हमारी दुनिया में हज़ारों ज़बानें हैं, मगर कुछ ज़बानें इतनी पुरानी हैं कि हमें हज़ारों साल पीछे ले जाती हैं। आज हम बात करेंगे भारत की दो सबसे पुरानी ज़बानों – संस्कृत और तमिल की। ये दोनों ज़बानें सिर्फ भारत की पहचान नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के ज्ञान की बुनियाद हैं।

संस्कृत: देवताओं की ज़बान
संस्कृत को ‘देवों की भाषा’ कहा जाता है। ये करीब 3500 साल पुरानी है।
ऋग्वेद से शुरुआत
संस्कृत का सबसे पुराना ग्रंथ ऋग्वेद है, जो करीब 1500 ईसा पूर्व में लिखा गया। इसमें 1028 स्तुतियां (भजन) हैं। ये उस ज़माने की हैं जब आर्य क़बीले उत्तर-पश्चिम से भारत आ रहे थे।
शास्त्रीय संस्कृत
संस्कृत को एक बड़े विद्वान पाणिनि ने ‘अष्टाध्यायी’ नाम की किताब में सजाया। ये किताब करीब 400 ईसा पूर्व की है। पाणिनि ने संस्कृत को एक Regulate किया। जिससे ये दुनिया की सबसे वैज्ञानिक ज़बानों में से एक बन गई।
संस्कृत का साहित्य
संस्कृत में बहुत सी बड़ी किताबें लिखी गईं:
- महाभारत और रामायण (दो महाकाव्य)
- कालिदास के नाटक (जैसे अभिज्ञानशाकुन्तलम)
- उपनिषद, ब्राह्मण, आरण्यक
- गणित और खगोलशास्त्र की किताबें
संस्कृत का असर
संस्कृत ने हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म को आधार दिया। ये इंडोनेशिया, थाईलैंड, कंबोडिया, चीन और जापान तक फैली। आज भी संस्कृत मंदिरों और पढ़ाई में इस्तेमाल होती है।
क्या संस्कृत अब भी बोली जाती है?
संस्कृत अब मां-बोली के तौर पर नहीं बोली जाती। भारत की जनगणना में कुछ हज़ार लोग इसे अपनी मातृभाषा बताते हैं, मगर ये सांस्कृतिक गर्व से जुड़ी बात है। संस्कृत अब ज़्यादातर पूजा-पाठ और पढ़ाई तक सीमित है।

तमिल: आज भी ज़िंदा पुरानी ज़बान
तमिल दुनिया की सबसे पुरानी जीवित शास्त्रीय ज़बान है। आज भी इसे 8.5 करोड़ से ज़्यादा लोग बोलते हैं।
तमिल का इतिहास
तमिल के सबूत 300 ईसा पूर्व से मिलते हैं। इसकी सबसे पुरानी किताब तोल्काप्पियम है, जो व्याकरण और कविता की कला पर है।

