रंगरेटे गुरु के बेटे – भाई जैता जी
भारत के मध्यकालीन इतिहास को देखें तो साफ समझ आता है कि उस समय समाज में जाति-पात, ऊंच-नीच और भेदभाव जैसी कई बुराइयाँ फैली हुई थीं। खासकर हिंदू समाज इन कुरीतियों में बुरी तरह उलझा हुआ था। ऐसे समय में गुरु नानक देव जी का आगमन हुआ और सिख धर्म की शुरुआत हुई। गुरु नानक देव जी ने इन बेकार की रस्मों और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई और लोगों को एक नई सोच दी।
उनके आने से पंजाब के लोगों को इन बुराइयों से काफी हद तक राहत मिली। दलित समाज के कई लोग, जिन्हें हिंदू समाज में बराबरी और सम्मान नहीं मिल रहा था, उन्होंने सिख धर्म को अपनाया। सिख धर्म में ऐसी ऊंच-नीच और भेदभाव की कोई जगह नहीं थी। गुरु नानक देव जी के समय से ही संगत और पंगत की परंपरा शुरू हुई। संगत का मतलब है सबका एक साथ बैठना, और पंगत का मतलब है सबका एक साथ बैठकर खाना। इससे यह साफ संदेश जाता है कि सिख धर्म में सभी इंसान बराबर हैं, चाहे उनकी जाति या हैसियत कुछ भी हो।
गुरु नानक पातशाह जी की यात्राओं के दौरान उनके साथ रहने वाले भाई मरदाना जी भी मिरासी समाज से थे और दलित पृष्ठभूमि से आते थे। बाबा नानक के समय से ही दलित समाज के कई परिवार सिख धर्म से जुड़ने लगे थे। ऐसा ही एक परिवार था भाई जैता जी का, जो गुरु तेग बहादुर जी और गुरु गोबिंद सिंह जी के समय में गुरु घर का बहुत ही समर्पित सेवक था। भाई जैता जी खुद भी गुरु के बहुत बड़े भक्त थे।

भाई जैता जी के परदादा, भाई कल्याणा, अमृतसर के पास कथूनंगल में रहते थे। वो मुगल बादशाह जलाल-उद-दीन मुहम्मद अकबर के समय में सिख धर्म से जुड़े थे। उन्होंने चौथे गुरु गुरु राम दास जी और पांचवें गुरु गुरु अर्जन देव जी की बहुत सेवा की और उनके पक्के भक्त बन गए। भाई कल्याणा के बाद उनके बेटे भाई सुखभान ने कथूनंगल छोड़कर दिल्ली की तरफ रुख किया। वे अपने समय के बहुत अच्छे संगीत के जानकार थे। दिल्ली के पास राय सीना गांव में उन्होंने एक संगीत विद्यालय खोला, जिसका नाम अपने पिता के नाम पर “कल्याण आश्रम” रखा।
धीरे-धीरे यही जगह “कल्याणे दी धर्मशाला” के नाम से मशहूर हो गई। जब भी पंजाब से लोग दिल्ली आते थे, तो यहीं ठहरते थे। इस धर्मशाला का जिक्र गुरु तेग बहादुर जी की असम यात्रा के दौरान भी मिलता है। 20 जनवरी 1670 को जब वे असम से लौट रहे थे, तब उन्होंने दिल्ली के पास इसी कल्याणे दी धर्मशाला में आकर रुके थे। भाई सुखभान के बेटे भाई जसभान भी दिल्ली में बड़े संगीतकार बने। वे गुरु हर राय जी के बहुत बड़े भक्त थे और उनकी गायकी दिल्ली में काफी मशहूर थी। भाई जसभान के दो बेटे थे—आग्या राम और सदानंद।
दोनों ने अपने परिवार की संगीत परंपरा को आगे बढ़ाया और गुरबानी को संगीत के रूप में गाना शुरू किया। खासकर भाई सदानंद ने गुरबानी के प्रचार में अच्छा नाम कमाया। वे दिल्ली में सिखों की बड़ी सभाओं में गुरबानी सुनाया करते थे। जैसे भाई मरदाना जी ने गुरु नानक देव जी के साथ मिलकर गुरबानी को फैलाया था, वैसे ही भाई सदानंद ने गुरु तेग बहादुर जी के साथ इस काम में मदद की।
जब गुरु तेग बहादुर जी पूरब (पूर्व) की तरफ यात्रा कर रहे थे, तब भाई सदानंद जी भी उनके साथ थे। उसी दौरान बिहार के पटना शहर में, जो उस समय मुगलों के शासन में था, 13 दिसंबर 1661 को माता प्रेमो के घर भाई जैता जी का जन्म हुआ। पटना में रहते हुए भाई जैता जी ने संगीत और युद्ध कला दोनों में महारत हासिल की। उन्होंने घुड़सवारी और तीरंदाजी भी सीखी। जब गुरु तेग बहादुर जी असम से वापस पंजाब लौटे, तो उनके साथ सिख संगत भी पंजाब की ओर चल पड़ी।
भाई सदानंद भी दिल्ली छोड़कर पंजाब में बस गए। वे अमृतसर के पास रामदास इलाके में जाकर रहने लगे, जहां उन्होंने बाबा बुढ़ा जी के परपोते भाई गुरदित्ताजी के साथ निवास किया। यहीं पर भाई जैता जी की शादी बीबी राज कौर से हुई, जो भाई सुरजन सिंह जी की बेटी थीं। उनके चार बेटे हुए—भाई गुलज़ार, भाई गुरदियाल, भाई सुखा और भाई सेवा।
दिल्ली से पुराने रिश्ते होने की वजह से भाई जैता जी अक्सर वहां आते-जाते रहते थे। उनके चाचा आग्या राम का परिवार भी दिल्ली में अपनी पुरानी धर्मशाला के पास रहता था, और सिखों में उनकी अच्छी इज्जत थी। भाई जैता जी को दिल्ली आने-जाने के सभी रास्तों की अच्छी जानकारी थी। उन्हें शाही मुगल रोड के साथ-साथ गांवों और जंगलों से गुजरने वाले दूसरे रास्ते भी पता थे। जब कभी मुगलों के हुक्म से मुख्य रास्ते बंद हो जाते थे, तब वे इन्हीं दूसरे रास्तों से दिल्ली और पंजाब के बीच सफर करते थे।
जब गुरु तेग बहादुर जी आनंदपुर साहिब में आकर रहने लगे, तो दूर-दूर से सिख श्रद्धालु उनसे मिलने आने लगे। भाई जैता जी भी अपने परिवार के साथ आनंदपुर साहिब पहुंचे। वहां गुरु तेग बहादुर जी अपनी माता माता नानकी जी, पत्नी माता गुजरी जी और बेटे गोबिंद राय के साथ शांति से रहते थे। वे रोज़ाना कीर्तन करते थे और पंजाब की संगत को सिख धर्म का उपदेश देते थे।

