ज़रा सोचिए… सुबह का वक़्त है। सामने बर्फ़ से लदी हिमालय की चोटियां धूप में सोने जैसी चमक रही हैं। ठंडी हवा चेहरे को छूती है, और दूर कहीं किसी मंदिर की घंटी बज रही है। अब उसी मंज़र में अगर किसी पहाड़ी घर की रसोई से उठती मसालों और घी की खुशबू शामिल हो जाए तो समझ लीजिए, आप उत्तराखंड की रूह को महसूस कर रहे (Uttarakhand’s Traditional Thali: The Soul of the Mountains, A Celebration of Flavors) हैं।
जब भी कोई उत्तराखंड का नाम सुनता है, तो दिमाग़ में आमतौर पर बर्फ़ीले पहाड़, ठंडी नदियां और सुकून भरे हिल स्टेशन आते हैं। लेकिन असली उत्तराखंड उसकी सांसें, उसके दर्द, उसकी मेहनत और उसका प्यार, वो उसके खाने में छुपा है। पहाड़ी थाली सिर्फ़ खाना नहीं है। ये एक ज़िंदा इतिहास है। ये उन हज़ारों सालों की कहानी है जब इंसान ने इन मुश्किल रास्तों, ठिठुरती रातों और उपजाऊ ज़मीन से खुद को खिलाने का हुनर सीखा।

यहां की थाली में वो सब्र है, जो एक पहाड़ी औरत अपनी सिलबट्टे पर बैठकर दाल पीसते वक्त बरतती है। वो दम है, जो लोहे के कड़ाहे में कफूली पकते वक़्त निकलता है। और वो प्यार है, जो मंडुए की रोटी पर घी लगाते हाथों में दिखता है।
गढ़वाल हो या कुमाऊं ,एक ही थाली में दोनों की रूह समा जाती है। तो आइए, चलते हैं उस सफ़र पर जहां खाने से ज़्यादा एहसास खाया जाता है।
जहां थाली में सादगी होती है
यहां का खाना न तो रेस्टोरेंट जैसा चटक है, न ज़्यादा मसालों से भरा। उत्तराखंडी खाने में मिट्टी की ख़ुशबू, बैलेंस और ताकत होती है। तेल कम, मसाले दिल को भाने वाले, और हर सामग्री अपनी असली शक्ल में पेश होती है।

दिल का करार हैं आलू के गुटके
जैसे बिना सलाम के महफ़िल अधूरी, वैसे ही उत्तराखंड की थाली बिना आलू के गुटके के नहीं जमती। सरसों के तड़के, लाल मिर्च और हरे धनिये से बने ये आलू-मंडुआ की रोटी के संग बेहद लज़ीज़ लगते हैं।

दालों की सल्तनत
यहां के हर घर में दालों की बादशाहत है। फानू भीगे और पिसे गहत या अरहर की दाल को घंटों उबालकर बनाया जाता है, गाढ़ा और दिल को भाने वाला। चैंसू काली उड़द को भूनकर बनाया जाता है, रंग गहरा और महक ऐसी जैसे पहाड़ की रात हो। गहत की दाल तो सर्दियों में सेहत की रक्षा करती है, गुर्दों के लिए रहमत से कम नहीं।

कांदली का साग और कफ़ूली
पहाड़ों के जंगलों में कांदली (बिच्छू घास) उगती है। छूने में जलन, मगर पकने के बाद मलाई जैसा साग। और कफ़ूली? ये पालक और मेथी का हरा-भरा करी है, जो लोहे के कड़ाहे में पकती है, सेहत और ज़ायका, दोनों।

भांग की चटनी और रायता
हर थाली को तड़क देने वाली भांग की चटनी, भुने भांग के बीज, जीरा, नींबू। नट्टी सी खुशनुमा, लत लगाने वाली। उसके बगल में ठंडी खीरे की रायता, गरमा-गरम पकवानों के बीच सुकून की फुहार।

मंडुए की रोटी
बिना मंडुए की रोटी के थाली अधूरी। मंडुआ यानी रागी जो है सदियों से पहाड़ी इंसान की ताकत। ये ग्लूटेन-फ़्री रोटी, जिस पर घी की मलाई से लिबास हो, घर जैसा एहसास देती है।

पत्थर का ज़ायका है थेचवानी
थेचवानी यानी सिलबट्टे पर मूसल से कुचले आलू या मूली। देहाती, दमदार, थोड़ा तीखा। जैसे पहाड़ों का एक बॉसी दोस्त — मुख्तसर अंदाज़ में पूरा ज़ोर।

मिठास का इंतज़ाम
खाने का ख़ात्मा मीठे के बिना कैसे?
झंगोरे की खीर: बार्नयार्ड बाजरे से बनी, हल्की-फुल्की और इलायची से महकती।
बाल मिठाई: उत्तराखंड की शान। भूने खोये पर चीनी के छोटे मोती, जिसे लोग प्यार से ‘पहाड़ों की चॉकलेट’ कहते हैं।
सिंगोड़ी :नारियल और खोये को मालू के पत्ते में लपेटकर, ऐसी सोंधी महक कि याद रह जाए।
ये भी पढ़ें: हीरे के पेपरवेट और 50 Rolls-Royce वाले बादशाह: जब TIME मैगज़ीन ने निज़ाम को कहा था ‘The World’s Richest Man’
आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।



