उर्दू अदब की दुनिया में नाज़िश प्रतापगढ़ी का नाम उन अहम शायरों में शुमार किया जाता है जिन्होंने अपनी शायरी को सिर्फ़ जज़्बात के इज़हार तक महदूद नहीं रखा, बल्कि उसे समाजी बेदारी, इंसानी बराबरी और वतनपरस्ती का ज़रिया बनाया। वह तरक़्क़ीपसंद तहरीक से जुड़े हुए ऐसे शायर थे जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी अपने फ़िक्र-ओ-फ़न के ज़रिए एक बेहतर और इंसाफ़पसंद समाज की तामीर का ख़्वाब देखा।
नाज़िश प्रतापगढ़ी की पैदाइश 12 जुलाई 1924 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में हुई। बचपन से ही उन्हें अदब और शायरी से गहरी दिलचस्पी थी। ज़िंदगी आसान नहीं थी। रोज़गार की तलाश में उन्होंने व्हीलर एंड कम्पनी के रेलवे बुक स्टॉल पर एजेंट के तौर पर काम किया। आर्थिक तंगी और मुश्किल हालात के बावजूद उन्होंने अपने उसूलों से कभी समझौता नहीं किया और शायरी का दामन आख़िर तक थामे रखा।
उन्होंने उर्दू की ग़ज़लों और नज़्मों के ज़रिए आम इंसान की ज़िंदगी, उसके दुख-दर्द, उम्मीदों और ख़्वाबों को आवाज़ दी। उनकी शायरी में तरक़्क़ीपसंद सोच के साथ-साथ मुल्क से मोहब्बत, क़ौमी यकजहती और गंगा-जमुनी तहज़ीब की ख़ूबसूरत झलक मिलती है। यही वजह है कि उनकी नज़्में आज भी उसी ताज़गी और असर के साथ पढ़ी जाती हैं।
नाज़िश प्रतापगढ़ी, मशहूर उस्ताद शायर सीमाब अकबराबादी के शागिर्द थे। उन्होंने ग़ज़ल की रिवायत को बरक़रार रखते हुए उसमें अपने दौर की हक़ीक़त और समाजी मसाइल को शामिल किया। उनका ग़ज़ल संग्रह “नया साज़ नया अंदाज़” उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी ने प्रकाशित(शाया) किया, जिसे अदबी हल्कों में ख़ूब सराहा गया।
उनके दूसरे अहम काव्य-संग्रहों में “अपनी धरती अपनी बात”, “ख़ाके और लकीरें” और “मता-ए-क़लम” शामिल हैं। इन किताबों में इंसानी रिश्तों, समाजी बराबरी, वतन की मोहब्बत और बेहतर मुस्तक़बिल की उम्मीद साफ़ दिखाई देती है।
नाज़िश की शायरी का सबसे ख़ास पहलू उनकी वतनपरस्ती है। उन्होंने ऐसी कई नज़्में लिखीं जो मुल्क के लिए कुर्बानी देने वालों को सलाम पेश करती हैं और नई नस्ल को अपने वतन से मोहब्बत का पैग़ाम देती हैं। उनके अशआर में उम्मीद, हौसला और रौशन मुस्तक़बिल की झलक दिखाई देती है।
उनका यह मशहूर शेर आज भी लोगों के दिलों में नई उम्मीद पैदा करता है।
फूट चुकी हैं सुब्ह की किरनें, सूरज चढ़ता जाएगा,
रात तो ख़ुद मरती है, सितारो तुमको कौन बचाएगा।
इसी तरह उनका यह शेर अवाम की ताक़त पर पूरा यक़ीन ज़ाहिर करता है।
जो ज़र्रा जनता में रहेगा, वो तारा बन जाएगा,
जो सूरज उनको भूलेगा, वो आख़िर बुझ जाएगा।
शहीदों की कुर्बानी को याद करते हुए उन्होंने लिखा।
न होगा राएगां ख़ून-ए-शहीदान-ए-वतन हरगिज़,
यही सुर्ख़ी बनेगी एक दिन उनवान-ए-आज़ादी।
और मुश्किल हालात में सब्र और हिम्मत का पैग़ाम देते हुए कहते हैं।
सारी मुसीबतों को जो हंस-हंस के सह गए,
दार-ए-फ़ना में सिर्फ़ वही ज़िंदा रह गए।
नाज़िश प्रतापगढ़ी ने पूरी ज़िंदगी आर्थिक परेशानियां झेलीं। फ़िल्मी दुनिया से भी उन्हें पेशकशें मिलीं, लेकिन उन्होंने अपने कलाम का सौदा कभी नहीं किया। मुफ़लिसी मंज़ूर कर ली, मगर अपने फ़न और ज़मीर से समझौता नहीं किया। यही बात उन्हें अपने दौर के दूसरे शायरों से अलग पहचान देती है।
उर्दू अदब में उनकी ख़िदमात के एतराफ़ में उन्हें भारत के राष्ट्रपति की जानिब से “मीर-ओ-ग़ालिब पुरस्कार” से सम्मानित किया गया। इसके अलावा 1983 में उन्हें उर्दू अदब में अहम योगदान के लिए ग़ालिब पुरस्कार भी मिला। यह सम्मान उनकी अदबी बुलंदी और क़ौमी ख़िदमात का सबूत हैं।
सन् 1984 में लखनऊ में उनका इंतिक़ाल हुआ, लेकिन उनका कलाम आज भी ज़िंदा है। नाज़िश प्रतापगढ़ी सिर्फ़ एक शाइर नहीं थे, बल्कि इंसानियत, अमन, मोहब्बत, गंगा-जमुनी तहज़ीब और तरक़्क़ीपसंद फ़िक्र के सच्चे अलमबरदार थे। उनकी शाइरी हमें यह पैग़ाम देती है कि क़लम की असली ताक़त समाज को जोड़ने, इंसान को इंसान से मिलाने और मुल्क को बेहतर बनाने में है। यही वजह है कि नाज़िश प्रतापगढ़ी का नाम उर्दू अदब के उन रोशन सितारों में हमेशा याद रखा जाएगा, जिनकी आवाज़ आज भी नई नस्ल के लिए हौसले, उम्मीद और मोहब्बत का पैग़ाम है।
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