लखनऊ (Lucknow) सिर्फ शहर नहीं, एक अंदाज-ए-बयां है। यहां की गलियां ‘अदब’ सिखाती हैं, यहां के लहज़े में ‘तकल्लुफ’ है, और यहां के रिवाजों में ‘इंसानियत’ झांकती है। ऐसी ही एक रिवायत है ‘खर्चा-ए-पानदान’ (kharcha-e-paandaan)। ये कोई रोज़मर्रा का लेन-देन नहीं, बल्कि मुहब्बत का सिक्का, इज़्ज़त का ख़त और औरतों की ख़ुदमुख्तारी का सबूत था।

पानदान: नवाबी शान का ताज
पुराने लखनऊ के किसी आलीशान महल में चले जाइए। बेगम साहिबा अपने मुसद्दर पर तकिया लगाए बैठी हैं। उनके बाजू में रखा है चांदी का एक पानदान। ये कोई साधारण डिब्बा नहीं, बल्कि ‘शाही’ निशानी है। इस पर नक्काशी इतनी बारीक कि उंगली फेरने लगे, तो शेर-ओ-शायरी के मिसरे याद आ जाएं।
उस पानदान के खानों में सजी होती हैं, हर डिब्बे में से आती है-तम्बाकू की सौंधी खुशबू, गुलकंद की मीठी रवायत, इलायची और सुपारी के चूरा, और बीच में रखा वो कत्था-चूने का ‘शगुफ्ता’ सलामती।

यहां की औरतें पीकदानों से पीक गिराने का भी ठाठ रखती थीं। पान सिर्फ एक शौक नहीं था, ये उनकी सांसों की खुशबू, रंगत की रौनक और महफिल की शान थी। बिना पान के महफिल अधूरी, और बिना पानदान के बेगम अधूरी।
खर्चा-ए-पानदान क्या है?
इसके बारे में DNN24 को नुसरत नाहिद जो लखनऊ समेत पूरे देश की फेमस अमीरुद्दौला लाइब्रेरी की लाइब्रेरियन रह चुकी हैं, साथ ही उन्होंने लखनऊ के ऊपर कई किताबें में लिखी हैं, बताती हैं कि नवाबी परिवारों में शादी के बाद एक बहुत खूबसूरत रस्म होती थी। बारात के बाद शौहर या ससुराल वाले पानदान के लिए अलग से एक अलग रकम तय करते थे। क्योंकि उस दौर में पान का अपना एक अलग मुकाम था, इसे एक लग्ज़री चीजों में शुमार किया जाता था। और घर में जब भी कोई मेहमान आता था तब घर की औरतें बहुत ही तमीज़ के साथ पान सर्व करती थीं। और इसी खर्च को ‘खर्चा-ए-पानदान’ कहा जाता था। नुसरत नाहिद कहती हैं इसे ‘Pocket Money’ समझने की भूल मत कीजिएगा। ये तो बेगम की निजी ‘सल्तनत’ थी।

इस रकम पर शोहर का कोई अधिकार नहीं था। बेगम इससे पान की बीड़ी, इत्र, महंगी सुपारी या फिर अपने लिए जेवर तक ख़रीद सकती थीं। ये पैसा बेगम को इस कदर इज्जत के साथ मिलता था कि शोहर को ये पूछने का भी हक नहीं था कि ‘तुमने ये पैसा कहां खर्च किया’?

लखनऊ की तहज़ीब में ये एक पर्दा-पोशी और बेगम की ‘रियासत’ का प्रतीक था। जिस घर में खर्चा-ए-पानदान बड़ा होता, वहां बेगम का ठाठ अलग होता, उनकी दोस्तों के बीच इज्जत अलग होती।

मुस्लिम लॉ की निगाह में: ‘खर्चा-ए-पानदान’ बनाम ‘पिन मनी’
अब बात करते हैं अंग्रेजों के ज़माने और कानून की। ब्रिटिश हुकूमत में एक मशहूर मुकदमा हुआ। ये मुकदमा था ख़्वाजा मोहम्मद ख़ान बनाम हुसैनी बेगम (1910)। इस केस ने तहज़ीब को कानून की ज़बान दे दी। इसके बारे में हमने जाना कुलसुम फिरदौस से जो इलाहाबाद हाईकोर्ट के लखनऊ बेंच की वकील हैं।

