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BGMI से लेकर PM मोदी तक: Indian Female Streamers अब Video Games खेल कर बदल रही गेमिंग इंडस्ट्री की किस्मत

जरा सोचिए, आपके गांव में बैठे पिता टीवी पर आपको प्रधानमंत्री मोदी के साथ Video Games खेलते हुए देख रहे हों? पांच साल पहले जो बेटी Mobile Games  खेलकर अजनबियों को दिखाती थी, वो आज पीएम मोदी के सामने कंट्रोलर लिए नजर आ रही हो? यह सिर्फ एक सपना नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा की रहने वाली 26 साल की पायल धारे की सच्ची कहानी है।

पायल, जिन्हें आज पूरा गेम वर्ल्ड  ‘Payal Gaming’ के नाम से जानता है, भारत की सबसे फॉलो की जाने वाली महिला गेमर हैं। उनके 40 लाख से ज्यादा Subscribers हैं। लेकिन यहां तक पहुंचना आसान नहीं था। एक समय था जब उनके पिता शिवशंकर धारे को ये सब बेकार का शगल लगता था। वो परेशान थे कि उनकी बेटी मोबाइल गेम (Indian female streamers are bringing major changes to the gaming industry) खेलकर दुनिया को क्या दिखा रही है? आज उसी गांव उमरनाला के लोग पायल के नाम से अपनी पहचान बताते हैं।

मोबाइल गेम ने बदल दी तस्वीर

पायल की कहानी कोई अकेली कहानी नहीं है। ये पूरे भारत में एक बड़े बदलाव की कहानी है। कभी गेमिंग को लड़कों का खेल समझा जाता था, लेकिन अब यह महिलाओं के लिए करियर की नई राह बन रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है मोबाइल गेमिंग।

आंकड़े बताते हैं कि भारत में गेमिंग इंडस्ट्री (The Gaming Industry in India) 2029 तक 9.2 अरब डॉलर की हो जाएगी। इसमें 44 से 45 प्रतिशत यानी लगभग आधे गेमर्स महिलाएं हैं, जिनकी उम्र 18 से 30 साल के बीच है। ये लड़कियां हर हफ्ते करीब 11 घंटे गेम खेलती हैं। ‘बैटलग्राउंड्स मोबाइल इंडिया’ (BGMI) जैसे गेम ने लड़कियों को वो मौका दिया है जो महंगे कंप्यूटर या कंसोल नहीं दे सकते थे।

Krutika Ojha

सिर्फ खेल नहीं, संघर्ष भी

हालांकि, यह रास्ता गुलाबों से भरा नहीं है। महिला गेमर्स को हर दिन एक नया युद्ध लड़ना पड़ता है – भाषा और सोच का युद्ध।

  1. ट्रोल्स का दौर: जैसे ही कोई लड़की गेमिंग में आती है, उसके स्किल से ज्यादा उसके चेहरे और कपड़ों पर कमेंट्स होने लगते हैं। “तुम्हारा गेम अच्छा नहीं, चेहरा अच्छा है” जैसे कमेंट्स आम हैं। कई लड़कियों को गलत हरकतों का सामना करना पड़ता है, जिससे वो चैट बंद करने या गेम छोड़ने पर मजबूर हो जाती हैं।
  2. पैसे का खेल: इनामी राशि (Prize Money) में जमीन-आसमान का अंतर है। जहां पुरुष टूर्नामेंट जीतकर 1.20 लाख डॉलर तक कमा सकते हैं, वहीं महिला विजेताओं को औसतन सिर्फ 1200 डॉलर ही मिलते हैं। दुनिया की टॉप 400 गेमर्स की लिस्ट में एक भी भारतीय महिला का नाम नहीं है।
  3. घर और समाज की सोच: आज भी कई परिवारों में लड़की का गेम खेलना “बुरी बात” समझी जाती है। उनसे उम्मीद की जाती है कि वो पढ़ाई-लिखाई या नौकरी करें, न कि “बैठकर गेम खेलें।”

बुलंद आवाज़ें, बदलती इमेज

लेकिन इन सबके बीच कुछ लड़कियां ऐसी भी हैं जो बुलंदी से खेल रही हैं और मिसाल बन रही हैं।

  • काशवी हीरानंदानी (KaashPlays): सिंगापुर में फाइनेंस की अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर ये लड़की पूरे समय Gaming Streaming कर रही हैं। आज इनके 18 लाख इंस्टाग्राम फॉलोअर्स हैं और ये S8UL जैसी बड़ी टीम का हिस्सा हैं।
  • कृतिका ओझा: 2020 में PUBG मोबाइल इंडिया सीरीज में अकेली महिला प्रतियोगी थीं। उन्होंने साबित कर दिया कि लड़कियां भी बड़े टूर्नामेंट में दम दिखा सकती हैं।
  • सलोनी कांदलगांवकर (Mili) और अंकिता चौहान: ये लड़कियां सिर्फ गेम ही नहीं खेलतीं, बल्कि अपने परिवार को स्ट्रीम में शामिल करके ये संदेश दे रही हैं कि गेमिंग कोई बुराई नहीं, बल्कि परिवार की ताकत बन सकती है।
Kaashvi Hiranandani

किरणें दिखीं, लेकिन अंधेरा अभी बाकी

सरकार ने भी अब ई-स्पोर्ट्स को खेल का दर्जा दे दिया है। गेमिंग में डिग्री कोर्स और सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाने की बात हो रही है। तमिलनाडु में हाल ही में हुए एक टूर्नामेंट में 90 से ज्यादा महिलाओं ने हिस्सा लिया, जो 5 साल पहले अकल्पनीय था।

S8UL और टीम विटैलिटी जैसे बड़े संगठन अब लड़कियों को टीम में शामिल कर रहे हैं। लेकिन असली बदलाव के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है।

  • महिला टीमों के लिए अलग से टूर्नामेंट की जरूरत है।
  • प्रैक्टिस और कोचिंग के लिए बेहतर माहौल चाहिए।
  • और सबसे जरूरी, समाज और परिवारों की सोच बदलनी होगी।

जीत की ओर बढ़ता कदम

पायल धारे की कहानी हर उस लड़की के लिए प्रेरणा है जो नए रास्ते बनाना चाहती है। उनकी जीत सिर्फ एक अवॉर्ड नहीं, बल्कि उन तमाम रूढ़ियों पर जीत है, जो कहती थीं कि “गेमिंग लड़कियों का काम नहीं।”

भारत का गेमिंग उद्योग अब 868 मिलियन डॉलर (2023) का हो चुका है। यह दौड़ सिर्फ पैसे और शोहरत की नहीं, बल्कि बराबरी और पहचान की भी है। ये लड़कियां सिर्फ गेम नहीं जीत रहीं, बल्कि वो एक ऐसा भविष्य गढ़ रही हैं, जहां बेटियां बिना किसी डर के अपनी मर्जी से खेल सकेंगी, अपनी पहचान बना सकेंगी और दुनिया को बता सकेंगी कि खेल का मैदान सबका है।

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ें

ये भी पढ़ें:  5000 साल पुराना पंजाब: हड़प्पा के उस पार की अनकही दास्तान

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