“मैं तो ग़ज़ल सुना के अकेला खड़ा रहा,
सब अपने अपने चाहने वालों में खो गए।”
यह शे’र पढ़ते ही जिस शायर का नाम ज़ेहन में आता है, वह हैं कृष्ण बिहारी ‘नूर’। उर्दू अदब की दुनिया में ‘नूर’ साहब का नाम उन मक़बूल शायरों में शुमार किया जाता है, जिन्होंने अपनी सादा ज़बान और गहरे एहसासात से लाखों दिलों को छुआ। उनकी ग़ज़लों में ज़िंदगी, मोहब्बत, तन्हाई, इंसानी रिश्ते और वक़्त की सच्चाइयां बेहद ख़ूबसूरती से नज़र आती हैं।
कृष्ण बिहारी ‘नूर’ की पैदाइश 8 नवंबर 1926 को लखनऊ के ग़ौस नगर में हुयी। शुरुआती तालीम घर पर हासिल करने के बाद उन्होंने लखनऊ में अपनी पढ़ाई पूरी की। बाद में लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया और सरकारी मुलाज़मत से जुड़े। उन्होंने लंबे अरसे तक आरएलओ विभाग में ख़िदमत अंजाम दी और 30 नवंबर 1984 को असिस्टेंट मैनेजर के ओहदे से रिटायर हुए।
शायरी का शौक़ उन्हें शुरू से था। मशहूर शायर फ़ज़ल नक़वी से इस्लाह हासिल की और धीरे-धीरे उर्दू अदब में अपनी अलग पहचान बना ली। वे उर्दू और देवनागरी, दोनों लिपियों पर बराबर पकड़ रखते थे। यही वजह थी कि उनकी शायरी हर तबक़े के लोगों तक पहुंची।
‘नूर’ साहब की ग़ज़लों की सबसे बड़ी ख़ासियत उनकी सादगी है। वे मुश्किल अल्फ़ाज़ के बजाय आम ज़बान में ऐसी बातें कह जाते थे जो सीधे दिल में उतर जाती थीं।
“आइना ये तो बताता है कि मैं क्या हूं मगर,
आइना इस पे है ख़ामोश कि क्या है मुझ में।”
“ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं,
और क्या जुर्म है पता ही नहीं।”
जैसे अशआर उनकी फ़िक्र की गहराई और ज़िंदगी के तजुर्बों का आईना हैं।
उन्होंने सिर्फ़ ग़ज़ल ही नहीं, बल्कि नज़्म, कहानी, उपन्यास, नाटक और कविता के मैदान में भी क़लम चलाया। उनकी अहम किताबों में ‘दुख-सुख’, ‘तपस्या’, ‘समंदर मेरी तलाश में’, ‘हुसैनियत की छांव में’ और ‘तजल्ली-ए-नूर’ शामिल हैं। इसके अलावा उनकी कई कहानियां और नाटक भी अदबी हल्क़ों में बेहद पसंद किए गए। उनकी मशहूर कहानी ‘दो औरतें’ का मंचन नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा (NSD) ने भी किया, जिसे ख़ूब सराहा गया।
कृष्ण बिहारी ‘नूर’ ने हमेशा इंसानियत, मोहब्बत और ज़िंदगी की हक़ीक़त को अपनी शायरी का मौज़ू बनाया। उनके अशआर में बनावट नहीं, बल्कि दिल की सच्चाई और एहसास की गर्माहट महसूस होती है। शायद यही वजह है कि आज भी मुशायरों, अदबी महफ़िलों और सोशल मीडिया पर उनके शे’र बार-बार पढ़े और सुनाए जाते हैं।
“चाहे सोने के फ़्रेम में जड़ दो,
आइना झूठ बोलता ही नहीं।”
30 मई 2003 को ग़ाज़ियाबाद के एक अस्पताल में ऑपरेशन के दौरान उनका इंतिक़ाल हो गया। लेकिन उनका कलाम आज भी ज़िंदा है और नई नस्ल को ज़िंदगी की सच्चाइयों से रूबरू कराता है।
कृष्ण बिहारी ‘नूर’ का नाम उर्दू अदब में हमेशा एक ऐसे शायर के तौर पर याद किया जाएगा, जिसने आसान अल्फ़ाज़ में गहरी बातें कहकर अपने कलाम को हमेशा के लिए अमर बना दिया।
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