कुलसुम फिरदौस बताती हैं कि अंग्रेजी कानून में ‘Pin money’ होती है, जहां शौहर बीवी को पिन मनी यानि एक छोटी रकम देता था जो पत्नी के निजी खर्च के लिए होती थी। इस पर कर नहीं लगता था, लेकिन इस रकम पर शौहर का पूरा इख्तियार होता था। पिन मनी सदियों से चली आ रही है और आज भी कई मुल्कों में ये इस्तेमाल हो रही है। लेकिन मुस्लिम लॉ और लखनऊ की रिवायत ने इसे बदल दिया।
प्रिवी काउंसिल (उस वक्त की सबसे बड़ी अदालत) ने साफ कहा-
- ये हक है, तोहफा नहीं: खर्चा-ए-पानदान बेगम का हक़ है। इसे शोहर कभी वापस नहीं ले सकता।
- अलग रहने पर भी बनेगा: एक बेगम ने शोहर के जुल्म से तंग आकर ससुराल छोड़ दिया। ससुर ने कहा, ‘अब तुम्हारे लिए कोई पान नहीं, कोई खर्चा नहीं।’ मगर अदालत ने कहा, जब तक तलाक नहीं हुआ, तब तक खर्चा-ए-पानदान बेगम की जेब में जाता रहेगा। चाहे वो कहीं भी रहे।’
- जहेज़ का हिस्सा: अदालत ने ये भी कहा कि जिस तरह मुस्लिम लॉ में शादी एक ‘कांट्रैक्ट’ है, उसी तरह खर्चा-ए-पानदान उस कांट्रैक्ट का एक शर्त (condition) हो सकता है। अगर शोहर ये देने से इंकार करे, तो बीवी अदालत में इसकी वसूली कर सकती है।

सुनने में ताज्जुब होगा, लेकिन उस दौर के जज साहिब ने ये भी कहा कि पैसा बेगम को उस वक्त भी मिलेगा, जब वो खुद शोहर के घर से निकल गई हों, बशर्ते उनकी निकाह बाकी हो। ये लखनऊ की नवाबियत का कमाल था कि एक औरत को पान के डिब्बे के एवज में इतनी बड़ी कानूनी ढाल मिल गई।
आज की नज़र में: मिट्टी या मिठास?
आज हम कहां और वो दौर कहां? अब न तो चांदी के पानदान बनते हैं, न गुलकंड के लिए बाग़ लगते हैं। मगर लखनऊ की तहज़ीब भले ही बदल गई हो, लेकिन रूह आज भी ज़िंदा है। आज भी शादियों में ‘खर्चा-ए-पानदान’ के नाम पर दुल्हन को एक अलग लिफाफा दिया जाता है। शायद वो पहले जैसा बड़ा न हो, मगर वो इज्ज़त का रिवाज आज भी है।
कानून की किताबों में खर्चा-ए-पानदान ‘हक-ए-तकर्रुर’ (स्टिपेंड) की शक्ल में जिंदा है, और बुजुर्गों की जुबान पर ‘पुराने ज़माने की सखावत’ के किस्से के तौर पर।

लखनऊ के मिजाज़ का आईना है खर्चा-ए-पानदान
खर्चा-ए-पानदान सिर्फ चांदी के डिब्बे में रखा एक सिक्का नहीं था। ये लखनऊ के मिजाज का आईना था। जहां औरतों के लिए इज्जत का मतलब उन्हें ‘बोझ’ समझना नहीं, बल्कि उनके जमाल (खूबसूरती) और खिदमत की कद्र करना था।
जब कोई नवाब अपनी बेगम को खर्चा-ए-पानदान देता था, तो वो ये नहीं कहता था ‘ले ये पैसे हैं, बल्कि कहता था, ‘जी, आपकी सांसों की खुशबू पर मेरी जान, ये लीजिए अपने शौक पूरे करने के लिए।’ और यही वो नफासत है जिसकी वजह से लखनऊ आज भी ‘शहर-ए-तहज़ीब’ कहलाता है। पानदान तो सिर्फ बहाना था, बात तो ‘एहसास’ की थी।
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