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Hemkund Sahib की खोज: एक अनोखी दास्तान

हिमालय की बुलंद पहाड़ियों के बीच एक ऐसी झील मौजूद है, जिसका ज़िक्र आज से क़रीब तीन सौ साल पहले Guru Gobind Singh ने अपनी रचना में किया था। हैरत की बात ये है कि इतने लंबे वक़्त तक लोग उस जगह को ढूंढ ही नहीं पाए। आज जिसे Hemkund Sahib के नाम से जाना जाता है, वो समुद्र तल से करीब 15 हज़ार फीट की ऊंचाई पर मौजूद है। बर्फ़ से ढकी सात चोटियों के बीच एक शांत झील के किनारे बनी ये जगह सिखों के सबसे पाक तीर्थों में गिनी जाती है।

सिख मान्यताओं के मुताबिक, यही वो मुक़ाम है जहां गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने पिछले जन्म में कठिन तपस्या की थी और रूहानी तौर पर परमात्मा से जुड़ाव हासिल किया था। गुरु साहिब ने खुद बचित्तर नाटक में इस जगह का ज़िक्र बेहद ख़ूबसूरत और साफ़ अल्फ़ाज़ में किया है।

उन्होंने लिखा था: “हेमकुंट परबत है जहां, सप्त सृंग शोभित है तहां। सप्त सृंग तिह नाम कहावा, पांडु राज जह जोग कमावा। तह हम अधिक तपस्या साधी, महाकाल कालका आराधी।” इन पंक्तियों में एक ऐसी जगह का बयान है, जहां सात पहाड़ हैं, एक पवित्र सरोवर है और जहां राजा पांडु ने योग साधना की थी। गुरु साहिब लिखते हैं कि उन्होंने वहीं तपस्या की और आध्यात्मिक ज्ञान हासिल किया। अल्फ़ाज़ तो लोगों के सामने थे, लेकिन जगह कहां है, ये किसी को मालूम नहीं था।

एक ऐसी जगह जिसे पहाड़ों के लोग पहले से जानते थे

इस तपस्या स्थल का ज़िक्र कवि संतोख सिंह की 1843 में छपी किताब ‘सूर्य प्रकाश’ में भी विस्तार से किया गया है। जहां सिख दुनिया इस जगह को तलाश रही थी, वहीं उत्तराखंड के गढ़वाल इलाक़े के लोग इस मुक़ाम से पहले से वाकिफ़ थे। वो इसे “लोकपाल” कहते थे, जिसका मतलब होता है — दुनिया की हिफाज़त करने वाला।

19वीं सदी के आख़िरी दौर में एक विद्वान Pandit Tara Singh Narottam ने इस रहस्य को समझने की कोशिश शुरू की। उन्होंने दसम ग्रंथ और महाभारत को साथ रखकर पढ़ा। गुरु गोबिंद सिंह जी की पंक्तियों में दिए गए इशारों सात चोटियां, झील और ऊंचे पहाड़ — को असली जगहों से मिलाना शुरू किया।

अपने सफ़र के दौरान वो बद्रीनाथ के आगे बसे माना गांव पहुंचे, वहां रहने वाले लोग खुद को रोंगपा कहते हैं।। वहां उन्होंने कुछ महिलाओं को लोकपाल जाने की तैयारी करते देखा। वो जन्माष्टमी के मौक़े पर उस झील में स्नान करने जा रही थी। जब पंडित तारा सिंह ने उनसे उस जगह के बारे में पूछा, तो महिलाओं ने बताया कि लोकपाल उनके लिए बहुत पवित्र जगह है।

स्थानीय लोगों के लिए इस जगह की अहमियत इतनी ज़्यादा थी कि कुछ लोग इसे बद्रीनाथ से भी ज़्यादा पाक मानते थे। पंडित जी भी उनके साथ चल पड़े। जब उन्होंने उस झील को देखा, तो उन्हें महसूस हुआ कि यही वो जगह हो सकती है जिसका ज़िक्र बचित्तर नाटक में किया गया है — सात पहाड़, बर्फ़ीली झील और एक अलग ही रूहानी एहसास। लेकिन उस वक़्त सिख समाज ने उनकी बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया।

