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Padma Shri 2026: 30 हज़ार शो, गायों की सेवा और Mir Haji Kasam का सफ़र

कुछ लोग अपनी बातों से पहचाने जाते हैं और कुछ अपने हुनर से। Mir Haji Kasam उन कलाकारों में से हैं, जिनकी पहचान उनकी ढोलक की थाप है। गुजरात के लोक संगीत को नई पहचान देने वाले Mir Haji Kasam को पद्मश्री 2026 से सम्मानित किया गया। उनके लिए ढोलक सिर्फ़ साज़ नहीं है बल्कि एक खिलौना है, जिससे वो अलग-अलग तरह की आवाज़ें निकाल लेते हैं।

बचपन का संघर्ष और संगीत से रिश्ता

जूनागढ़, गुजरात में पैदा हुए मीर हाजी कासम का बचपन आसान नहीं था। छोटी उम्र में ही उनकी मां का इंतक़ाल हो गया था। उनके पिता मीर समुदाय से ताल्लुक़ रखते थे और अलग-अलग कार्यक्रमों में ढोलक बजाकर घर चलाते थे। घर में संगीत का माहौल था, इसलिए छोटा कासम भी अपने पिता के साथ बैठकर ढोलक बजाने लगा। वो घंटों रियाज़ करता और अपने पिता जैसा कलाकार बनने की कोशिश करता। धीरे-धीरे उसकी उंगलियों में भी वही जादू उतर आया, जिसने आगे चलकर उसे देशभर में मशहूर कर दिया।

Image: PB SHABD

होटल की नौकरी से महफिलों तक

जवानी के दिनों में Mir Haji Kasam दिन में एक होटल में काम करते थे और रात में अपने पिता के साथ भजन, क़व्वाली और लोक संगीत के कार्यक्रमों में ढोलक बजाने जाते थे। संगीत उनके लिए सिर्फ़ शौक़ नहीं था, बल्कि ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका था। उन्होंने मशहूर लोक गायिका दिवाली बेन के साथ भी नवरात्रि के कार्यक्रमों में ढोलक बजाया। उनकी मेहनत और हुनर ने धीरे-धीरे संगीत की दुनिया में अपनी जगह बना ली।

प्राणलाल व्यास के साथ बदली ज़िंदगी

Mir Haji Kasam की ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब उन्हें मशहूर लोक गायक प्राणलाल व्यास के साथ बजाने का मौक़ा मिला। एक कार्यक्रम में उन्होंने अपने पिता की जगह ढोलक बजाया। उनकी कला देखकर प्राणलाल व्यास इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनके पिता से कहा, “तुम्हारा बेटा तुमसे दो कदम आगे निकल गया है।” इसके बाद क़रीब पचास साल तक Mir Haji Kasam ने उनके साथ ढोलक बजाई। इसी सफ़र ने उन्हें गुजरात के लोक संगीत का बड़ा नाम बना दिया। भजन हो, ग़ज़ल हो या क़व्वाली, हर महफ़िल में उनकी ढोलक की थाप लोगों के दिलों तक पहुंचती रही।

Mir Haji Kasam ने ढोलक को सिर्फ़ संगत करने वाला वाद्य नहीं रहने दिया। उन्होंने इसे एक ऐसे साज़ के तौर पर पेश किया, जो अकेले पूरी महफ़िल को बांध सकता है। उनकी अपनी अलग शैली बनी, जिसमें ताल के साथ भावनाएं भी सुनाई देती थी। यही वजह है कि लोग सिर्फ़ गायक को सुनने नहीं, बल्कि उनकी ढोलक सुनने भी आते थे।

Image: PB SHABD

गौशालाओं के लिए किए 30 हज़ार शो

Mir Haji Kasam का सफ़र सिर्फ़ संगीत तक सीमित नहीं रहा। गुजरात में अकाल के दौरान जब गायों के लिए चारे की भारी कमी हुई, तब उन्होंने गौशालाओं के लिए मदद जुटाने का फैसला किया। उन्होंने गांव-गांव और शहर-शहर जाकर लगभग तीस हज़ार चैरिटी शो किए। इन कार्यक्रमों से जुटाई गई रकम गायों के चारे और गौशालाओं की मदद में लगाई गई। उनके लिए संगीत सिर्फ़ कला नहीं, बल्कि इंसानियत की ख़िदमत का ज़रिया भी था।

पद्मश्री मिलने की ख़बर पर भी Mir Haji Kasam की सादगी साफ़ दिखाई देती है। वो कहते हैं, “मुझे कभी बोलना नहीं आया। मेरी ढोलक बोलती है। लोग उसी को पहचानते हैं।” यही सादगी और यही समर्पण उन्हें ख़ास बनाता है। उनका सफ़र बताता है कि असली कला वही होती है, जो दिल से निकले और लोगों के दिलों तक पहुंचे।

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