पाकिस्तान के कब्ज़े वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) में हालिया अशांति (Unrest) उस प्रोटेस्ट में एक अहम मोड़ है, जो धीरे-धीरे आर्थिक विरोध से बढ़कर पाकिस्तान के शासन के खिलाफ़ एक व्यापक राजनीतिक चुनौती बन गया है। बिजली की कीमतों और महंगाई को लेकर शुरू हुए प्रदर्शन अब राजनीतिक प्रतिनिधित्व, नागरिक स्वतंत्रता और सरकार की जवाबदेही को लेकर एक बड़े टकराव में बदल गए हैं।
इस आंदोलन के सेंटर में ‘Joint Awami Action Committee’ (JAAC) है। ये व्यापारियों, नागरिक सोशल ग्रुप और राजनीतिक कार्यकर्ताओं का एक गठबंधन (Alliance) है, जो हाल के वर्षों में PoJK में विरोध की सबसे एकजुट आवाज़ों में से एक बनकर उभरा है। हिंसक झड़पों में कम से कम 20 लोगों की मौत की ख़बरों से न केवल जनता के गुस्से की तेज़ी का पता चलता है, बल्कि पाकिस्तानी सरकार और इस एरिया के लोगों के बीच बिगड़ते और कमज़ोर होते रिश्तों का भी संकेत मिलता है।
आंदोलन का विकास
हालिया विरोध प्रदर्शनों की वजह PoJK एंटी-टेररिज्म एक्ट, 2014 के तहत JAAC पर बैन लगाना और उसे आतंकवादी संगठन की लिस्ट में डालना था। ये बैन JAAC द्वारा 9 जून को पूरे इलाके में बुलाए गए बंद से कुछ दिन पहले लगाया गया था। हालांकि, इस संकट की जड़ें बहुत गहरी हैं। PoJK लंबे वक्त से आर्थिक तंगी, कमज़ोर बुनियादी ढांचे, बेरोज़गारी और सीमित राजनीतिक स्वायत्तता से जूझ रहा है। बढ़ती महंगाई और बिजली की आसमान छूती कीमतों ने इन दबी हुई शिकायतों को एक बड़े जन-आंदोलन में बदल दिया।
2024 में, बड़े पैमाने पर हुए विरोध प्रदर्शनों के कारण अधिकारियों को बिजली और आटे पर सब्सिडी की घोषणा करनी पड़ी, जिससे पता चलता है कि लगातार जन-आंदोलन से सरकार से रियायतें हासिल की जा सकती हैं। फिर भी, विरोध प्रदर्शन के नेताओं का तर्क है कि कई वादे या तो आंशिक रूप से लागू किए गए या फिर उनसे बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया। धोखे की इस भावना ने अधिकारियों के प्रति अविश्वास को और बढ़ा दिया है और इस धारणा को मज़बूत किया है कि इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अभाव है।
आंदोलन का ये विकास ख़ास तौर महत्वपूर्ण है। सरकारों के लिए सब्सिडी या अस्थायी राहत उपायों के ज़रिए आर्थिक विरोध प्रदर्शनों को कंट्रोल करना अक्सर आसान होता है। लेकिन जब ऐसे आंदोलन अपनी मांगों को अधिकारों, जवाबदेही और लोकतांत्रिक भागीदारी के रूप में पेश करने लगते हैं, तो वे एक अधिक परमानेंट राजनीतिक स्वरूप ले लेते हैं। ऐसा लगता है कि JAAC ने ठीक इसी पड़ाव को पार कर लिया है।
हालिया कार्रवाई से सामने आए आरोपों ने संकट के राजनीतिक पहलू को और तीख़ा कर दिया है। पुलिस द्वारा बहुत ज़्यादा बल प्रयोग, इंटरनेट बंद करने और पत्रकारों व कार्यकर्ताओं पर प्रतिबंध लगाने के दावों से संकेत मिलता है कि न केवल विरोध प्रदर्शनों को, बल्कि उनसे जुड़ी बातों (नैरेटिव) को भी कंट्रोल करने की कोशिश की जा रही है। आजकल के झगड़ों और विरोध प्रदर्शनों में, कम्युनिकेशन ब्लैकआउट (Suspension of communication services) अक्सर सरकारी तंत्र के अंदर की गहरी चिंताओं का प्रतीक बन जाते हैं। भले ही सरकारें ऐसे कदमों को व्यवस्था बनाए रखने के लिए ज़रूरी बताती हैं, लेकिन अक्सर इनसे लोगों के मन में दमन की भावना और मज़बूत होती है।
पाकिस्तान की सख़्त कार्रवाई से विरोधाभास सामने आया
अशांति से निपटने के पाकिस्तान के तरीके से कश्मीर को लेकर उसके नज़रिए में एक बड़ा विरोधाभास भी सामने आया है। इस्लामाबाद ने हमेशा खुद को कश्मीरी अधिकारों का रक्षक बताया है, ख़ासकर भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य के संदर्भ (Reference) में। हालांकि, PoJK (पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर) में मौजूदा विरोध प्रदर्शनों ने एक असहज स्थिति पैदा कर दी है, जहां पाकिस्तान पर खुद अपने कंट्रोल वाले इलाके में असहमति को दबाने के आरोप लग रहे हैं। भारत ने तुरंत इस विरोधाभास की ओर इशारा करते हुए पाकिस्तान पर ‘बर्बरता’ का आरोप लगाया है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मानवाधिकारों के कथित उल्लंघन के लिए इस्लामाबाद को जवाबदेह ठहराने की अपील की है। PoJK में हुई हिंसा भारत को कश्मीर से जुड़े मुद्दों पर पाकिस्तान के नैतिक रुख को चुनौती देने का मौका देती है।
