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Brass Utensils (पीतल के बर्तन) की विरासत: रसोई की शान से लेकर अच्छी सेहत तक

हमारे बुज़ुर्गों की ज़िंदगी कुदरत और साइंस के बहुत क़रीब थी। उनकी रसोई में इस्तेमाल होने वाले बर्तन सिर्फ धातु के टुकड़े नहीं थे, बल्कि अच्छी सेहत की बुनियाद माने जाते थे। पीतल, तांबा, लोहा और मिट्टी के बर्तन हमारी तहज़ीब का अहम हिस्सा रहे हैं। लेकिन पिछले दो दशकों में मॉडर्न लाइफ़स्टाइल और ‘यूज़ एंड थ्रो’ कल्चर ने हमारी रसोई का नक़्शा बदल दिया। स्टील, एल्यूमीनियम और नॉन-स्टिक बर्तनों के आने से Brass Utensils (पीतल के बर्तन) की चमक फीकी पड़ गई थी, लेकिन अब वक़्त फिर बदल रहा है।

करीब 20-25 साल पहले लोगों का रुझान तेज़ी से स्टील और एल्यूमीनियम की तरफ़ बढ़ गया। इसकी वजह ये थी कि ये बर्तन सस्ते, हल्के और इस्तेमाल में आसान थे। इन्हें साफ़ कराने या कलई करवाने की ज़्यादा ज़रूरत नहीं पड़ती थी। लोगों ने घरों में रखे पुराने पीतल और तांबे के बर्तन कबाड़ में बेच दिए या बदलकर स्टील के बर्तन ले आए थे।

लेकिन ये बदलाव इंसानी सेहत के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। एल्यूमीनियम और नॉन-स्टिक बर्तनों में खाना पकाने से शरीर में धीरे-धीरे ज़हरीले तत्व जमा होने लगे। इसकी वजह से कैंसर, जोड़ों का दर्द और हाज़मे से जुड़ी बीमारियां बढ़ने लगी।

ठठेरों के काम पर असर

Brass Utensils (पीतल के बर्तन) की मांग कम होने का सबसे बड़ा असर ठठेरों यानी बर्तन बनाने वाले कारीगरों पर पड़ा। बटाला, अमृतसर, जंडियाला गुरु और होशियारपुर जैसे शहर, जो कभी Brass Utensils (पीतल के बर्तन) के लिए मशहूर थे, वहां अब पहले जैसी रौनक नहीं रही। बटाला के ठठेरा मोहल्ले के कारीगर बताते हैं कि उनका ख़ानदान कई पीढ़ियों से इसी काम से जुड़ा हुआ है।

Pic Credit: Khalsa Vox

पहले इस मोहल्ले में कई परिवार दिन-रात बर्तन बनाने और कलई करने का काम करते थे। लेकिन रेडीमेड और स्टील के बर्तनों ने इस कारोबार को बड़ा नुक़सान पहुंचाया। ज़्यादातर कारीगर मज़दूरी करने पर मजबूर हो गए। आज इस काम में सिर्फ़ बुज़ुर्ग कारीगर ही बचे हैं, क्योंकि नई पीढ़ी इस मेहनत वाले काम से दूर हो चुकी है।

फिर बढ़ा पीतल के बर्तनों का चलन

अच्छी बात ये है कि अब लोग अपनी सेहत को लेकर जागरूक हो रहे हैं। जैसे-जैसे बीमारियां बढ़ रही हैं, लोग फिर अपनी पुरानी रिवायतों की तरफ़ लौट रहे हैं। कारीगरों के मुताबिक अब लोग फिर से पीतल की परात, कटोरी, कड़ाही और पतीले खरीद रहे हैं। पंजाब के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश में भी हाथ से बने इन बर्तनों की मांग बढ़ रही है।

Brass Utensils (पीतल के बर्तन) में खाना पकाने से पहले उनकी कलई करवाना बेहद ज़रूरी होता है। कलई एक हिफाज़ती परत की तरह काम करती है, जो पीतल और खाने के एसिडिक तत्वों के बीच एक सुरक्षा परत के रूप में काम करता है। कारीगरों का कहना है कि अब रोज़ 7-8 लोग अपने पुराने बर्तनों की कलई करवाने आते हैं। इससे साफ़ पता चलता है कि Brass Utensils (पीतल के बर्तन) फिर से लोगों की रसोई का हिस्सा बन रहे हैं।

Pic Credit: Copper Studio

पीतल और तांबे के बर्तनों के फ़ायदे

डॉ. इंद्रजीत कौर के मुताबिक हमारे जिस्म को कई तरह की धातुओं की ज़रूरत होती है। Brass Utensils (पीतल के बर्तन) में खाना पकाने से खाने के 90 फ़ीसदी से ज़्यादा पोषक तत्व महफ़ूज़ रहते हैं, जबकि प्रेशर कुकर और एल्यूमीनियम के बर्तनों में ये काफ़ी हद तक ख़त्म हो जाते हैं।

पीतल में जिंक और तांबे का मिश्रण होता है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। और हाज़मा बेहतर करता है। तांबे के बर्तन में रखा पानी शरीर के ज़हरीले तत्व बाहर निकालने में मदद करता है और याददाश्त भी तेज़ करता है। कलई भी जिस्म को बीमारियों से लड़ने के काबिल बनाती है। वहीं लोहे की कड़ाही में बना खाना शरीर में आयरन की कमी दूर करने में मददगार होता है।

Pic Credit: Social Media

इस विरासत को बचाना ज़रूरी

जंडियाला गुरु (अमृतसर) के ठठेरों की इस कला को यूनेस्को ने विश्व धरोहर का दर्जा दिया है। ये काम बेहद मेहनत और बारीकी वाला होता है। धातु को गर्म करके हथौड़ों से पीटकर सही आकार देना आसान नहीं होता। इस विरासत को बचाकर रखना हम सबकी ज़िम्मेदारी है।

Brass Utensils (पीतल के बर्तन) सिर्फ़ रसोई की ख़ूबसूरती नहीं बढ़ाते, बल्कि हमारी सेहत के लिए भी फ़ायदेमंद हैं। आज ज़रूरत है कि हम दिखावे वाले चमकदार स्टील और नुकसानदेह एल्यूमीनियम को त्याग कर अपने पारंपरिक बर्तनों को फिर अपनाएं। इससे न केवल हम बीमारियों से बचेंगे, बल्कि हमारे मेहनती कारीगरों और शिल्पकारों का पेशा भी ज़िंदा रहेगा। अपनी रसोई में कम से कम एक पीतल की परात या लोहे की कड़ाही ज़रूर रखें, क्योंकि यह एक स्वस्थ भविष्य की ओर पहला कदम है।

स्टोरी: असिस्टेंट प्रोफ़ेसर रविंदर सिंह

इस लेख को पंजाबी में पढ़ें

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