मशहूर किताब “मीर हसन देहलवी” 1931 में प्रकाशित हुई। इसके बाद उन्होंने “क़ामूस-उल-मशाहिर”, “तनक़ीद-ए-क़ामूस-उल-मशाहिर”, “नवेद-ए-मसर्रत”, “मजामीर”, “उस्मान-नामा” और “चांद बीबी के संस्मरण” जैसी कई अहम किताबें लिखीं। उनकी तहरीरों में इतिहास, अदब, तहज़ीब और समाज का गहरा मुताला नज़र आता है।
आज़ादी के बाद भी उनका क़लम बराबर चलता रहा। उन्होंने “हिन्दनामा”, “जवाहर नामा”, “हैदराबाद नामा”, “आंध्र नामा”, “बहादुर नामा”, “पयाम-ए-गांधी”, “इंदिरा नामा”, “प्रियदर्शनी गाथा”, “क़िस्सा-ए-संजन” और “भारत की प्रगति के 25 वर्ष” जैसी किताबों के ज़रिए मुल्क की तारीख़, क़ौमी रहनुमाओं और समाजी तब्दीलियों को आसान ज़बान में पेश किया।
सैय्यद अहमदउल्लाह क़ादरी सिर्फ़ लेखक ही नहीं, बल्कि कई अहम इदारों से भी जुड़े रहे। वे लुत्फुद्दौला ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट के सदर, हैदराबाद जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष, राज्य पुस्तकालय परिषद के सदस्य, आंध्र प्रदेश विधान परिषद के सदस्य और आंध्र प्रदेश राज्य हज कमेटी के चेयरमैन भी रहे। इन ज़िम्मेदारियों के ज़रिए उन्होंने इल्म, अदब और समाजी ख़िदमत को नई बुलंदियां दीं।
उनकी अदबी और तालीमी ख़िदमात को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1966 में पद्म श्री से नवाज़ा। यह सम्मान उनकी बरसों की मेहनत, इल्मी ख़िदमत और उर्दू ज़बान के लिए किए गए काम का एतराफ़ था।
5 अक्टूबर 1985 को हैदराबाद में उनका इंतिक़ाल हुआ, लेकिन उनका अदबी और इल्मी विरसा आज भी ज़िंदा है। उनकी किताबें, तहरीरें और ख़यालात नई नस्ल के लिए मशअल-ए-राह हैं। लिसान-उल-मुल्क सैय्यद अहमदउल्लाह क़ादरी ने साबित किया कि क़लम सिर्फ़ अल्फ़ाज़ लिखने का ज़रिया नहीं, बल्कि समाज को बेहतर बनाने की सबसे बड़ी ताक़त भी है। उर्दू अदब और हिंदुस्तानी तहज़ीब में उनका नाम हमेशा इज़्ज़त और एहतराम के साथ याद किया जाएगा।
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