ये बीस साल पहले की बात है। वर्ष 2006 में अमरनाथ यात्रा को कवर करने के लिए मुझे करीब 10 दिन 13,000 फुट की ऊंचाई पर रहना पड़ा था। तब अमरनाथ यात्रा के दर्शनों के लिए उमड़ी भीड़ से बड़ी ख़बर थी पवित्र गुफा में प्राकृतिक शिवलिंग का न होना। तब वहां तीर्थयात्रियों के लिए बर्फ से बनाये गए कृत्रिम शिवलिंग को लेकर काफी विवाद हुआ और अमरनाथ यात्रा बोर्ड की आलोचना हुई थी।
अमरनाथ यात्रा आज की नहीं बल्कि हज़ारों साल पुरानी है और इसकी संबंध संत भृगु से बताया जाता है। बारहवीं सदी की राजतरंगिणी में भी इस यात्रा का ज़िक्र मिलता है। वर्ष 2000 में जम्मू – कश्मीर सरकार ने अमरनाथ यात्रा श्राइन बोर्ड का गठन कर इसे व्यवस्थित करने की कोशिश की। लेकिन पिछले कुछ सालों में अमरनाथ गुफा में शिवलिंग के जल्दी गल जाने या न बनने की घटनायें बार-बार देखी जा रही हैं।
जानते हैं कि इसके पीछे आखिर क्या कारण हैं।
अमरनाथ पवित्र गुफा जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग ज़िले में करीब 3888 मीटर ( 12756 फुट) की ऊंचाई पर स्थित है। सर्दियों में इस ऊंचाई पर तापमान -20 डिग्री से नीचे तक चला जाता है। इसी समय यहां गुफा की चट्टानों से लगातार रिसते पानी के जमने से एक आइस पिलर बनता है जिसे भक्त पवित्र शिवलिंग के रूप में पूजते हैं।
हिमालयी मामलों के जानकार भूविज्ञानी डॉ एस पी सती कहते हैं कि अमरनाथ गुफा में बर्फ का शिवलिंग बनना एक दुर्लभ लेकिन पूरी तरह से प्राकृतिक प्रक्रिया है। उनके मुताबिक इसे विज्ञान की भाषा में आइस स्टैलेग्माइट कहा जाता है। इसमें बर्फ की एक ऊपर की ओर बढ़ती हुई संरचना होती है जो गुफा, फ्रीजर या बाहरी क्षेत्र के फर्श पर जमा हो जाती है। ये ऊपरी सतह से टपकते पानी के कारण बनती हैं, जो बर्फीली ठंडी जमीन के संपर्क में आते ही तुरंत जम जाता है।
असल में अमरनाथ गुफा के ऊपर और आसपास सर्दियों में बर्फ का काफी जमाव होता है। हर साल अप्रैल-मई के महीने से ही यह बर्फ पिघल कर धीरे धीरे गुफा में रिसती है और वह पानी चूने के पत्थर (Limestone) और जिप्सम वाली चट्टानों की दरारों से छनकर नीचे गुफा की छत तक पहुंचता है।

गुफा के भीतर का तापमान गर्मियों में भी शून्य या उससे नीचे (Sub-zero) रहता है। जब पानी की बूंदें गुफा की छत से फर्श पर एक ही निश्चित स्थान पर टपकती हैं, तो वे संपर्क में आते ही तुरंत जम जाती हैं।
जैसे-जैसे पानी की बूंदें लगातार एक के ऊपर एक गिरती हैं तो एक के ऊपर दूसरी परतें जमती जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप बर्फ नीचे से ऊपर की ओर एक स्तंभ (Pillar) का रूप लेने लगती है और वह शिवलिंग बनता है जिसे श्रद्धालु बाबा बर्फानी के रूप में पूजते हैं।
हाल के वर्षों में यह देखा गया है कि यात्रा शुरू होने के कुछ ही दिनों के भीतर शिवलिंग पूरी तरह या आंशिक रूप से पिघल जाता है। इसके पीछे कई गंभीर और प्रामाणिक वैज्ञानिक कारण हैं:
ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ता तापमान (Climate Change): हिमालयी क्षेत्र दुनिया के अन्य हिस्सों की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहे हैं। वर्ष 2024 में इतिहास का सबसे गर्म मार्च रिकॉर्ड किया गया। इसके बाद 2025 में फरवरी में ऐतिहासिक रूप 125 सालों में सबसे अधिक गर्म दर्ज किया गया। बढ़ते तापमान और बार-बार आने वाली हीटवेव (लू) के कारण गुफा के आसपास का वातावरण गर्म हो जाता है, जिससे बर्फ को टिकने के लिए जरूरी ठंडी जलवायु नहीं मिल पाती।

