किसी कला की असल ख़ूबसूरती सिर्फ़ रंगों में नहीं, बल्कि उन रंगों के पीछे छिपी कहानियों, परंपराओं और आस्था में होती है। भारत की यही ख़ासियत है कि यहां हर लोक कला अपने साथ एक पूरी दुनिया लेकर चलती है। गुजरात के छोटा उदयपुर की Pithora Painting (पिथोरा पेंटिंग) भी ऐसी ही एक लोक कला है। पहली नज़र में ये रंग-बिरंगी तस्वीरों से सजी दीवारें लगती हैं, लेकिन राठवा आदिवासी समुदाय के लिए इसका मतलब इससे कहीं बड़ा है। उनके लिए पिथोरा सिर्फ़ एक पेंटिंग नहीं, बल्कि आस्था, पूजा, मन्नत और अपने पुरखों से जुड़ने का एक ज़रिया है।
करीब 3,000 साल पुरानी विरासत
मान्यता है कि पिथोरा कला के इतिहास को करीब 3,000 साल पुराना माना जाता है। इसके शुरुआती रूपों को प्राचीन गुफा चित्रों से भी जोड़कर देखा जाता है। वक्त बदला, पीढ़ियां बदली, लेकिन इस कला की परंपरा आज भी राठवा समुदाय में ज़िंदा है। गुजरात के छोटा उदयपुर और आसपास के इलाकों के साथ-साथ मध्य प्रदेश के झाबुआ, अलीराजपुर और जोबट जैसे क्षेत्रों में रहने वाले राठवा, भील और भीलाला समुदायों में भी पिथोरा कला की परंपरा देखने को मिलती है। राठवा समुदाय के लिए ये कला उनके बुज़ुर्गों से मिली एक ऐसी विरासत है, जिसमें उनकी आस्था, संस्कृति और रोज़मर्रा की ज़िंदगी एक साथ दिखाई देती है।

बाबा पिथोरा से जुड़ी है आस्था
राठवा समुदाय में बाबा पिथोरा को एक देवता माना जाता है। पिथोरा देव को अनाज, खेती और खुशहाली से भी जोड़ा जाता है। समुदाय की आस्था प्रकृति के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। उनका मानना है कि जंगल, ज़मीन, सूरज, चांद, पेड़-पौधे और पशु-पक्षी सिर्फ़ प्रकृति का हिस्सा नहीं, बल्कि एक बड़ी शक्ति से जुड़े हुए हैं। माना जाता है कि पिथोरा की तस्वीर घर की दीवार पर बनाने से बाबा पिथोरा की रहमत बनी रहती है और परिवार में सुख, शांति, अमन और बरकत आती है।
पिथोरा से जुड़ी कई लोक कथाएं भी समुदाय में सुनाई जाती हैं। एक लोक कथा के मुताबिक, कभी धरती भयानक सूखे की चपेट में आ गई थी। खेत सूख गए थे और लोग पानी और अनाज के लिए तरस रहे थे। तब एक भक्त ने बाबा पिथोरा से दिल से प्रार्थना की। मान्यता है कि उनकी दुआ कबूल हुई, बारिश आई और सूखी धरती फिर हरी-भरी हो गई। अपनी मन्नत पूरी होने पर उस भक्त ने घर की दीवार पर बाबा पिथोरा का चित्र बनवाया। इसी से पिथोरा पेंटिंग की परंपरा शुरू होने की लोक मान्यता बताई जाती है।
कब बनाई जाती है पिथोरा पेंटिंग?
राठवा समुदाय में माना जाता है कि अगर घर में लंबे समय से बीमारी हो, खेती ठीक न हो रही हो, पशुओं की मौत हो रही हो या परिवार में संतान न हो रही हो, तो इसे देवता की नाराज़गी या किसी पूर्वज की आत्मा से जोड़कर देखा जा सकता है। ऐसे समय में घर का मुखिया बड़वा के पास जाता है। बड़वा समुदाय के पारंपरिक पुजारी होते हैं। वो खाखरा के पत्ते में उड़द के दाने लेकर पूजा और पारंपरिक विधि करता है। इसके ज़रिए वो समस्या की वजह जानने की कोशिश करता है।
इसके बाद परिवार पिथोरा देव से एक मन्नत या संकल्प लेता है। अगर समस्या दूर हो जाती है, तो परिवार अपनी मन्नत पूरी करने के लिए घर की दीवार पर Pithora Painting (पिथोरा पेंटिंग) बनवाता है। आज भी शादी, बच्चे के पैदाइश, अच्छी फसल या किसी बड़े पारिवारिक मौक़े पर पिथोरा पेंटिंग बनवाने की परंपरा कई परिवारों में जारी है।

