सदियों तक तांबे की ये प्लेटें उस ज़मीन से दूर रहीं, जहां कभी इन्हें सुरक्षित रखने के लिए दफनाया गया था। ये प्लेटें जंगों, राजवंशों, समुद्री यात्राओं, और 160 साल से ज़्यादा यूरोपीयन यूनिवर्सिटीज की अलमारियों में रहीं। आख़िरकार, ये भारत और नीदरलैंड के बीच राजनयिक जद्दोजहद (diplomatic effort) का सेंटर बनीं।
सदियों का क़र्ज़ उतरा : चोला प्लेट्स की वतन वापसी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हेग यात्रा के दौरान ये लंबा सफर घर की ओर मुड़ा। लीडेन यूनिवर्सिटी (Leiden University) ने ऐलान किया कि वो प्रसिद्ध चोला प्लेट्स (Chola Plates) जो चोला साम्राज्य के सबसे अहम रिकॉर्ड्स में से एक हैं को भारत लौटाएगी। ये फैसला एक आधिकारिक जांच के बाद आया, जिसमें साबित हुआ कि डच औपनिवेशिक शासन (Dutch colonial rule) के दौरान ये धरोहरें बिना rightful custodians की रज़ामंदी (consent) के देश से बाहर ले जाई गईं।
रॉयल पैलेस में नीदरलैंड के राजा विलेम-अलेक्जेंडर और रानी मैक्सिमा से पीएम मोदी की मुलाकात हुई। प्रधानमंत्री रॉब जेटेन की मौजूदगी में, समारोह के दौरान ताम्रपट्टिकाएं भारत को वापस दी गई। ये चोल कॉपर प्लेट्स कुल 24 प्लेटों का एक सेट है, जिसमें 21 बड़ी और 3 छोटी प्लेटें हैं। ये भारत-नीदरलैंड संबंधों का सबसे बड़ा सांस्कृतिक नतीजा था।

क्या हैं ये चोला प्लेट्स?
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘Leyden Plates’ के नाम से मशहूर ये तांबे की पट्टिकाएं लगभग हज़ार साल पुरानी हैं। ये राजेंद्र चोला प्रथम और कुलोत्तुंग चोला प्रथम के शासनकाल (The Reigns of Rajendra Chola I and Kulottunga Chola I) की हैं। इतिहासकार इन्हें चोला साम्राज्य की राजनीतिक, समुद्री और सांस्कृतिक ताकत के चरम का अमूल्य दस्तावेज (invaluable records) बताते हैं।
तमिल और संस्कृत में लिखी इन प्लेटों पर चूड़ामणि विहार (नागपट्टिनम का एक बौद्ध मठ) को दी गई राजसी भेंट (royal grants) दर्ज है। इससे चोला साम्राज्य और दक्षिण-पूर्व एशिया के श्रीविजया साम्राज्य के बीच गहरे रिश्तों की झलक मिलती है।

लगभग 30 किलो वज़नी इन प्लेटों पर शाही मोहरें (royal seals) और बारीक नक्काशी है। विद्वानों के मुताबिक, ये मध्यकालीन दक्षिण भारत के प्रशासन, व्यापार नेटवर्क और धार्मिक जीवन की दुर्लभ जानकारी देती हैं।
गुमशुदगी की दास्तान
लीडेन यूनिवर्सिटी की ओर से मानी गई जांच के मुताबिक, ये प्लेटें 1687 से 1700 के बीच डच ईस्ट इंडिया कंपनी (VOC) के अभियानों के दौरान नागपट्टिनम में मिलीं। उस समय नागपट्टिनम डचों का अहम कॉलोनियल व्यापारिक केंद्र था।
जांचकर्ताओं का मानना है कि मूल रूप से ये प्लेटें राजनीतिक उथल-पुथल और लड़ाई-झगड़ों (upheaval and conflict) के दौरान बचाने के लिए ज़मीन में दफनाई गई थीं।
डच कॉलोनियल कलेक्शंस कमिटी (Dutch Colonial Collections Committee) ने बाद में कहा कि इन धरोहरों को Local Patrons की इजाजत के बिना हटाया गया। इसे उन्होंने ‘संपत्ति की अवैध हानि’ (involuntary loss of possession) करार दिया।
माना जाता है कि ये प्लेटें 1712 में नीदरलैंड पहुंचीं और फिर 1862 में लीडेन यूनिवर्सिटी को दान कर दी गईं। तब से ये विश्वविद्यालय लाइब्रेरी में रखी गईं। समय के साथ ये दुनिया भर के इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए अहम सामग्री बन गईं।
लेकिन भारत में ये उन सांस्कृतिक धरोहरों की बड़ी कहानी की निशानी बन गईं, जो औपनिवेशिक शासन के दौरान अपनी ज़मीन से जुदा हो गईं।

वापसी की जद्दोजहद
हाल के सालों में दुनिया भर में यह बहस तेज़ हुई है कि वेस्टर्न संग्रहालयों और संस्थानों में रखी धरोहरें उनके मूल देशों को लौटाई जाएं। भारत ने 2023 में चोला प्लेट्स को वापस पाने के लिए औपचारिक गुज़ारिश (formal request) की। इसके बाद लीडेन यूनिवर्सिटी ने एक Free provenance inquiry शुरू की।
रिपोर्ट की सिफारिश मानते हुए यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष ल्यूक सेल्स ने कहा, ‘ये वस्तुएं भारत के लिए बहुत ऐतिहासिक अहमियत रखती हैं, और यही एक बड़ी वजह है कि इन्हें वापस लौटना चाहिए’।
अब ये प्लेटें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को सौंपी जाएंगी, जो तय करेगा कि इन्हें जनता के लिए कहां प्रदर्शित किया जाए।
हेग में रहने वाले कई इतिहासकारों और भारतीय डायस्पोरा के लिए ये वापसी सिर्फ एक प्राचीन धरोहर का लौटना नहीं है। ये उस मिट्टी के टुकड़े, हज़ार साल पहले जहां ये प्लेटें inscribed की गई थीं, को सलाम करने जैसा है। यह इतिहास का वो क़र्ज है, जो आखिरकार उतर रहा है।
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