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Archaeological Survey of India ने पाकिस्तान से मिली 1500 साल पुरानी मुहर की भाषा को डिकोड किया

सोचिए, अगर आपको 1500 साल पुरानी कोई चीज़ मिल जाए और वो अचानक आपको इतिहास का एक नया राज़ बता दे तो..हाल में कुछ ऐसा ही हुआ है। पाकिस्तान से मिली एक छोटी सी मुहर ने इतिहास के कई पुराने पन्नों के राज़ खोल दिए हैं। Archaeological Survey of India (ASI) के एपिग्रफी डिपार्टमेंट ने पाकिस्तान से मिली एक मुहर (seal) पर लिखी 5वीं शताब्दी की संस्कृत इबारत को डिकोड कर दिया है। ये ब्राह्मी लिपि में लिखी गई है।

इस मुहर से पता चला है कि ये ‘देवदारुवन’ (हिमालयी देवदार के पेड़ों का जंगल) में मौजूद स्वामी कोटेश्वर के एक शैव मंदिर की है। इस पर संस्कृत ज़ुबान में ब्राह्मी लिपि में कुछ लिखा हुआ था, जिसे समझना आसान नहीं था। लेकिन Archaeological Survey of India के शिलालेख एक्सपर्ट्स ने काफी मेहनत कर इसे आख़िरकार डिकोड कर लिया।

Archaeological Survey of India के अधिकारी के.मुनिरत्नम रेड्डी के मुताबिक, इस मुहर पर लिखा है – “Devadaruvane Svami Kotesvarah”। आसान भाषा में इसका मतलब है, देवदारु वन में स्वामी कोटेश्वर। यानी ये मुहर किसी ऐसे मंदिर से जुड़ी थी, जो भगवान शिव को समर्पित था और जिसका नाम “स्वामी कोटेश्वर” था। दिलचस्प बात है कि ये मुहर हांगकांग की Francoise Mandeville ने Archaeological Survey of India के साथ शेयर की थी, जिसके बाद इस पर रिसर्च शुरू हुई।

Source: Brahmi Script Wikipedia

Archaeological Survey of India के मुताबिक, ये मुहर स्कंदपुराण में वर्णित ‘देवदारु वन’ में भगवान शिव के घूमने की कथा का सबसे पुराना कलात्मक और लिखित प्रमाण हो सकती है। इस खोज की सबसे ख़ास बात है कि ये भगवान शिव से जुड़ी एक पुरानी कहानी से मेल खाती है। Skanda Purana में बताया गया है कि भगवान शिव देवदारु वन में घूमते थे। ऐसे में ये मुहर उस कहानी का सबसे पुराना सबूत मानी जा रही है।

यही नहीं, पिछले कुछ समय में Archaeological Survey of India ने पाकिस्तान से जुड़ी और भी कई पुरानी लिखावटों को समझा है। साल 2024 में, इसी विभाग ने गिलगित (पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के बाहर) से मिली 4वीं शताब्दी की एक और संस्कृत इबारत को डिकोड किया था। उसमें बताया गया था कि पुष्पसिंघ नाम के व्यक्ति ने अपने गुरु के सम्मान में एक ‘महेश्वर लिंग’ की स्थापना की थी।

इसके अलावा, पेशावर के पास मिली 10वीं सदी की एक अधूरी लिखावट भी पढ़ी गई, जिसमें बौद्ध धर्म के कुछ मंत्रों का ज़िक्र मिलता है। इन सब खोजों से एक बात साफ होती है-आज जो इलाके पाकिस्तान में हैं, वहां भी कभी हिंदू और बौद्ध संस्कृति का गहरा असर था।लोग संस्कृत ज़ुबान का इस्तेमाल करते थे और अलग-अलग लिपियों में लिखते थे। ये छोटी सी मुहर हमें बताती है कि हमारा इतिहास कितना गहरा और जुड़ा हुआ है। कई बार एक छोटी सी चीज़ भी हमें अपने अतीत के बारे में बहुत बड़ी बात बता जाती है।

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