Pic Credit: Bharat Chauhan

वो विद्वान जिसने खोज को फिर से ज़िंदा किया

करीब पचास साल बाद Hemkund Sahib की तलाश फिर से शुरू हुई, लेकिन इस बार सफ़र पहाड़ों से नहीं बल्कि किताबों से शुरू हुआ। Bhai Vir Singh आधुनिक सिख इतिहास के सबसे अहम विद्वानों में गिने जाते हैं। वे एक शायर, इतिहासकार और सिंह सभा आंदोलन के बड़े चेहरों में से एक थे। उन्होंने अपनी ज़िंदगी सिख इतिहास और धर्म को समझने और लोगों तक पहुँचाने में लगा दी। साल 1929 में उन्होंने श्री कलगीधर चमत्कार नाम की एक किताब लिखी। “कलगीधर” गुरु गोबिंद सिंह जी का एक मशहूर नाम था, क्योंकि वे अपनी पगड़ी में कलगी पहनते थे।

इस किताब में भाई वीर सिंह ने बचित्तर नाटक की पंक्तियों, दोहे कवि संतोख सिंह की लिखी किताब सूरज प्रकाश और हिमालय के पेड़-पौधों और जानवरों से जुड़ी जानकारियों को जोड़कर यह साबित करने की कोशिश की कि Hemkund Sahib कोई काल्पनिक जगह नहीं, बल्कि सचमुच मौजूद एक स्थान है।

ये किताब धीरे-धीरे बहुत लोगों तक पहुंची और इसने लोगों के दिलों में Hemkund Sahib को खोजने की नई उम्मीद जगा दी। इन्हीं पाठकों में एक रिटायर्ड फौजी भी थे, जो टिहरी गढ़वाल के एक गुरुद्वारे में सेवा कर रहे थे। उनका नाम था संत सोहन सिंह।

वो लोग जिन्होंने Hemkund Sahib तक पहुंचने का रास्ता बनाया

संत सोहन सिंह ने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा फौज में गुज़ारा था। रिटायर होने के बाद जब उन्होंने Bhai Vir Singh की लिखी Hemkund Sahib की कहानी पढ़ी, तो उनके दिल में उस जगह को खोजने की तमन्ना जाग उठी।

साल 1933 में उन्होंने पहली बार Hemkund Sahib को ढूंढने की कोशिश की, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। इसके बाद 1934 में वो फिर निकले। इस बार उनके साथ लोकपाल जाने वाले कुछ स्थानीय श्रद्धालु भी थे, जिन्हें पहाड़ों का रास्ता अच्छी तरह मालूम था।

लंबे और मुश्किल सफ़र के बाद संत सोहन सिंह उस जगह तक पहुंचे, जिसका ज़िक्र गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपनी रचना में किया था। वहां वही शांत झील थी, सात बर्फ़ीली चोटियां थीं और पास में पांडुकेश्वर भी मौजूद था। संत सोहन सिंह ने बाद में बताया कि उस ऊंचाई पर उन्हें एक ऐसा रूहानी एहसास हुआ, जिसे आम अल्फ़ाज़ में बयान करना आसान नहीं था। उन्हें पूरा यक़ीन हो गया कि यही असली Hemkund Sahib है। लेकिन जब वो वापस लौटे और लोगों को अपनी खोज के बारे में बताया, तो शुरुआत में कई लोगों ने यक़ीन नहीं किया। कुछ लोगों को लगा कि ये सिर्फ़ एक कल्पना या भावना हो सकती है।

इसके बाद संत सोहन सिंह अमृतसर गए और भाई वीर सिंह से मुलाक़ात की। दोनों ने साथ मिलकर उस जगह का दौरा किया। वहां पहुंचने के बाद ये तय हो गया कि यही Hemkund Sahib है। भाई वीर सिंह ने वहां एक छोटा गुरुद्वारा बनाने के लिए 2100 रुपये दान दिए।

संत सोहन सिंह ने रिटायर्ड सैनिक हवलदार मोदन सिंह और स्थानीय व्यापारी हयात सिंह भंडारी के साथ मिलकर 1935 और 1936 में वहां एक छोटा-सा गुरुद्वारा बनवाया। ये इमारत करीब दस बाय दस फीट की थी। इसके अंदर गुरु ग्रंथ साहिब की हस्तलिखित बीड़ स्थापित की गई।

