चाहो तो दिल्ली (Delhi) को मेट्रो सिटी कहो, चाहो तो पॉवर हब, मगर दिल्ली के दिल में उतरने का सिर्फ एक रास्ता है वो हैं यहां की गलियां (streets)। हां, वही गलियां, जिनके नामों से न सिर्फ टैक्सी वाले भटकते हैं, बल्कि गूगल मैप भी कई बार हैंड्स-अप कर देता है।
हम आपको दिल्ली के उन्हीं ‘अनोखे ठौर-ठिकानों’ के बारे में बताएंगे जिनके बारे में बस यूं ही जाना, और नाम ले लिया, पर ये नहीं जाना कि आख़िर “नई सड़क” में आखिर नई ही क्यों? और ‘गली धोबियां’ में आज कपड़े क्यों नहीं सूखते?
तो बैठ जाइए अपनी दिल्ली वाली कुर्सी पर, क्योंकि अब हर गली अपनी कहानी सुनाएगी, किस्सा बादशाहत के जमाने का, बल्लीमरान से ले कर हौज़ काज़ी तक का।

नाई सरक (Nai Sarak)-जहां कभी उस्तरा चला, अब कलम और किताबें चलती हैं
चांदनी चौक के नज़दीक जब ये नाम सुनते हैं तो लगता है, “भाई, नाई ही रहते होंगे।” लेकिन दिल्ली वाला ज़हन चट करता है–अबे, यहां तो किताबों की दुकानें हैं!’
असल कहानी: मुगलिया दौर में राज दरबार के हजामत (बाल काटने) और सर्जिकल खून निकालने (फिरकनी) का काम यहीं के नाइयों (Barbers) के हाथ था। उनकी इज़्ज़त क्या थी, बादशाह भी इनसे कट्टी नहीं करते थे। ज़माना बदला, नाई उठे, और आज ये जगह किताबों, स्टेशनरी और कॉपी-पेन का सबसे बड़ा अड्डा बन गया है। मगर पुराना नाम ऐसा ज़िद्दी कि बदला ही नहीं।
गली धोबियां (Gali Dhobiyan) – यहां वॉशिंग मशीन भी सलाम करे
पुरानी दिल्ली की ऐसी गली जहां आज भी नाम सुनकर लगता है कि अभी कहीं इस्तरी और धूप में सूखता मैली जामा नज़र आ जाएगा।
असल कहानी: ये वो मुहल्ला था, जहां शाहजहांनाबाद के धोबी रहते थे। ज़रा सोचिए, उस ज़माने में जब बादशाहों के फ़ारसी ज़री बोर्डर वाले लिबास से लेकर आम आदमी के सूती कुर्ते तक, सब यहीं धुलते। आज भले ही वॉशिंग मशीन ने कब्जा जमा रखा है, मगर इस गली के नाम में वही पुरानी रूह बसती है। कपड़ा वही, पानी वही, पर कहानी कुछ और।
कूचा पट्टी राम (Kucha Pati Ram)-जब अंग्रेज़ों ने बनाया था ‘ट्रोल’
हां, यार। दिल्ली का ये मुहल्ला शायद ताना मारने की पुरानी पिक्चर का किरदार है। कूचा मतलब संकरा रास्ता, और पट्टी राम एक शख़्स।
असल कहानी: कहानी कुछ यूं है कि अंग्रेज़ों के ज़माने में पट्टी राम नाम का एक वकील या स्थानीय रईस था, जिसने जोरदार विद्रोह किया। अंग्रेज़ उससे इतने चिढ़े कि उन्होंने मसखरेपन में इसी का नाम इस जगह दे दिया, ताकि ये शख्स हमेशा ‘बदनाम’ रहे। मगर दिल्ली वालों ने इसे अपनी विरासत समझा और आज ये नाम इतिख़ाफ की मिसाल है। मतलब, ब्रिटिश राज ने पट्टी राम को भले ही छोटा किया, लेकिन इतिहास ने बड़ा कर दिया।

चावरी बाज़ार (Chawri Bazar)-एक ठुमक से बनिए-ब्याह तक
जब किसी बाज़ार का नाम लें और उसकी दिल की धड़कन बढ़ाए, तो समझो बात कुछ और है। आज चावरी बाज़ार को आप पीतल और कागज़ की सजावट के लिए जानते हैं, मगर…
असल कहानी: ये नाम फ़ारसी के ‘चौराहा’ से आया है। मगर असली मजा तब है जब पता चले कि मुगल काल में ये जगह ठुमकियों और ग़ज़लों की राजधानी हुआ करती थी। यहां तवायफ़ (courtesans) रहती थीं, जो अदब और मौसीकी में माहिर थीं। नवाबों के काफ़िले यहां जमा होते थे। फिर अंग्रेज़ों के आते ही तमाशा बदला, और आज यहां बारात निकलने की तैयारी देखिए। नाम चावरी बाज़ार का है, मगर आज भी यहां किसी न किसी बहाने से ‘बहार’ ज़रूर है।

बल्लीमारान (Ballimaran)-जहां अब नाव नहीं, हौक लगता है
“बल्लीमारान? यानी छड़ी मारने वाला?” गलत! ये नाम दिल्ली के असल अतीत की चीख़ है।
असल कहानी: फ़ारसी शब्द ‘बल्ली’ (पतवार) और ‘मार’ (मारने/चलाने) से बना। हां, यार, ध्यान से सुनिए, यमुना कभी दिल्ली से बिल्कुल सटकर बहती थी। यहां के मल्लाह (बोटमैन) अपनी नावें पतवार से चलाते थे। ज़रा तस्वीर बनाइए: बल्लीमारान में बैठे मल्लाह, हाथ में पतवार, और सामने बहती ठंडी यमुना। क्या नाम है रंगीन? नदी किनारे खिसक गई, मल्लाह उठ गए, मगर नाम बल्लीमारान का दिल से नहीं गया।