पेंटिंग से पहले होती है ख़ास तैयारी
Pithora Painting (पिथोरा पेंटिंग) बनाने का प्रोसेस भी अपने आप में ख़ास है। जिस घर में पेंटिंग बनाई जानी होती है, उसकी दीवारों को पहले तैयार किया जाता है। घर के बरामदे और आसपास की दीवारों पर मिट्टी और गाय के गोबर का लेप किया जाता है। कई जगह ये काम कुंवारी लड़कियां मिलकर कई दिनों तक करती हैं।
पेंटिंग वाले दिन घर का मालिक पिथोरा कलाकार यानी लखारा और बड़वा पुजारी को गर्म पानी से स्नान करवाता है और उन्हें साफ कपड़े पहनाए जाते हैं। इसके बाद कलाकार एक थाली में दीपक, चावल और सिंदूर रखकर दीवार की पूजा करता है। महुआ से बनी स्थानीय शराब भी पूजा में चढ़ाई जाती है। इन रस्मों के बाद पिथोरा पेंटिंग बनाने की शुरुआत होती है।
प्रकृति से तैयार होते हैं पिथोरा के रंग
Pithora Painting (पिथोरा पेंटिंग) की एक ख़ास बात इसके रंग भी हैं। पारंपरिक तौर पर प्राकृतिक चीज़ों से रंग तैयार किए जाते रहे हैं। लाल और नारंगी रंग के लिए सिंदूर,पीले के लिए हल्दी, काले के लिए काजल और हरे रंग के लिए पेड़-पौधों की पत्तियों का इस्तेमाल किया जाता है। सफेद रंग के लिए चूने और सफेद मिट्टी का इस्तेमाल भी किया जाता है। इन रंगों में गाय या बकरी का दूध और महुआ से बनी स्थानीय शराब मिलाने की परंपरा भी बताई जाती है।
पेंटिंग बनाने के लिए बांस की पतली लकड़ियों, रूई, लकड़ी के स्टेंसिल और पारंपरिक कूची का इस्तेमाल किया जाता है। कई कलाकार बांस या बबूल की टहनी से बनी कूची से भी चित्र बनाते हैं। इस तरह पिथोरा के पूरे प्रोसेस में प्रकृति की मौजूदगी दिखाई देती है रंगों से लेकर दीवार और चित्रों में बने पेड़-पौधों तक।

पिथोरा पेंटिंग में क्या-क्या बनाया जाता है?
Pithora Painting (पिथोरा पेंटिंग) में घोड़ों की सबसे अहम जगह होती है। इसके साथ सूरज, चांद, बाघ, हिरण, पेड़-पौधे, किसान, कुआं, जानवर, पक्षी और शिकार के मंजर बनाए जाते हैं। पेंटिंग में पिथोरा देव, गांव के देवता, रानी काजल, पिथो रानी और होका गणेश से जुड़े घोड़े भी बनाए जाते हैं। राजा भोज का हाथी, रथ, पुलिस चौकी, राठवा परिवार और नाचते-गाते लोगों के चित्र भी दिखाई देते हैं। पुरखों और परिवार से जुड़े घोड़ों को भी ख़ास जगह दी जाती है। इस तरह Pithora Painting (पिथोरा पेंटिंग) में राठवा समाज की आस्था, रवायत, कुदरत और रोज़मर्रा की ज़िंदगी की पूरी झलक मिलती है।
मिट्टी की दीवारों से दुनिया के कैनवास तक
एक समय था जब Pithora Painting (पिथोरा पेंटिंग) सिर्फ़ आदिवासी घरों की मिट्टी की दीवारों तक सीमित थी। लेकिन समय के साथ इस कला ने अपनी सीमाएं बढ़ाईं। आज नई पीढ़ी के कलाकार पिथोरा को कागज़, कपड़े और कैनवास पर भी उतार रहे हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ-साथ विदेशों में होने वाली प्रदर्शनियों और आर्ट गैलरियों में भी इस कला को जगह मिली है।
इस बदलाव ने कलाकारों के लिए नए मौके पैदा किए हैं। अब पिथोरा सिर्फ़ धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि कई आदिवासी कलाकारों के लिए पहचान और रोज़गार का ज़रिया भी बन रही है। पिथोरा कला की बढ़ती पहचान का एक उदाहरण साल 2022 में भी देखने को मिला, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने G20 Summit के दौरान ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज़ को पिथोरा पेंटिंग उपहार में दी थी।
GI टैग ने बढ़ाई पहचान
Pithora Painting (पिथोरा पेंटिंग) को GI यानी Geographical Indication टैग भी मिल चुका है। इस पहचान ने इस पारंपरिक कला को एक अलग सम्मान दिया और इसके मूल क्षेत्र तथा कलाकारों की पहचान को मज़बूत करने में मदद की। GI टैग के बाद Pithora Painting (पिथोरा पेंटिंग) को लेकर लोगों की दिलचस्पी और बढ़ी है। इससे कलाकारों को नए बाज़ार मिल रहे हैं और इस पारंपरिक कला को देश-दुनिया तक पहुंचाने का रास्ता भी खुला है। आज Pithora Painting (पिथोरा पेंटिंग) आदिवासी कला के साथ-साथ भारत की लोक और सांस्कृतिक विरासत की पहचान बन चुकी है।
Pithora Painting (पिथोरा पेंटिंग) हमें ये भी बताती है कि किसी संस्कृति को ज़िंदा रखने के लिए सिर्फ़ उसकी तस्वीरों को बचाना काफी नहीं है। उसके पीछे छिपी कहानियों, गीतों, रस्मों और विश्वासों को भी अगली पीढ़ी तक पहुंचाना ज़रूरी है। मिट्टी की दीवारों से शुरू हुआ पिथोरा का सफ़र आज कागज़, कैनवस, आर्ट गैलरी और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच चुका है। लेकिन इसकी असली ख़ूबसूरती आज भी उन्हीं दीवारों में बसती है, जहां रंगों के साथ एक पूरा समुदाय अपनी कहानी लिखता है।
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