Friday, October 16, 2026
21.2 C
Delhi

सैयद ग़ुलाम भीक नैरंग: शायरी, सियासत और इल्म की रौशन शख़्सियत

उर्दू अदब की तारीख़ में सैयद ग़ुलाम भीक नैरंग का नाम एक ऐसे शायर, क़ानूनदान और सियासी रहनुमा के तौर पर याद किया जाता है, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा इल्म, अदब और क़ौम की ख़िदमत के लिए सरशार किया। वे सिर्फ़ एक बेहतरीन शायर ही नहीं, बल्कि एक कामयाब वकील, दूरअंदेश सियासतदान और अल्लामा मुहम्मद इक़बाल के बेहद क़रीबी दोस्त भी थे।

सैयद ग़ुलाम भीक नैरंग की पैदाइश 26 सितंबर 1876 को ब्रिटिश भारत के अंबाला के क़रीब दौराना गांव में हुयी। उन्होंने अपनी तालीम गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर से हासिल की। इसी कॉलेज में उनकी मुलाक़ात अल्लामा इक़बाल से हुई। दोनों एक ही हॉस्टल में रहते थे और शायरी का साझा शौक़ उन्हें उम्रभर के लिए एक-दूसरे के क़रीब ले आया। नैरंग ने अपने एक मज़मून में अल्लामा इक़बाल के कॉलेज के दिनों और उनके हॉस्टल के कमरे का ज़िक्र भी किया था। बरसों बाद इसी तहरीर की बदौलत गवर्नमेंट कॉलेज में इक़बाल के कमरे की सही पहचान हो सकी।

तालीम के बाद नैरंग ने वकालत के पेशे को अपनाया, लेकिन उनका दिल अदब और सियासत दोनों से जुड़ा रहा। वे मशहूर अदबी रिसाले “मख़ज़न” के इदारे से भी जुड़े रहे। उनकी शायरी में मोहब्बत, इंसानी जज़्बात, वफ़ा, दर्द और ज़िंदगी की नाज़ुक कैफ़ियत बेहद ख़ूबसूरत अंदाज़ में नज़र आती है।

“आह! कल तक वो नवाज़िश, आज इतनी बेरुख़ी,
कुछ तो निस्बत चाहिए अंजाम को आग़ाज़ से।”

इस शेर में मोहब्बत के बदलते रंग और रिश्तों की नाज़ुक हक़ीक़त को बेहद असरदार अंदाज़ में बयान किया गया है। नैरंग की यही ख़ूबी थी कि वे कम अल्फ़ाज़ में गहरी बात कह देते थे।

“कहते हैं ईद है आज, अपनी भी ईद होती,
हमको अगर मयस्सर जानां की दीद होती।”

इस शेर में आशिक़ के दिल की तड़प और महबूब की एक झलक पाने की आरज़ू बड़ी ख़ूबसूरती से झलकती है।

“दर्द-ए-उल्फ़त का न हो तो ज़िंदगी का क्या मज़ा,
आह-ओ-ज़ारी ज़िंदगी है, बेक़रारी ज़िंदगी।”

नैरंग के यहां इश्क़ सिर्फ़ जज़्बा नहीं, बल्कि ज़िंदगी को समझने का एक ज़रिया बन जाता है। उनकी शायरी में रिवायती उर्दू ग़ज़ल की मिठास भी है और एहसास की गहराई भी। उनका यह शेर भी काफ़ी मक़बूल है।

“दाना-ओ-दाम संभाला मिरे सय्याद ने फिर,
अपनी गर्दन है वही, इश्क़ का फंदा है वही।”

इस शेर में इश्क़ की बेबसी और इंसानी जज़्बात की कैफ़ियत को बेहद ख़ूबसूरती से पेश किया गया है।

सैयद ग़ुलाम भीक नैरंग सिर्फ़ अदबी दुनिया तक महदूद नहीं रहे। वे ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के अहम रहनुमाओं में शामिल थे और 1938 से 1942 तक उसके डिप्टी लीडर रहे। वे सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली के सदस्य भी रहे और ख़िलाफ़त तहरीक में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने उस दौर में मुसलमानों के सामाजिक और सियासी हक़ूक़ के लिए अहम काम किया।

बाद में पाकिस्तान क़ायम होने के बाद वे वहां हिजरत कर गए और 1950 में पाकिस्तान की पहली क़ौमी असेंबली (Constituent Assembly) के सदस्य बनाए गए। उनकी सियासी ज़िंदगी भी उतनी ही कामयाब रही, जितनी उनकी अदबी ज़िंदगी।

उनके इंतिक़ाल के कई साल बाद उनकी शायरी का मजमूआ “कलाम-ए-नैरंग” कराची से शाया हुआ। इस किताब ने नई नस्ल को उनकी शायरी से दोबारा रूबरू कराया और उन्हें उर्दू अदब में एक मज़बूत मुक़ाम दिलाया।

16 अक्तूबर 1952 को सैयद ग़ुलाम भीक नैरंग इस दुनिया से रुख़्सत हो गए, लेकिन उनकी शायरी आज भी ज़िंदा है। उनके अशआर में मोहब्बत की नर्मी, जज़्बात की सच्चाई और ज़िंदगी की गहरी समझ साफ़ दिखाई देती है। यही वजह है कि सैयद ग़ुलाम भीक नैरंग का नाम उर्दू अदब के उन शायरों में हमेशा इज़्ज़त और एहतराम के साथ लिया जाएगा, जिनकी शायरी हर दौर में दिलों को छूती रहेगी।

ये भी पढ़ें: क़मर जलालाबादी: जिनकी क़लम से निकले सदाबहार नग़मे 

आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

हसन नईम: ग़म को अपनी ताक़त बनाने वाले शायर

हसन नईम ने अपनी शायरी के ज़रिए ज़िंदगी के...

5,000 घंटे की उड़ान, चार दशक की ख़िदमत: Air Chief Marshal AP Singh का शानदार सफ़र

जब कोई लड़ाकू विमान आवाज़ की रफ़्तार को पार...

वहीद अख़्तर: शायरी, फ़लसफ़े और इल्म की दुनिया का एक अहम नाम

उर्दू अदब की दुनिया में शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का...

Topics

हसन नईम: ग़म को अपनी ताक़त बनाने वाले शायर

हसन नईम ने अपनी शायरी के ज़रिए ज़िंदगी के...

5,000 घंटे की उड़ान, चार दशक की ख़िदमत: Air Chief Marshal AP Singh का शानदार सफ़र

जब कोई लड़ाकू विमान आवाज़ की रफ़्तार को पार...

वहीद अख़्तर: शायरी, फ़लसफ़े और इल्म की दुनिया का एक अहम नाम

उर्दू अदब की दुनिया में शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का...

मुजतबा हुसैन: हंसी के पीछे छुपी सच्चाई का बेमिसाल क़लमकार

उर्दू अदब में तंज़-ओ-मज़ाह की बात हो और मुजतबा...

Balbir Singh Senior: भारतीय हॉकी को गोल्ड की राह दिखाने वाले

भारतीय हॉकी के इतिहास में जब भी बड़े खिलाड़ियों...

Related Articles

Popular Categories