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90 साल का लोधी गार्डन: हरियाली, इतिहास और 5400 पेड़ों की दास्तान

आज लोधी गार्डन अपने 90 साल मुकम्मल कर चुका है। 9 अप्रैल 1936 को शुरू हुआ यह बाग़ अब राजधानी की पहचान और रौनक़ बन गया है।

दिल्ली की तेज़-रफ़्तार ज़िंदगी के बीच Lodhi Garden (लोधी गार्डन) एक ऐसा सुकूनभरा ठिकाना है, जहां तारीख़ और कुदरत ख़ामोशी से एक-दूसरे के साथ जीती नज़र आती हैं. आज जब यह मशहूर गार्डन अपने 90 साल पूरे कर रहा है,तो यह अब भी सैर करने वालों, इतिहास के शौकीनों और सैलानियों के लिए एक ख़ास जगह बना हुआ है।

करीब 80 एकड़ में फैला यह गार्डन अपनी जड़ें 15वीं सदी तक ले जाता है, जब Lodi dynasty के हुक्मरानों ने इसे मकबरों की जगह के तौर पर इस्तेमाल किया। यहां Muhammad Shah और Sikandar Lodi जैसे बादशाहों के मकबरे मौजूद हैं, जो इसे एक ज़िंदा इतिहास बना देते हैं।

पब्लिक गार्डन की शुरुआत 

इस जगह को एक पब्लिक गार्डन बनाने की शुरुआत 1936 में हुई, जब ब्रिटिश दौर में इसे लेडी विलिंगडन पार्क के तौर पर तैयार किया गया। आज़ादी के बाद 1947 में इसका नाम बदलकर लोधी गार्डन रखा गया, जो हमारी विरासत को अपनाने की निशानी है।

1968 में मशहूर आर्किटेक्ट Garrett Eckbo और Joseph Allen Stein ने इसे नए अंदाज़ में डिज़ाइन किया। उन्होंने यहां शीशे का घर (ग्लास हाउस), झील, बोन्साई पार्क और रोज़ गार्डन जैसे कई ख़ूबसूरत हिस्से जोड़ने के साथ साथ ऐतिहासिक पहचान को बरकरार रखा।

यह गार्डन सिर्फ़ बड़े मकबरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां कुछ कम-ज्ञात ऐतिहासिक निशान भी हैं, जैसे Tughlaq dynasty के दौर का एक रहस्यमयी बुर्ज, जो दिल्ली के सदियों पुराने सफ़र की कहानी कहता है।

आज के दौर में लोधी गार्डन सिर्फ एक पार्क नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पहचान बन चुका है, जहां विरासत, माहौल और लोगों की ज़िंदगी एक साथ जुड़ती है। सुबह की सैर, योग, हेरिटेज वॉक या सुकून के कुछ पल हर किसी के लिए एक ख़ास जगह है।

Image credit/pexels.com

लोधी गार्डन का फ़िल्मी सफ़र

यह वही दिलकश जगह है जहां Farooq Shaikh और Deepti Naval ने Chashme Buddoor में अपने ख़ूबसूरत रोमांस को ज़िंदा किया था। उस दौर से लेकर आज तक, Lodhi Garden(लोधी गार्डन) न सिर्फ़ फ़िल्मों का पसंदीदा लोकेशन रहा है, बल्कि लोगों की यादों और जज़्बात का भी हिस्सा बन चुका है।

1981 की इस मशहूर फ़िल्म से शुरू हुआ सिलसिला आज भी जारी है लोधी गार्डन की हरी-भरी वादियां और सुकून भरा माहौल हर दौर की फ़िल्मों में अपना अलग ही जादू बिखेरता नज़र आता है।

8 सदियों की हरियाली की कहानी

करीब 800 साल पहले भी यह इलाका हरियाली से भरपूर था। हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक इतिहासकार Minhaj-i-Siraj ने इसे “बाग़-ए-जद्द” यानी “बरकत वाला बाग़” बताया था। 15वीं सदी में यहां सैय्यद और लोधी दौर के मकबरे बनने लगे, जो आज भी मौजूद हैं।

यहां चार बड़े स्मारक हैं मुहम्मद शाह का मकबरा, बड़ा गुम्बद, शीश गुम्बद और सिकंदर लोधी का मकबरा। इसके अलावा अकबर के दौर का एक पुल, तीन तालाब, बोन्साई और हर्बल गार्डन भी हैं।

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक मशहूर Oral Historian Sohail Hashmi के मुताबिक, यह जगह तीन सल्तनतों सैय्यद, लोधी और मुग़ल की विरासत को अपने अंदर समेटे हुए है। उन्होंने बताया कि इस गार्डन को बनाने के लिए खैरपुर गांव को हटाया गया था और यहां बहने वाली एक प्राकृतिक धारा भी अब खत्म हो चुकी है।

हरियाली का हसीन नज़ारा

लोधी गार्डन पेड़ों के शौकीनों के लिए किसी जन्नत से कम नहीं। यहां 210 से ज़्यादा प्रजातियों के करीब 5,400 पेड़ हैं। इनमें नीम, पलाश, मौलश्री जैसे देसी पेड़ों के साथ-साथ सिल्वर ओक और कैरेबियन ट्रंपेट जैसे विदेशी पेड़ भी शामिल हैं।

गार्डन में एक बड़ा बांस का झुरमुट, 1970 का बना ग्लास हाउस और 1996 में बना नेशनल बोन्साई पार्क भी मौजूद है।

आज भी ज़िंदा है इसकी रूह

करीब 80 माली और कर्मचारी इस गार्डन की देखभाल करते हैं। इनमें से कुछ लोग दशकों से यहां काम कर रहे हैं और उन्होंने इसकी बदलती सूरत को करीब से देखा है।

गार्डन के 90 साल पूरे होने पर यहां माली और नियमित आने वाले लोगों के लिए ख़ास कार्यक्रम रखा गया है। साथ ही पर्यावरण और अरावली इकोसिस्टम पर चर्चा और पौधों का वितरण भी किया जाएगा।

लोधी गार्डन आज भी दिल्ली के लोगों के लिए एक ऐसी जगह है, जहां वो अपनी भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी से कुछ पल निकालकर सुकून, तारीख़ और कुदरत के करीब आ सकते हैं। यह गार्डन हमें याद दिलाता है कि अतीत सिर्फ़ किताबों में नहीं, बल्कि हमारे आस-पास भी सांस लेता है।

ये भी पढ़ें: भुवनेश्वर: मोक्ष और कला का वो शहर,जहां सात सौ मंदिरों में बसा है एक हज़ार साल का इतिहास

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