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बाबा बर्फानी का पिघलता शिवलिंग : हमारी बढ़ती तीर्थयात्रा का दबाव और हिमालय का गहराता संकट

हर साल लाखों श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन के लिए कठिन यात्रा करते हैं। अमरनाथ यात्रा शुरू होने के सिर्फ चार दिनों के अंदर ही अमरनाथ गुफा में प्राकृतिक रूप से निर्मित बर्फ के शिवलिंग के जल्दी पिघलने ने एक बार फिर हिमालय के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ये लेख आस्था और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन साधने की बात करता है। बता दें कि बर्फ का स्वरूप 90 फीसदी से ज़्यादा पिघल गया है। ये कोई साधारण घटना नहीं है,एक चेतावनी है।बर्फ की भाषा में लिखी एक कहानी,जो हर उस शख्स के लिए है जो प्रकृति को अपना ईश्वर मानता है।

ज़रा सोचिए –

  • 2018 में ये शिवलिंग 29 दिनों में पिघला
  • 2020 में इसे 38 दिन लगे
  • 2022 में महज 28 दिन
  • 2024 में मात्र एक सप्ताह
  • और 2026 में…  

बीबीसी रिपोर्ट के मुताबिक,पिछले 4-5 सालों  में उत्तर-पश्चिमी हिमालय में हिमपात में 25 फीसदी की कमी आई है।जब स्रोत ही सूख जाए, तो बचत कैसे होगी? जब बर्फ ही नही बचेगी तो बाबा बर्फानी कैसे विराजेंगे?

AI Genereted Image

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे जलवायु परिवर्तन मुख्य कारण है। हिमालय ग्लोबल एवरेज की तुलना में दोगुनी दर से गर्म हो रहा है।1980 से 2020 के बीच यहां तापमान 0.2 से 0.3 डिग्री सेल्सियस हर दशक में बढ़ा है।जम्मू विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के पूर्व प्रमुख प्रोफेसर जी.एम. भट्ट के अनुसार, ‘इस सर्दी में कश्मीर की पहाड़ियों में सामान्य से कम बर्फबारी हुई।’ जब  सोर्स ही सीमित हो, तो संचय स्वाभाविक रूप से कम होगा।

अंतर्राष्ट्रीय पर्वतीय विकास केंद्र (ICIMOD) के अनुसार, 2024-2025 की सर्दी में हिम-स्थिरता (snow persistence) 23 सालों के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई। 

हिमालय का बढ़ता संकट

हिमालय, जिसे ‘तीसरा ध्रुव’ और ‘एशिया की जल-मीनार’ कहा जाता है, गंभीर संकट से गुजर रहा है।

  • ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना: 2000 से 2016 तक हिमालयी ग्लेशियरों ने प्रति वर्ष औसतन 0.37 मीटर पानी Equivalent mass खोया 
  • हिमपात पैटर्न में बदलाव: 1990 से 2020 के बीच सेंट्रल और ईस्ट हिमालय ने अपनी बर्फ की चादर का 30 फीसदी खो दिया 
  • ग्लेशियल झीलों का विस्तार: 1977 में 1,160 ग्लेशियल झीलें थीं, जो 2010 में बढ़कर 2,168 हो गईं 

एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि 2100 तक 70 फीसदी बर्फ की चादर ख़त्म हो जाएगी। इसका सीधा प्रभाव लगभग 2 अरब लोगों की जल सुरक्षा पर पड़ेगा।

हमारी तीर्थयात्रा भक्ति भी,ज़िम्मेदारी भी

अमरनाथ यात्रा में प्रति वर्ष 3.5 से 5 लाख श्रद्धालु जाते हैं।हर दिन 8,000-15,000 लोग पहाड़ पर चढ़ते हैं।अब सवाल उठता है कि क्या हम अपने बाबा के घर मेहमान हैं, या कब्ज़ेदार?

कूड़े का पहाड़

  • हर साल 500 टन से ज़्यादा कूड़ा उत्पन्न होता है
  • प्लास्टिक की बोतलें, पैकेट, रैपर ये सब जमीन में 500 सालों तक नहीं गलते
  • ये कचरा ग्लेशियरों में समा जाता है और पिघलकर नदियों में मिल जाता है

पर्यावरणविदों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ बढ़ती मानवीय गतिविधियां भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। कश्मीर के पर्यावरण विज्ञानी मुश्ताक अहमद खान बताते हैं, ‘जब हजारों लोग प्रतिदिन एक सीमित गुफा में प्रवेश करते हैं, तो शरीर की गर्मी, आर्द्रता और कार्बन डाइऑक्साइड गुफा के सूक्ष्म-जलवायु को बदल देते हैं और पिघलने के प्रोसेस को तेज करते हैं।’

बढ़ता बुनियादी ढांचा भी चिंता का विषय है। पिछले दो दशकों में यात्रा मार्गों को चौड़ा किया गया, सड़कें बनाई गईं, और भारी वाहनों की आवाजाही बढ़ी है।  

क्या करें? – आस्था और पर्यावरण का संतुलन

ये लेख अमरनाथ यात्रा या आस्था के विरुद्ध नहीं है। बल्कि, ये ज़्यादा टिकाऊ तीर्थयात्रा की वकालत करता है। श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड ने 2025 में ‘शून्य-अपशिष्ट’ यात्रा के प्रयास किए, जहां 1,016 ट्विन-बिन स्टेशन लगाए गए और सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाया गया। लेकिन इतना करना संतोषजनक नहीं है।

हर श्रद्धालु की ज़िम्मेदारी

  1. कूड़ा-कचरा न फैलाएं: हिमालय की नदियां, ग्लेशियर और वन हमारी विरासत हैं
  2. सिंगल-यूज़ प्लास्टिक को यूज़ ना करें: कपड़े या जूट के थैलों का उपयोग करें 
  3. पर्यावरणीय दिशा-निर्देशों का पालन करें: श्राइन बोर्ड के नियमों का सम्मान करें
  4. क्षेत्र की वहन क्षमता का सम्मान करें: अनावश्यक भीड़ बढ़ाने से बचें

आस्था के साथ ज़िम्मेदारी

हिमालय की रक्षा करना पर्यावरणीय और आध्यात्मिक दोनों तरीके से हमारी जिम्मेदारी है।अधिकारियों, स्थानीय समुदायों और श्रद्धालुओं को मिलकर यात्रा को पर्यावरण संरक्षण के साथ आगे बढ़ना होगा।  

जलवायु परिवर्तन कोई दूर की बात नहीं, ये हमारी आस्था के सेंटर प्वाइंट में एंट्री कर चुका है। 2015 और 2025 के फुटेज की तुलना दिखाती है कि कैसे बर्फ से ढके रास्ते अब बंजर और धूल भरे हो गए हैं।

आइए, इस यात्रा को अधिक संवेदनशील और टिकाऊ बनाएं। अगर आज के श्रद्धालु जिम्मेदारी से चलें, तो आने वाली पीढ़ियां भी बाबा बर्फानी के प्राकृतिक चमत्कार और अमरनाथ गुफा की पवित्र ख़ूबसूरती को देख सकेंगी।

नोट-इस रिपोर्ट में बीबीसी, पीआईबी (प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो) व अन्य विश्वसनीय स्रोतों से प्राप्त जानकारियों का इस्तेमाल किया गया है।

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