उर्दू अदब की तारीख़ में कुछ ऐसी शख़्सियतें भी गुज़री हैं जिन्होंने सिर्फ़ कलम से नहीं, बल्कि अपनी सियासी सूझ-बूझ, इल्मी सरपरस्ती और अदबी ज़ौक़ से भी इतिहास में अपनी पहचान बनाई। महाराजा चंदू लाल ‘शादां’ ऐसी ही एक बहुआयामी शख़्सियत थे।
सन् 1766 में पैदा हुए चंदू लाल का ताल्लुक़ एक पंजाबी खत्री मल्होत्रा परिवार से था। उनके बुज़ुर्ग मुग़ल दरबारों से जुड़े रहे थे और बाद में उनका परिवार दक्कन आकर हैदराबाद में बस गया। यह वही दौर था जब हैदराबाद रियासत इल्म, अदब और तहज़ीब का एक बड़ा मरकज़ बन रही थी।
चंदू लाल ने अपने करियर की शुरुआत हैदराबाद रियासत के सीमा शुल्क विभाग के एक मामूली कर्मचारी के रूप में की। लेकिन उनकी काबिलियत, मेहनत और प्रशासनिक समझ ने उन्हें धीरे-धीरे सत्ता के सबसे ऊंचे गलियारों तक पहुंचा दिया। निज़ाम सिकंदर जाह के दौर में उन्हें पहले “राजा बहादुर”, फिर “राजा राजायान” और बाद में “महाराजा” जैसे प्रतिष्ठित ख़िताबों से नवाज़ा गया।
आख़िरकार वे हैदराबाद रियासत के प्रधानमंत्री बने और कई वर्षों तक इस महत्वपूर्ण पद पर रहे। मगर चंदू लाल की पहचान केवल एक सफल प्रशासक की नहीं थी। उनके दिल में अदब और शायरी के लिए भी गहरी मोहब्बत थी।
शायरी की दुनिया में वे “शादां” तख़ल्लुस से मशहूर थे। फ़ारसी और उर्दू दोनों ज़बानों में उन्होंने शायरी की। उनकी ग़ज़लों में इश्क़, रूहानियत, इंसानी जज़्बात और ज़िंदगी की नाज़ुक कैफ़ियतें बड़ी ख़ूबसूरती से दिखाई देती हैं।
“आंख से पर्दा न कर, पर्दे का घर ये भी तो है,
तू तो देखे, हम न देखें, तुर्फ़ा-तर ये भी तो है।”
इस शेर में इश्क़ की नज़ाकत और दीदार की तड़प दोनों महसूस की जा सकती हैं।
“आता नहीं जो सामने मारे हिजाब के,
हम दिल से हैं निसार उसी आफ़्ताब के।”
महाराजा चंदू लाल सिर्फ़ शायर ही नहीं थे, बल्कि उर्दू अदब के बड़े सरपरस्त भी थे। उनके दरबार में अक्सर मुशायरों की महफ़िलें सजती थीं। वे खुद भी इन महफ़िलों में शिरकत करते और शायरों की हौसला-अफ़ज़ाई करते।
दिल्ली और उत्तर भारत के कई मशहूर शायरों को उन्होंने हैदराबाद आने की दावत दी। कहा जाता है कि उन्होंने ज़ौक़, नासिख़ और मिर्ज़ा ग़ालिब जैसे उस्ताद शायरों को भी अपने दरबार में बुलाने की कोशिश की थी। भले ही वे किसी वजह से हैदराबाद न आ सके, लेकिन इससे चंदू लाल के अदबी ज़ौक़ का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
उनकी शायरी में इश्क़ के साथ-साथ ख़ुदा पर यक़ीन और इंसानी बेबसी का एहसास भी मिलता है।
“भरोसा है तिरा ही और है तेरे सिवा किस का,
न देवे आसरा जब तू, मुझे हो आसरा किस का।”
इस शेर में बंदे और ख़ुदा के रिश्ते की गहराई साफ़ झलकती है।
महाराजा चंदू लाल ‘शादां’ का इंतिक़ाल 15 अप्रैल 1845 को हुआ, लेकिन उनका नाम आज भी हैदराबाद की तहज़ीब, उर्दू अदब और दक्कनी संस्कृति के साथ जुड़ा हुआ है।
नूर था या शो’ला था या बर्क़ या ख़ुर्शीद था
कुछ तो ऐ मूसा कहो क्या था वो जल्वा तूर का
वे उन चुनिंदा लोगों में थे जिन्होंने सत्ता की ऊंचाइयों पर रहते हुए भी अपने दिल में शायरी और अदब के लिए जगह बनाए रखी। यही वजह है कि इतिहास उन्हें केवल हैदराबाद के प्रधानमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि उर्दू शायरी के एक अहम सरपरस्त और ख़ूबसूरत शायर के रूप में भी याद करता है।
महाराजा चंदू लाल ‘शादां’ की ज़िंदगी इस बात की मिसाल है कि इल्म, अदब और प्रशासन—तीनों को एक साथ लेकर चलना भी एक फ़न है, और वे इस फ़न के कामयाब उस्ताद थे।
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