Wednesday, September 2, 2026
30 C
Delhi

ख़्वाजा ग़ुलाम फ़रीद: जब इश्क़ बना ज़िंदगी का मक़सद, एक सूफ़ी शायर की दास्तान

उर्दू और सूफ़ी अदब की दुनिया में ख़्वाजा ग़ुलाम फ़रीद का नाम बड़ी अज़मत और मोहब्बत के साथ लिया जाता है। वो सिर्फ़ एक शायर नहीं थे, बल्कि एक ऐसे सूफ़ी दरवेश थे, जिनकी शायरी में रूहानियत, इश्क़ और इंसानियत की गहरी झलक मिलती है।

ख़्वाजा ग़ुलाम फ़रीद की पैदाइश 19वीं सदी में बहावलपुर के चाचरां में हुयी। बचपन में ही उनके वालिद का साया उठ गया, लेकिन उनके बड़े भाई ख़्वाजा फ़ख़रुद्दीन ने उन्हें प्यार और तालीम के साथ पाला। यही वजह है कि फ़रीद साहब ने छोटी उम्र से ही इल्म और अदब की राह पकड़ ली। उन्होंने नवाब सादिक़ मुहम्मद IV के शाही महल में तालीम हासिल की, जहां उन्हें दीनी और दुनियावी दोनों इल्मों का गहरा ज्ञान मिला।

उनकी शख़्सियत का सबसे ख़ास पहलू उनका सूफ़ी रंग था। वो चिश्ती सिलसिले से ताल्लुक रखते थे, जो मोहब्बत, इंसानियत और ख़ुदा से जुड़ाव का पैग़ाम देता है। 1875 में उन्होंने हज किया और उसके बाद चोलिस्तान के रेगिस्तान (रोही) में जाकर चिल्ला किया। करीब 18 साल तक उन्होंने तन्हाई में इबादत और तफ़क्कुर (चिंतन) किया। यही तजुर्बा उनकी शायरी में गहराई बनकर उभरा।

फ़रीद साहब की शायरी का असल रंग “इश्क़” है  चाहे वो दुनियावी मोहब्बत हो या रूहानी। उनकी ज़बान मुल्तानी (जो बाद में सराइकी बनी) थी, और उन्होंने इसी ज़बान में अपनी सबसे ख़ूबसूरत रचनाएं कीं। इसके अलावा उन्होंने उर्दू, पंजाबी, फ़ारसी, सिंधी और पश्तो में भी लिखा, लेकिन उनकी पहचान मुल्तानी शायरी से ही बनी।

उनकी मशहूर रचनाओं में दीवान-ए-फ़रीद और मसनवी मदन-ए-इश्क़ शामिल हैं। उनकी शायरी में दर्द, जुदाई, मोहब्बत और ख़ुदा की तलाश साफ़ झलकती है।

“लग गई प्रीत ते भूल गई सारी जात सिफ़ात दी हो मैं
इश्क़ दे राह ते हुन ख़ार हज़ारां मैं तड़पी उन सौ है”

जब इंसान सच्चे इश्क़ में डूब जाता है, तो वो अपनी पहचान, जात-पात और दुनिया की सारी बंदिशें भूल जाता है। इश्क़ का रास्ता आसान नहीं होता, इसमें तकलीफ़ें भी हैं, लेकिन यही रास्ता इंसान को असल सुकून तक ले जाता है।

फ़रीद साहब के यहां “इश्क़” सिर्फ़ मोहब्बत नहीं, बल्कि एक रूहानी सफ़र है। वो कहते हैं कि अगर दिल में महबूब (ख़ुदा) बस जाए, तो इंसान हर गुनाह और तकलीफ़ से पाक हो जाता है। इसी ख़याल को आसान अल्फ़ाज़ में यूं समझा जा सकता है:

“जो शख़्स दिल के मंदिर में महबूब को पा लेता है, वो हर दर्द, हर गुनाह से ऊपर उठ जाता है।”

उनकी ज़िंदगी और शायरी हमें ये सिखाती है कि असली सुकून दौलत या शोहरत में नहीं, बल्कि दिल की पाकीज़गी और ख़ुदा से रिश्ते में है।

1901 में उनका इंतकाल हुआ और उन्हें मितनकोट में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। आज भी उनका दरगाह लाखों लोगों के लिए सुकून और अकीदत का मरकज़ है।

ख़्वाजा ग़ुलाम फ़रीद की शायरी वक़्त के साथ और भी ज़िंदा होती जा रही है, क्योंकि उसमें इंसानियत, मोहब्बत और सच्चाई का वो पैग़ाम है, जिसकी ज़रूरत हर दौर में रहती है।

ये भी पढ़ें: इक़बाल अशहर: “उर्दू है मिरा नाम…” से पहचान बनाने वाले शायर की अदबी दास्तान

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

ज़मीन अली: वो चराग़ जिसने उर्दू के लिए एक नया रास्ता रोशन किया

कुछ लोग सिर्फ़ अपने दौर के लिए काम नहीं...

अमजद हैदराबादी: दर्द को रुबाई में ढालने वाले शायर

उर्दू अदब की दुनिया में अमजद हैदराबादी का नाम...

राबिया बसरी: मोहब्बत-ए-इलाही की पहली सूफ़ी शायरा 

तसव्वुफ़ की तारीख़ में अगर किसी एक नाम को...

Topics

अमजद हैदराबादी: दर्द को रुबाई में ढालने वाले शायर

उर्दू अदब की दुनिया में अमजद हैदराबादी का नाम...

राबिया बसरी: मोहब्बत-ए-इलाही की पहली सूफ़ी शायरा 

तसव्वुफ़ की तारीख़ में अगर किसी एक नाम को...

Related Articles

Popular Categories