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अंतरराष्ट्रीय न्याय और नस्लभेद के ख़िलाफ़ लड़ने वाली भारतीय मूल की Navanetham ‘Naavi’ Pillai को Nobel Peace Prize 2026

 जब नॉर्वे की नोबेल समिति ने 9 अक्टूबर को ओस्लो में 2026 के नोबल शांति पुरस्कार (Nobel Peace Prize 2026) का ऐलान किया, तो दुनिया की नजरें 85 साल की एक ऐसी महिला पर टिक गईं, जिनके पास न सत्ता है, न सेना। है तो बस एक कानून की किताब और अन्याय के खिलाफ लड़ने का जिद। नाम है नवनेथम ‘नावी’ पिल्लई (Navanetham ‘Naavi’ Pillai)।

भारत से क्या है नाता?

नावी पिल्लई की पैदाइश दक्षिण अफ्रीका के डरबन में हुई, लेकिन उनकी जड़ें भारत के तमिलनाडु में हैं। उनके दादा-दादी को 1890 के दशक में गन्ने के खेतों में मजदूरी के लिए भारत से दक्षिण अफ्रीका ले जाया गया था। पिता नारायणसामी नायडू बस ड्राइवर थे और मछली पकड़कर परिवार का पेट पालते थे।

रंगभेद के खिलाफ उठी आवाज़

साल 1967 में, जब दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद अपने चरम पर था, नावी ने नटाल प्रांत में वकालत शुरू की। वह ऐसा करने वाली पहली अश्वेत महिला थीं। उन्होंने नेल्सन मंडेला सहित उन सभी कार्यकर्ताओं का बचाव किया,जिन्हें व्यवस्था ने अपराधी मान लिया था।

रवांडा से गाज़ा तक का सफ़र

करियर का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब वो रवांडा नरसंहार की अंतरराष्ट्रीय अदालत की अध्यक्ष बनीं। उनके नेतृत्व में यह ऐतिहासिक फैसला आया कि रेप और यौन हिंसा नरसंहार के अपराध की कैटेगरी में आते हैं। ये अंतरराष्ट्रीय कानून में एक क्रांतिकारी बदलाव था। बाद में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में दुनिया भर में मानवाधिकारों की निगरानी की ।

क्या कहा नोबेल समिति ने?

नोबेल समिति के अध्यक्ष जोर्गेन वाटने फ्रिडनेस (Nobel Committee Chair Jørgen Watne Frydnes) ने कहा कि नावी पिल्लई ने ‘असाधारण साहस और ईमानदारी’ के साथ एक व्यापक वैश्विक कानूनी व्यवस्था की दिशा में नेतृत्व किया। उन्होंने कहा, ‘जब ताकत, हक पर हावी होती है, तो ये स्थिरता और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को कमजोर करती है’।

पुरस्कार और उनका फीडबैक

नावी पिल्लई को 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोनर (लगभग 1 मिलियन यूरो) की राशि दी जाएगी। 10 दिसंबर को ओस्लो में समारोह होगा। लेकिन उससे पहले, नावी पिल्लई का जीवन यह साबित कर चुका है कि शांति सिर्फ युद्ध बंद होने का नाम नहीं, बल्कि पीड़ितों को न्याय मिलने का नाम भी है।

ये भी पढ़ें- पद्म श्री डॉ.ल्यूदमीला खोखलोवा: रूस में जन्मी पर हिंदी को बना लिया अपनी ज़िंदगी का मक़सद

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