मानवीय गतिविधि और माइक्रोक्लाइमेट में बदलाव एक बड़ा कारण है। वैज्ञानिक बताते हैं कि हर दिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु गुफा के भीतर प्रवेश करते हैं। इंसानी शरीर से निकलने वाली गर्मी (Body Heat) और कार्बन डाइऑक्साइड के कारण गुफा के अंदर का स्थानीय तापमान (Microclimate) बढ़ जाता है। इसके अलावा, आस-पास चलने वाले जनरेटर और हेलिकॉप्टरों की आवाजाही भी गर्मी बढ़ाती है। वर्ष 2016 के आसपास जहां वार्षिक श्रद्धालुओं की संख्या लगभग 2.2 लाख के स्तर पर थी, वहीं वर्ष 2024 में यह आंकड़ा रिकॉर्ड 5.12 लाख से अधिक पहुंच गया। इस साल 2026 में पांच दिन में ही सवा लाख से अधिक लोग अमरनाथ पहुंच गये।

डॉ सती कहते हैं कि हमारे देश में किसी संवेदनशील पर्यावरणीय क्षेत्र की वहन क्षमता कितनी होगी इसका कोई खयाल नहीं रखा जाता है। उनके मुताबिक जिस जगह पर कोई नहीं रहता वहां पर दिन के वक्त हज़ारों लोगों के जमा होने, उनकी गतिविधियों, गाड़ियों, घोड़ों और हेलीकॉप्टरों के चलने, आग जलाने और पूजा पाठ करने से वह स्थान लोकल थर्मल आइलैंड बन जाता है। यह बात केवल अमरनाथ तक सीमित नहीं है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में हर जगह दिखा रही है। डॉ सती के मुताबिक हम केदारनाथ और बदरीनाथ के इलाकों में लगातार एवलांच की बढ़ती फ्रीक्वेंसी देख रहे हैं जो चिन्ता का विषय है।
सर्दियों में कम बर्फबारी : यदि सर्दियों के महीनों में गुफा के ऊपर पर्याप्त बर्फबारी न हो, तो गर्मियों में पानी का रिसाव समय से पहले बंद हो जाता है या कम होता है। पानी की सही मात्रा न मिलने से शिवलिंग का आकार छोटा रह जाता है और वह जल्दी गायब हो सकता है।
बुनियादी ढांचे का विस्तार: रास्ते चौड़े करने, गुफा के पास पक्के ढांचे बनाने और लंगरों में गैस सिलेंडरों के भारी इस्तेमाल से भी उस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र का तापमान प्रभावित हुआ है, जो बर्फ को बनाए रखने के लिए जरूरी है।
वैज्ञानिक बताते हैं कि कुछ वर्षों से उत्तर – पश्चिम भारत में गर्मियों में बरसात अधिक हो रही है। बरसात का पानी रिस रहा जिसका तापमान अपेक्षाकृत अधिक होता है। यह भी संभवत: अंदर की बर्फ को पिघला देता है। अमरनाथ गुफा का एक नाजुक पर्यावरण संतुलन ही इस अद्भुत संरचना को जन्म देता है, लेकिन इंसानी हस्तक्षेप और वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण अब इस प्राकृतिक घटना पर संकट मंडरा रहा है।
एक बात और। पिछले कुछ सालों में श्रद्धालुओं द्वारा ऊंचे संवेदनशील स्थानों पर बसे धामों में हर साल जाने का रिवाज़ बढ़ा है। इससे अमरनाथ, बदरीनाथ और केदारनाथ जैसे तीर्थों पर दबाव मानव जनित संकट बढ़ रहा है। प्लास्टिक का कचरा व अन्य कारण स्थिति को और बिगाड़ रहे हैं।
मिसाल के तौर पर दिल्ली के प्रभुनाथ यादव कहते हैं कि वह परिवार समेत हर साल वैष्णो देवी की यात्रा पर जाते हैं। ऐसे सैकड़ों परिवार हैं जो जून – जुलाई में ही इस धामों की यात्रा करते हैं। सवाल है कि एक ज़िम्मेदार पर्यटक के तौर पर क्या संवेदनशील स्थानों पर हर साल जाने की आदत सही कही जा सकती है? क्या इससे संसाधनों और इकोलॉजी पर दबाव नहीं बढ़ रहा?

देहरादून स्थित सामाजिक और पर्यावरण कार्यकर्ता अनूप नौटियाल कहते हैं, “”संवेदनशील हिमालयी इकोसिस्टम में हर साल उमड़ने वाली यह भीड़ श्रद्धा नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिए एक गंभीर संकट बन चुकी है। अमरनाथ, केदारनाथ और वैष्णो देवी जैसे धामों की एक सीमित वहन क्षमता (Carrying Capacity) है, जो लगातार टूट रही है। इसके समाधान के लिए सरकार को तत्काल सख्त कदम उठाते हुए ‘रजिस्ट्रेशन कैपिंग’ (यात्रियों की दैनिक व वार्षिक संख्या की एक तय सीमा) लागू करनी होगी और पूरे साल में रोटेशन के आधार पर यात्रा की अनुमति देनी होगी। साथ ही, श्रद्धालुओं को भी जागरूक होना होगा कि हर साल जाने के बजाय वे अपनी यात्राओं में अंतराल रखें और वहां प्लास्टिक या कचरा न छोड़कर एक जिम्मेदार पर्यटक की भूमिका निभाएं।”
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