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800 साल का रहस्य खुलेगा! कोणार्क के सूर्य मंदिर के जगमोहन से हटेगी रेत, अंग्रेजों ने ऐसे किया था बंद

कोणार्क का सूर्य मंदिर सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि पत्थर की जुबां है। इसे देखकर कवि गुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था, ‘यहां पत्थर की भाषा इंसान की भाषा को मात देती है।’ 

 करीब 123 साल बाद, ओडिशा के कोणार्क स्थित 13वीं सदी के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर (कोणार्क सूर्य मंदिर) के अंदर का राज़ खुलने जा रहा है। Archaeological Survey of India (ASI) ने मंदिर के जगमोहन से रेत निकालने का प्रोसेस  शुरू हो गया है। ये वही जगह है जिसे अंग्रेजों ने सदी भर पहले ढहने से बचाने के लिए पूरी तरह रेत से ठूंसकर बंद कर दिया था।

आख़िर क्यों भरी गई थी रेत?

सन 1900 से 1904 के बीच, ब्रिटिश अफसरों को डर था कि ये विशाल संरचना ढह जाएगा। मंदिर के मुख्य भाग (देउल) का शिखर पहले ही गिर चुका था। बचाव के लिए, ब्रिटिश इंजीनियरों ने जगमोहन (सभा मंडप) को अंदर तक रेत से भर दिया। उनका मानना था कि रेत अंदर से सहारा देगी और दीवारों पर दबाव नहीं पड़ेगा।

लेकिन अब, 100 साल से ज्यादा समय बाद, यही रेत मुसीबत बन गई है। रेत धीरे-धीरे बैठ गई है, जिससे ऊपरी हिस्सा खाली हो गया है और दीवारों पर असर पड़ रहा है। स्पेशलिस्टों का कहना है कि रेत नमी भी पकड़ती है, जिससे पत्थर कमजोर हो रहे हैं।

ASI कैसे निकालेगी रेत?

ASI ने ये काम ”Diamond Drilling’ Technique से शुरू किया है, ताकि मंदिर को कोई नुकसान न हो और कंपन (Vibration) बिल्कुल न हो।

  • पैसेज बनाना: वेसटर्न वॉल पर 6×5 फीट का रास्ता (पैसेज) बनाया जा रहा है।
  • जोखिम: ASI अफसरों का कहना है कि इसमें वक्त लगेगा। उन्होंने बताया कि ड्रिलिंग में ही 1 साल तक लग सकता है क्योंकि पुरानी संरचना को बचाना सबसे बड़ी चुनौती है।
  • मैन्युअल मेहनत: एक बार दरवाजा बनने के बाद, मजदूर हाथों से अंदर जाकर रेत बाहर निकालेंगे। ये बहुत धीमा और संवेदनशील प्रोसेस है।

रहस्य और महिमा

ये मंदिर सिर्फ पूजा की जगह नहीं, बल्कि एक इंजीनियरिंग का चमत्कार है।

रथ का आकार: माना जाता है कि ये मंदिर भगवान सूर्य के रथ का प्रतीक है। इसे बनाने के लिए 12 जोड़ी (कुल 24) विशाल पहिये बनाए गए थे और 7 घोड़े थे, जो इसे खींचते दिखते हैं।

घड़ी का कमाल: ये पहिये सिर्फ दिखावे के लिए नहीं हैं। ये प्राचीन घड़ियां (Sundial) भी हैं। इन पहियों की तीलियों के आधार पर दिन का सही समय पता लगाया जा सकता है।

निर्माण: राजा नरसिंहदेव प्रथम ने लगभग 1200 कारीगरों से 12 साल में इसे बनवाया था।

75 साल पहले भी हुई थी कोशिश

आपको जानकर हैरानी होगी कि साल 1950 के दशक में तत्कालीन DG देबाला मित्रा ने भी इसे खोलने की कोशिश की थी। उन्होंने पाया था कि अंदर नमी के कारण काई (मॉस) उग रही है, जो कोणार्क के Khondalite Stones को नुकसान पहुंचा रही है।

क्यों है ये इतना खास?

कोणार्क का मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल (The Konark Temple: A UNESCO World Heritage Site) है। हर साल लाखों सैलानी इसे देखने आते हैं। अब जब रेत हट जाएगी और जगमोहन का दरवाजा खुलेगा, तो शायद हमें उन रहस्यों के बारे में पता चले जो सदियों से इन पत्थरों में दबे हुए हैं।

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