इस काम में भ्यूंडार घाटी के पुलना गांव के नंदा सिंह चौहान ने भी काफी मदद की। साल 1939 में संत सोहन सिंह के इंतक़ाल के बाद Hemkund Sahib की सेवा और पहचान को आगे बढ़ाने की पूरी ज़िम्मेदारी मोदन सिंह ने संभाली। उन्होंने कई सालों तक इस मिशन को जारी रखा। आज भी आसपास के इलाक़ों के लोग उन्हें इज़्ज़त से “बाबा मोदन सिंह” के नाम से याद करते हैं।

आज का हेमकुंट साहिब गुरुद्वारा

आज Hemkund Sahib में जो गुरुद्वारा दिखाई देता है, उसका निर्माण 1960 के दशक में किया गया था। इस बड़े निर्माण काम की निगरानी भारतीय सेना के Harkirt Singh ने की थी। इस गुरुद्वारे के आर्किटेक्ट Manmohan Singh Siyali हर साल कई बार वहां जाते थे और निर्माण कार्य का जायज़ा लेते थे। पहाड़ों का कठिन मौसम, तेज़ बर्फ़बारी और मुश्किल रास्तों के बावजूद काम जारी रखा गया। ऐसे हालात में जहां आम निर्माण कार्य रुक जाते हैं, वहां इस गुरुद्वारे को खड़ा करना आसान नहीं था।

आज भी कई दशकों बाद यह गुरुद्वारा मज़बूती से खड़ा है। खराब मौसम, भूकंप और समय का असर भी इसे हिला नहीं पाए। Hemkund Sahib तक पहुंचने के लिए श्रद्धालु गोविंदघाट से यात्रा शुरू करते हैं। वहां से पहले घांघरिया पहुंचना होता है और फिर करीब 6 किलोमीटर की कठिन चढ़ाई के बाद हेमकुंट साहिब पहुंचा जाता है।

हर साल जून से अक्तूबर तक यह रास्ता खुला रहता है और हज़ारों श्रद्धालु इस पवित्र यात्रा पर जाते हैं। हेमकुंट साहिब के पास ही मशहूर Valley of Flowers National Park भी मौजूद है। रंग-बिरंगे फूलों और पहाड़ों से घिरी ये घाटी इस जगह की खूबसूरती को और भी ख़ास बना देती है।

असल में ये खोज क्या थी?

Hemkund Sahib की दोबारा खोज सिर्फ़ एक धार्मिक कहानी नहीं थी, हालांकि इसका रिश्ता गहरी आस्था से ज़रूर जुड़ा हुआ है। ये उस सफ़र की कहानी है, जिसमें सदियों से लोगों के सामने मौजूद पवित्र लिखावट एक खास जगह की तरफ़ इशारा कर रही थी, लेकिन उस जगह तक पहुंचने का रास्ता लोगों के लिए साफ़ नहीं था।

इस खोज को पूरा करने के लिए कई लोगों की मेहनत लगी। एक 19वीं सदी के विद्वान ने पुराने ग्रंथों को पढ़ते हुए पहाड़ों में घूम-घूमकर सुराग तलाशे। फिर 20वीं सदी में एक शायर और विद्वान ने उन सब बातों को जोड़कर किताब की शक्ल दी, ताकि आम लोग भी उसे समझ सकें। और आखिर में दो रिटायर्ड सैनिक ऐसे थे, जिन्होंने कठिन पहाड़ों पर चढ़कर उस जगह को दुनिया के सामने ला दिया।

असल में झील हमेशा वहीं मौजूद थी। सातों पहाड़ भी अपनी जगह खड़े थे। बदला सिर्फ़ इतना कि कुछ लोगों ने यक़ीन, मेहनत और हिम्मत के साथ उस रास्ते को तलाशना शुरू किया, जो आख़िरकार उन्हें उस पवित्र सरोवर तक ले गया।

लेख: अशोक पांडे

इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ें

ये भी पढ़ें: मानसखंड और केदारखंड से लेकर Uttarakhand तक, देवभूमि की वो कहानी, जहां हर पहाड़ में बसता है सदियों पुराना इतिहास

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