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कथकली मास्क पेंटिंग: केरल की जीवंत विरासत,रंगों की भाषा और भावों का जादू

केरल का शास्त्रीय नृत्य-नाटक कथकली (Kathakali-Kerala’s Classical Dance-Drama) सिर्फ कला नहीं, बल्कि एक जज़्बात है। इसकी मास्क पेंटिंग (Mask Painting) की कला दिल को छू लेने वाली है। ये मास्क कागज़ और प्राकृतिक चिपकने वाले पदार्थों से बनाए जाते हैं। इनके चेहरे के भाव और गहरे रंग पौराणिक कहानियों (Facial expressions and dark hues in mythological tales) के किरदारों को ज़िंदा कर देते हैं। केरल का शास्त्रीय नृत्य-नाटक कथकली अपने अनोखे चेहरे के रंगों और मुखौटों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करता है। आइए जानते हैं इसकी गहरी कला-संस्कृति को।

इतिहास का आईना

17वीं सदी में जन्मी कथकली रामायण और महाभारत की कहानियां (Stories from the Ramayana and the Mahabharata) सुनाती है। इसकी सबसे ख़ास बात है चेहरे पर रंगों की बौछार और सिर पर पहना जाने वाला विशेष मुकुट। कलाकार अपने बाएं हाथ की उंगलियों में स्टील या चांदी के नाखून पहनते हैं, ताकि मुद्राएं और साफ़ दिखें।

चुट्टी की नज़ाकत

चेहरे के चारों ओर सफ़ेद सीमा “चुट्टी” कहलाती है। ये दर्शकों का ध्यान डांसर की आंखों और चेहरे के भावों पर फोकस करती है। 1960 के दशक तक ये चुट्टी चावल के कागज़ से बनाई जाती थी। अब मोटे ड्राइंग शीट का इस्तेमाल होता है।

रंगों की जुबान: कथकली में हर रंग एक संदेश देता है-

हरा रंग (पच्चा): नेकी, ईश्वरीयता और वीरता का प्रतीक। ये राम या अर्जुन जैसे नायकों के लिए होता है।

लाल रंग (कथी): ग़ुस्सा और जुनून। ये रावण जैसे खलनायकों का रंग है।

काला रंग (थाड़ी): रहस्यमयी और जंगली किरदार, जैसे शिकारी और वनवासी।

नवरसों की महफ़िल

 कथकली नवरसों के सिद्धांत पर टिकी है: श्रृंगार (प्रेम), वीर (साहस), बीभत्स (घृणा), अद्भुत (आश्चर्य), भयानक (डर), रौद्र (क्रोध), शांत (शांति), करूणा (दया) और हास्य (मज़ाक)। हर भाव को आँखों और चेहरे की सूक्ष्म हरकतों से दिखाया जाता है।

कारीगरी का जलाल

मास्क पर सोने की कलाकारी, नक्काशीदार मुकुट, उभरी हुई आँखें, गालों पर बेल-बूटे और भौंहों के डिज़ाइन कमाल के होते हैं। सांप या दिव्य स्वरूपों को भी मास्क में उकेरा जाता है। ये कला पीढ़ियों से गुरुओं के साथ में सीखी जाती है। रंग नारियल तेल में मिलाकर परत-दर-परत चढ़ाया जाता है, जिससे रंगों में चमक और गहराई आती है।

बदलते दौर में कथकली

पहले सभी पात्र: यहां तक कि स्त्री किरदार भी – पुरुष ही निभाते थे। आज महिलाएं भी इस कला में आगे आ रही हैं। अब कथकली शहरों में टूरिस्ट क्लबों और थिएटरों में दिखती है, जबकि गांवों में ये मंदिरों और त्योहारों से जुड़ी हुई है।

आजकल ऐक्रेलिक रंग और चिपकने वाले पदार्थ भी इस्तेमाल होने लगे हैं, लेकिन पारंपरिक कारीगर और संस्थान आज भी प्राकृतिक सामग्रियों से काम करते हैं।

नई पीढ़ी का हुनर

केरल के सांस्कृतिक केन्द्रों अब मास्क बनाना और चेहरे पर रंग भरना सिखाया जाता है। युवा पीढ़ी इस कला को फिर से अपना रही है। कथकली का मास्क पेंटिंग परंपरा सिर्फ एक सजावट नहीं, बल्कि केरल की जीती-जागती विरासत है  जो समय के साथ ढलती है, मगर अपनी रूह कभी नहीं बदलती।

कथकली मास्क का हर रंग, हर लकीर, हर मुकुट एक पूरी कहानी कहता है वो भी एक भी शब्द बोले। ये कला आपको महसूस कराती है कि सच्ची ख़ूबसूरती आंखों में होती है, और सच्चा अभिनय चेहरे के हर रोएं में बसता है।

ये भी पढ़ें:  ‘दक्षिणी तहज़ीब’ का चेहरा और केरल की सांस्कृतिक ‘पहचान’ हैं कासरगोड की हथकरघा साड़ियां

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