पुराने सबूत
- आदिचनल्लूर में 696 ईसा पूर्व के मिट्टी के बर्तन मिले, जिन पर तमिल लिपि में लेखन था।
- कीझाड़ी में 580 ईसा पूर्व के लेख मिले।
- मिस्र, थाईलैंड और इंडोनेशिया में भी तमिल लेख मिले। इससे पता चलता है कि तमिल पुराने समुद्री व्यापार की ज़बान थी।
तमिल का सुनहरा दौर
तमिल का संगम साहित्य बहुत ख़ास है। इसमें 2000 से ज़्यादा कविताएं हैं, जो 300 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी तक लिखी गईं। ये दुनिया के सबसे पुराने साहित्यिक संग्रहों में से एक है।
तमिल का दुनिया भर में फैलाव
तमिल सिर्फ भारत में नहीं:
- तमिलनाडु और पुडुचेरी की राजभाषा
- श्रीलंका और सिंगापुर की आधिकारिक ज़बान
- मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका, मॉरीशस, फिजी और कनाडा में तमिल लोग
तमिल के तीन काल
तमिल को तीन हिस्सों में बांटा जाता है:-
- प्राचीन तमिल (300 ईसा पूर्व – 700 ईस्वी)
- मध्य तमिल (700 – 1600 ईस्वी)
- आधुनिक तमिल (1600 ईस्वी से अब तक)
पहली छपी भारतीय किताब
1578 में पुर्तगाली मिशनरियों ने ‘थम्बिरान वनक्कम’ नाम की तमिल प्रार्थना किताब छापी। ये किसी भारतीय ज़बान की पहली छपी किताब थी।
शुद्ध तमिल आंदोलन
20वीं सदी में ‘शुद्ध तमिल आंदोलन’ चला, जिसने संस्कृत के शब्दों को हटाकर असली तमिल शब्दों को अपनाने की बात कही।
संस्कृत और तमिल: फ़र्क और मिलते-जुलते पहलू
बात करें तो संस्कृत और तमिल दोनों ही भारत की प्राचीनतम भाषाएं हैं, लेकिन इनके भाषा-परिवार एकदम अलग हैं। संस्कृत जहां इंडो-यूरोपीय भाषा-परिवार से आती है, वहीं तमिल द्रविड़ भाषा-परिवार की प्रमुख भाषा है।
प्राचीनता की बात करें तो संस्कृत का इतिहास 1500 ईसा पूर्व तक जाता है, जबकि तमिल के प्रमाणित अभिलेख 300 ईसा पूर्व के मिलते हैं, हालांकि तमिल को दुनिया की सबसे पुरानी जीवित भाषा माना जाता है। आज के समय में दोनों की स्थिति बिल्कुल भिन्न है। संस्कृत अब खासतौर से धार्मिक अनुष्ठानों और शैक्षिक अध्ययन (Religious rituals and educational studies) तक सीमित रह गई है, जबकि तमिल आज भी 8.5 करोड़ से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली एक जीवंत भाषा है।

लिपि की दृष्टि से भी इनमें अंतर है। संस्कृत देवनागरी लिपि में लिखी जाती है, जबकि तमिल की अपनी ख़ास तमिल लिपि है, जो तमिल ब्राह्मी से विकसित हुई है।
इन दोनों भाषाओं का भौगोलिक प्रभाव भी अलग रहा है। संस्कृत ने उत्तर भारत से लेकर ईस्ट एशिया (चीन, जापान, इंडोनेशिया) तक अपनी छाप छोड़ी, वहीं तमिल ख़ासतौर से दक्षिण भारत और श्रीलंका से होते हुए दक्षिण-पूर्व एशिया (थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया) के समुद्री व्यापार मार्गों तक फैली। इस तरह, ये दोनों भाषाएं भारत की सांस्कृतिक विविधता के दो अलग-अलग लेकिन बेहद अहम पहलू हैं।
शास्त्रीय भाषाओं में पहचान
- तमिल को 2004 में भारत सरकार ने पहली शास्त्रीय भाषा घोषित किया।
- संस्कृत को 2005 में शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिला।
दुनिया पर असर
- संस्कृत ने यूरोपीय ज़बानों को समझने में मदद दी।
- तमिल के शब्द बाइबिल में भी मिलते हैं – करीब 500 ईसा पूर्व के इब्रानी शब्द तमिल से लिए गए।
संस्कृत ज्ञान की ज़बान, तो तमिल जन-जीवन की ज़बान
संस्कृत और तमिल दोनों ही भारत की अनमोल धरोहर हैं। संस्कृत ज्ञान की ज़बान रही, तो तमिल जन-जीवन की ज़बान बनी। आज के दौर में, हमें इन ज़बानों को बचाने की ज़रूरत है। सिर्फ बचाना ही नहीं, बल्कि ज़िंदा रखना भी ज़रूरी है। तमिल ने साबित किया कि एक पुरानी ज़बान लाखों दिलों में ज़िंदा रह सकती है। संस्कृत की गूंज मंदिरों में सुनाई देती है, तमिल की धड़कन 8.5 करोड़ लोगों के होठों पर है – यही दोनों की महानता है!
‘ज़बानें सिर्फ़ बोलने के लिए नहीं, बल्कि सोचने, समझने और अपनी पहचान बनाने के लिए होती हैं।’
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