भारत लगातार पाकिस्तान पर जम्मू-कश्मीर और पंजाब जैसे बॉर्डर एरिया स्टेट में अशांति फैलाने और सीमा पार आतंकवाद का समर्थन करने का आरोप लगाता रहा है। भारत का आरोप है कि इस्लामाबाद ने इलाके को कमजोर करने की अपनी लंबे वक्त से चल रही रणनीति के तहत अलगाववादी नेटवर्क, घुसपैठ की कोशिशों और चरमपंथी तत्वों का साथ दिया है। पाकिस्तान इन आरोपों से इनकार करता है और कहता है कि वह कश्मीरियों को केवल कूटनीतिक और नैतिक समर्थन देता है।
बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (BLF) के प्रमुख अल्लाह नज़र बलूच ने PoJK को ‘आज़ाद कश्मीर’ बताने के पाकिस्तान के दावे को चुनौती दी है। उनका कहना है कि ये इलाका सिर्फ़ नाम के लिए आज़ाद है, जबकि असल में यह पूरी तरह से इस्लामाबाद के कंट्रोल में है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस इलाके से जुड़े बड़े फैसले कश्मीरी लोगों के चुने हुए प्रतिनिधियों के बजाय संघीय अधिकारियों और नौकरशाहों द्वारा लिए जाते हैं।
PoJK की स्थिति के विपरीत, हाल के सालों में जम्मू-कश्मीर में हालात अलग रहे हैं, ख़ासकर 2019 में अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद। हालांकि इस कदम के साथ कड़ी सुरक्षा पाबंदियां, संचार सेवाएं बंद करना और मानवाधिकार समूहों की आलोचना भी हुई, लेकिन तब से नई दिल्ली ने इस इलाके को ज़्यादा राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक एकीकरण की ओर बढ़ते हुए दिखाने की कोशिश की है। स्थानीय स्तर पर चुनाव, बुनियादी ढांचे पर ज़्यादा खर्च और पर्यटन में बढ़ोतरी को प्रमुखता से दिखाया गया है। भारतीय सरकार इसे हालात सामान्य होने के संकेत के तौर पर देख रही है।
प्रवासी लोगों के विरोध-प्रदर्शनों ने अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचा
PoJK के हालात पर International reaction से पता चलता है कि वहां की अशांति अब दक्षिण एशिया से बाहर भी लोगों का ध्यान खींच रही है। 50 से ज़्यादा ब्रिटिश सांसदों की चिंताएं इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने में कश्मीरी प्रवासियों की बढ़ती भूमिका को दिखाती हैं। कश्मीर पर पश्चिमी देशों की राजनीतिक चर्चा को आकार देने में प्रवासियों की सक्रियता का असर तेज़ी से बढ़ रहा है, खासकर यूनाइटेड किंगडम में, जहां बड़ी संख्या में ब्रिटिश-कश्मीरी समुदाय इस क्षेत्र से मज़बूत भावनात्मक और राजनीतिक जुड़ाव रखते हैं।
UK में पाकिस्तानी राजनयिक मिशनों के बाहर हो रहे विरोध-प्रदर्शन दिखाते हैं कि PoJK की घरेलू अशांति अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी फैल रही है। ये अंतरराष्ट्रीय पहलू इस्लामाबाद पर दबाव बढ़ा सकता है, ख़ासकर तब जब संचार व्यवस्था ठप होने और नागरिकों के हताहत होने के आरोप विदेशों में और ज़्यादा चर्चा में आएं।
मौजूदा अशांति का एक और अहम पहलू व्यवस्था-विरोधी भावना का उभरना है। प्रदर्शनकारी अब सिर्फ़ यूटिलिटी बिल या महंगाई पर फोकस नहीं कर रहे हैं। उनकी मांगों में शासन-व्यवस्था को लेकर बढ़ती निराशा झलकती है; कई लोगों का मानना है कि इस व्यवस्था में लोकल लेवल पर फ़ैसले लेने की आज़ादी कम है और जवाबदेही भी बहुत थोड़ी है। ऐसे आंदोलनों को रोकना मुश्किल हो सकता है क्योंकि ये न केवल फिजिकल कठिनाइयों से, बल्कि सम्मान, भागीदारी और राजनीतिक आवाज़ से जुड़े मुद्दों से भी प्रेरित होते हैं।
पाकिस्तानी सरकार के सामने अब एक नाज़ुक चुनौती है। सिर्फ़ सुरक्षा-केंद्रित प्रतिक्रिया से नाराज़गी और बढ़ने और आंदोलन के और फैलने का ख़तरा है। वहीं, सार्थक राजनीतिक रियायतें स्वायत्तता और लोकतांत्रिक सुधारों की और मांगों को बढ़ावा दे सकती हैं। आने वाले महीनों में इस्लामाबाद का रुख़ ही यह तय करेगा कि ये संकट एक क्षेत्रीय विरोध-प्रदर्शन तक ही सीमित रहता है या एक लंबे समय तक चलने वाले राजनीतिक टकराव में बदल जाता है।
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