जब भी भारत की Boxing का इतिहास लिखा जाएगा, Punjab (पंजाब) के संगरूर ज़िले के छोटे से गांव खनाल खुर्द के एक किसान के बेटे का नाम ज़रूर लिया जाएगा, वो नाम है कौर सिंह। एक ऐसा खिलाड़ी जिसने न सिर्फ Boxing Ring में अपनी ताकत दिखाई, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े मुक्केबाज़ मोहम्मद अली के सामने भी डटकर खड़ा हुआ। कौर सिंह की कहानी खेतों की मिट्टी से निकलकर बड़े-बड़े इंटरनेशनल मंच तक पहुंचने की है। उनकी मेहनत और हिम्मत आज भी नई पीढ़ी के लिए एक बड़ी प्रेरणा हैं।
खेतों से फौज की वर्दी और फिर इंटरनेशनल Boxing तक का सफ़र
कौर सिंह की पैदाइश करीब 1948-49 में एक जाट सिख किसान परिवार में हुई। घर के आर्थिक हालात ठीक नहीं थे और पूरा परिवार खेती पर ही निर्भर था। देश के लिए कुछ करने की चाह में उन्होंने 1973 में करीब 23–24 साल की उम्र में, भारतीय सेना की सिख रेजिमेंट जॉइन की और हवलदार बने। उस समय भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव का माहौल था, लेकिन कौर सिंह ने मैदान-ए-जंग में ज़बरदस्त बहादुरी दिखाई। उनकी इसी हिम्मत के लिए उन्हें सेना मेडल से सम्मानित किया गया। बाद में, 1988 में उनकी बेहतरीन सेवा के लिए उन्हें विशिष्ट सेवा मेडल (VSM) भी दिया गया।
कौर सिंह की कहानी को ख़ास बनाने वाली बात ये है कि उन्होंने Boxing की शुरुआत साल 1977 में 29 साल की उम्र में की। 1979 में उन्होंने अपनी पहली सीनियर नेशनल Boxing चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता। 1979 से 1983 तक लगातार 5 साल तक वो भारत के नंबर 1 हैवीवेट बॉक्सर बने रहे।

उनका इंटरनेशनल करियर भी काफी शानदार रहा,1980 (मुंबई): एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता। 1982 (दिल्ली एशियन गेम्स): हैवीवेट कैटेगरी में गोल्ड मेडल अपने नाम किया। उनकी ये कामयाबी दिखाती है कि अगर हौसला और मेहनत हो, तो देर से शुरू करने पर भी बड़ी मंज़िल हासिल की जा सकती है।
मोहम्मद अली के साथ ऐतिहासिक मुकाबला
27 जनवरी 1980 का दिन भारतीय खेल इतिहास में ख़ास बन गया। दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में करीब 50,000 लोगों के सामने कौर सिंह का सामना दुनिया के महान बॉक्सर मोहम्मद अली से हुआ। ये चार राउंड का एक एग्ज़िबिशन मुकाबला था। हालांकि ये कोई ऑफिशियली प्रतियोगिता नहीं थी, लेकिन अली जैसे दिग्गज के सामने उतरना ही अपने आप में बहुत बड़ी बात थी।
कौर सिंह ने बाद में याद करते हुए कहा, “अली के पंच बहुत ताकतवर थे। उनका मशहूर जैब आज भी याद है। उनकी स्पीड कमाल की थी और रिंग में उनकी मूवमेंट की वजह से उन्हें पकड़ पाना मुश्किल था।” मुकाबले के बाद ख़ुद मुहम्मद अली ने भी कौर सिंह की तारीफ की और उन्हें “मज़बूत और बहादुर बॉक्सर” बताया। कौर सिंह अक्सर कहते थे कि दुनिया आज भी उन्हें उसी मुकाबले की वजह से याद करती है।

ओलंपिक और देश में पहचान
कौर सिंह ने 1984 में लॉस एंजेलिस ओलंपिक में भारत को रिप्रेज़ेंट किया। उन्होंने अपने पहले दो मुकाबले जीते, लेकिन तीसरे राउंड में हार गए। इसके बाद उन्होंने Boxing से संन्यास ले लिया। उनकी शानदार उपलब्धियों के लिए उन्हें कई बड़े सम्मान मिले— 1982 में अर्जुन अवॉर्ड मिला, 1983 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया, जो भारत का चौथा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है। कौर सिंह की मेहनत और उपलब्धियों ने उन्हें देशभर में अलग पहचान दिलाई।
शोहरत के बाद संघर्ष
देश का नाम रोशन करने के बाद कौर सिंह को कुछ समय आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा। दिल के इलाज के लिए उन्हें खुद ही कर्ज लेना पड़ा और सरकारी मदद के लिए सालों तक इंतज़ार करना पड़ा। जब बॉलीवुड अभिनेता शाहरूख़ ख़ान को उनकी हालत के बारे में पता चला, तो उन्होंने 5 लाख रुपये की आर्थिक मदद की। ये पूरी कहानी एक बड़ा सवाल खड़ा करती है— आखिर हमारे असली हीरो ज़िंदा रहते हुए ही क्यों भुला दिए जाते हैं?

आखिर तक अपने उसूलों पर डटे रहने वाले इंसान
कौर सिंह सिर्फ रिंग में ही मज़बूत नहीं थे, बल्कि अपने उसूलों पर भी हमेशा कायम रहे। 2020–21 के किसान आंदोलन के दौरान उन्होंने किसानों के समर्थन में अपने अवॉर्ड लौटाने की बात कही। इससे साफ दिखता है कि एक बड़े खिलाड़ी बनने से पहले वो दिल से एक किसान के बेटे थे। 27 अप्रैल 2023 को, 74 साल की उम्र में इस महान बॉक्सर का निधन हो गया। उनकी कहानी को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए “Padma Shri Kaur Singh” नाम की एक फ़िल्म भी बनाई गई है।
स्टोरी– गुरप्रीत सिंह
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