हौज़ काज़ी (Hauz Qazi)-काजी साहब का ‘वॉटर बॉडी’
ये नाम किताबों जैसा लगता है, मगर है तकलीफ देने वाला। ‘हौज़’ मतलब पानी का टैंक और ‘काज़ी’ मतलब जज।
असल कहानी: ईमानदारी से बताऊं? एक ऐसे काज़ी थे, जिन्होंने समाज के लिए पीने का पानी बचाने का काम किया। ये बड़ा तालाब उनकी न्याय और सार्वजनिक भलाई की निशानी था। पानी उस तालाब का कब का सूख चुका है। मगर एक काज़ी की ऐसी कहानी कि न केवल पानी, बल्कि उनका ‘हौज़’ भी इस शहर के दिल में अमर हो गया। आज हौज़ काज़ी जायेंगे तो पानी नहीं, बल्कि चिकन और गोश्त की बोलती होगी।

दरीबा कलां (Dariba Kalan)-अनोखी चमक, सोने जैसी
‘दरीबा’ मतलब ‘चांदी तोलने वाली तराज़ू’ और ‘कलां’ मतलब ‘बड़ा’। यानी ‘बड़ा सोना-चांदी बाज़ार’। आज भी यहां अमीरों की ससुराल जैसा नज़ारा है।
असल कहानी: ये वही जगह है जहां मुगल ख़ानदान के आभूषण और जड़ाऊ काम होता था। इतिहास गवाह है कि यहां से बाहर निकली हर माला पहनने लायक नहीं, बल्कि संजोने लायक होती थी। नाम में ‘कलां’ इसलिए है क्योंकि एक और दरीबा (खुर्द) भी था। कहने का मतलब, दिल्ली की चमक का असली ‘शोरूम’ यहीं है।

लाल कुंआ (Lal Kuan)-ख़ूनी कहानी या सिंदूरी राज़?
ये नाम सुनते ही बॉलीवुड की वो लाइन याद आ जाए – “ये लाल कुआं क्यूं कहलाता है?”
असल कहानी: एक समय यहां एक कुआं था या तो लाल पत्थरों से बना था, या उसके पानी पर सूरज ढलते वक़्त लाली छा जाती थी। कुछ पुरानी किताबों में ये भी लिखा है कि होली के दिन सिंदूर और गुलाल से कुआं लाल हो जाता था। मगर मुंह से सुनी कहानी ये है कि … छोड़िए, कोई चौंकाने वाला किस्सा भी है (ज़रा मासूमियत से कहें)। लेकिन इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो आज ये एक मशहूर बाज़ार है। दिल्ली में हर चीज़ के पीछे कोई न कोई ‘रंगीन’ कहानी तो है ही।

मटिया महल (Matia Mahal)-जहां बिखरा था मोती का दरबार
जामा मस्जिद के बगल में ये जगह ऐसी कि नाम सुनते ही लगता है, ‘अपने वाले’ ने यहां सपनों का घर बनाया था।
असल कहानी: ‘मटिया’ यानी मोती और ‘महल’ यानी भवन। ये वो महल था, जिसे बादशाह शाहजहां ने अपनी बेगम के लिए बनवाया था, सफ़ेद मोतियों से जड़ा हुआ। सोचिए, ज़रा मोतियों से सजा महल, जहां परियां बातें करती हों। वक्त के सितम ने वो दीवाने ढहा दिए, मगर ये नाम आज भी याद दिलाता है कि दिल्ली ने सुनहरी कलियां भी देखी हैं, मोती के आंगन भी देखे हैं।
तो दोस्तों, अगली बार जब आप किसी गली के अनोखे नाम पर अटकें, तो याद रखना-ये सिर्फ नाम नहीं, बल्कि दिल्ली की पहचान, उसका मिज़ाज और उसका हासिल हैं।

खारी बावली (Khari Baoli)-जब खारे पानी ने मसालों की महक उगली
पुरानी दिल्ली के दिल में बसी खारी बावली सुनते ही लगता है, ‘भाई, खारा पानी? इसमें मजा क्या?’ लेकिन यहां की कहानी उल्टी है।
असल कहानी:असल में ये नाम पड़ा एक बावली (सीढ़ियों वाले कुएं) के ऊपर, जिसका पानी खारा था।आज वो बावली गायब है, मगर उसी जगह एशिया का सबसे बड़ा थोक मसाला बाज़ार फल-फूल रहा है। मिर्च हो या हल्दी, इलायची हो या काजू – दिल्ली से लेकर लखनऊ, अमृतसर से लेकर देहरादून तक, हर बिरयानी और हर दाल की जान यहीं से आती है।
दिल्ली वालों का अंदाज़ देखिए: जहां नमकीन पानी का कुआं सूख गया, वहां मसालों की मीठी-तीखी खुशबू ने जगह बना ली। खारी बावली जाइए, तो बस इतना समझिए-’पानी खारा था, मगर यहां का स्वाद कभी फीका नहीं पड़ा।’

हम ऐसे ही दिल्ली के उन कोनों की कहानी लाते रहेंगे, जो लफ्ज़ों में बयां नहीं, बल्कि दिल में उतरने वाले हैं।
दिल्ली है तो, कुछ भी हो सकता है।
– बस एक गली का नाम पूछना पड़ता है।
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