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ज़िया फ़तेहाबादी: सादगी, मोहब्बत और उर्दू अदब का एक दरख़्शां सितारा 

उर्दू अदब की दुनिया में ज़िया फ़तेहाबादी का नाम बड़ी अक़ीदत और एहतराम से लिया जाता है। उनका असली नाम मेहर लाल सोनी था। 9 फ़रवरी 1913 को पंजाब के कपूरथला में पैदा हुए ज़िया फ़तेहाबादी ने अपनी तालीम जयपुर, अमृतसर और लाहौर में हासिल की। उनका बचपन और नौजवानी उस दौर में गुज़री जब हिंदुस्तान की अदबी फ़िज़ा में नई सोच, नए तजुर्बे और नए जज़्बात उभर रहे थे। लाहौर का माहौल उनके लिए सिर्फ़ तालीम का मरकज़ नहीं था, बल्कि वही से उनकी शख़्सियत को अदबी पहचान मिली। इसी शहर में उनकी मुलाक़ात फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, मीराजी और दूसरे बड़े अहल-ए-क़लम से हुई, जिनकी सोहबत ने उनके अंदर शायरी का शौक़ और भी गहरा कर दिया। यह वही दौर था जब ज़िया फ़तेहाबादी ने महसूस किया कि शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का खेल नहीं, बल्कि दिल की सच्ची आवाज़ और ज़िंदगी के तजुर्बों का आईना है।

कहा जाता है कि ज़िया फ़तेहाबादी भी उसी मीरा सेन से मोहब्बत करते थे, जिनकी याद में मीराजी ने अपना तख़ल्लुस “मीराजी” इख़्तियार किया। यह किस्सा उनकी ज़िंदगी और शायरी दोनों में एक दिलचस्प और नाज़ुक पहलू के तौर पर याद किया जाता है। मोहब्बत, इंतज़ार और जुदाई के जो एहसास उनकी शायरी में दिखाई देते हैं, उनमें इस किस्से की परछाइयां भी महसूस की जा सकती हैं। उनकी शायरी में इश्क़ सिर्फ़ एक निजी जज़्बा नहीं रहता, बल्कि इंसानी रिश्तों की गहराई, टूटन और उम्मीद का बयान बन जाता है। यही वजह है कि उनके अशआर पढ़ते हुए पाठक को लगता है जैसे शायर अपने दिल की सबसे सच्ची बात बहुत सादगी से कह रहा हो।

ज़िया फ़तेहाबादी मशहूर शायर सीमाब अकबराबादी के शागिर्द रहे। सीमाब की शागिर्दी ने उन्हें शायरी की तकनीक, ज़बान की नज़ाकत और बयान की पुख़्तगी सिखाई। उन्होंने 1936 में रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया की नौकरी शुरू की और बाद में डिप्टी चीफ़ ऑफ़िसर के ओहदे से रिटायर हुए। यह बात उनकी ज़िंदगी को और भी दिलचस्प बनाती है कि एक तरफ़ वह सरकारी और दफ़्तरी ज़िम्मेदारियों को निभा रहे थे, और दूसरी तरफ़ अदब की दुनिया में अपनी अलग पहचान भी बना रहे थे। मुलाज़मत की मशग़ूलियतों के बावजूद उनका रिश्ता शायरी से कभी कमज़ोर नहीं पड़ा। बल्कि कहा जा सकता है कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी के तजुर्बों ने उनकी शायरी को और ज़्यादा सच्चा, ज़मीन से जुड़ा और असरदार बना दिया।

ज़िया फ़तेहाबादी की शायरी की सबसे बड़ी ख़ूबी उसकी सादगी, नर्मी और इंसानी जज़्बात की सच्ची तर्जुमानी है। उन्होंने मुश्किल और भारी-भरकम अल्फ़ाज़ के बजाय आसान ज़बान में मोहब्बत, जुदाई, उम्मीद, इंसानियत और ज़िंदगी के एहसासात को बयान किया। उनकी शायरी में बनावट कम और सच्चाई ज़्यादा है। वह अपने पाठक को किसी पेचीदा फ़लसफ़े में उलझाते नहीं, बल्कि सीधे दिल तक पहुंचते हैं। उनकी ग़ज़लें और नज़्में आज भी उतनी ही ताज़गी और असर रखती हैं जितनी अपने दौर में रखती थीं। यही वजह है कि उनकी शायरी सिर्फ़ अदबी हलक़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि आम पाठकों के दिलों में भी जगह बनाती रही।

उजालों को ढूंढो, सहर को पुकारो
अंधेरों में रोने से क्या फ़ायदा है।

इन पंक्तियों में उम्मीद का वह पैग़ाम छुपा है जो ज़िया फ़तेहाबादी की शायरी की रूह को बयान करता है। वह मायूसी के बजाय हिम्मत और रौशनी की तरफ़ बुलाते हैं। इसी तरह मोहब्बत की नज़ाकत को यूं बयान करते हैं।

नज़र नज़र से मिलाना कोई मज़ाक नहीं,
मिला के आंख चुराना कोई मज़ाक नहीं।

यहां इश्क़ की संजीदगी और रिश्तों की बारीकी साफ़ दिखाई देती है। उनकी शायरी में इश्क़ हल्का-फुल्का खेल नहीं, बल्कि एक गहरी और ज़िम्मेदार कैफ़ियत है। जबकि फ़रहाद की मिसाल देकर इरादे की अज़मत बताते हैं।

पहाड़ काट तो सकता है तेशा-ए-फ़रहाद,
पहाड़ सर पे उठाना कोई मज़ाक नहीं।

इन अशआर में मेहनत, हौसले और अज़्म की ताक़त झलकती है। ज़िया फ़तेहाबादी सिर्फ़ इश्क़ के शायर नहीं थे, बल्कि वह इंसानी हिम्मत और जद्दोजहद के भी शायर थे। विरह और इंतज़ार की कैफ़ियत इन अशआर में झलकती है।

तारे तो दें ताने, मुझको चांदा मुझे तड़पाए,
रैन बिरह की सांय-सांय करके रोज़ डराए।

यहां रात, तारे और चांद के ज़रिए जुदाई की तन्हाई को बहुत ख़ूबसूरती से बयान किया गया है। 

ज़िया फ़तेहाबादी ने तक़रीबन छह दशकों तक उर्दू अदब की ख़िदमत की। उन्होंने ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई, क़िता, गीत, अफ़साने और मज़ामीन जैसी कई अदबी सिन्फ़ों में यादगार काम किया। उनकी रचनाओं में ज़िंदगी की सच्चाइयां, इंसानी रिश्तों की गर्माहट और उम्मीद की रौशनी बराबर दिखाई देती है। वह उन शायरों में शामिल हैं जिन्होंने अदब को सिर्फ़ तख़य्युल की दुनिया नहीं रहने दिया, बल्कि उसे आम इंसान के एहसासात से जोड़ दिया। उनकी शायरी आज भी इस बात की गवाही देती है कि सच्चा अदब वक़्त की सरहदों से आगे निकलकर हर दौर में अपनी रौशनी बिखेरता रहता है। ज़िया फ़तेहाबादी का नाम इसलिए याद रखा जाएगा कि उन्होंने सादगी को ख़ूबसूरती, मोहब्बत को संजीदगी और उम्मीद को शायरी की सबसे बड़ी ताक़त बना दिया।

ये भी पढ़ें: क़मर जलालाबादी: जिनकी क़लम से निकले सदाबहार नग़मे 

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