उसी समय कश्मीर के कुछ पंडित, जो वहां के सूबेदार इफ्तिखार खान के जुल्मों से परेशान थे, पंडित कृपा राम दत्त की अगुवाई में श्री आनंदपुर साहिब पहुंचे। उन्होंने गुरु तेग बहादुर जी के सामने अपनी परेशानी रखी। उन्होंने बताया कि कश्मीर का सूबेदार उन्हें जबरदस्ती अपना धर्म बदलने के लिए मजबूर कर रहा है। वे मदद की उम्मीद लेकर गुरु के दरबार में आए थे।
पूरी बात सुनने के बाद गुरु तेग बहादुर जी ने उनसे कहा कि वे कश्मीर जाकर सूबेदार से कहें—अगर वह गुरु नानक की नौवीं जोत, यानी तेग बहादुर को इस्लाम कबूल करवा ले, तो सारे कश्मीरी पंडित भी इस्लाम अपना लेंगे। दरबार में बैठे हुए गुरु तेग बहादुर जी ने यह भी कहा कि अब समय आ गया है कि कोई महान व्यक्ति अपना बलिदान दे। यह सुनकर छोटे गोबिंद राय ने कहा, “पिता जी, आपसे बड़ा महान व्यक्ति और कौन हो सकता है?”

इसके बाद गुरु तेग बहादुर जी ने दिल्ली जाने और मुगल बादशाह औरंगज़ेब से बात करने का फैसला किया। उन्होंने ठान लिया कि अगर बलिदान देना पड़े, तो वे खुद ही यह बलिदान देंगे। गुरु तेग बहादुर जी न तो हिंदू थे और न ही वे तिलक या जनेऊ पहनते थे, लेकिन फिर भी उन्होंने दूसरे धर्म और उसके निशानों की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान करने का फैसला किया। यह उनके इंसानियत के प्रति गहरे प्रेम और भाईचारे की सबसे बड़ी मिसाल है।
“तिलक जंजू राखा प्रभ ता का,
कीनो बड़ा कलु में साका।”
कुछ महीने बीत चुके थे, जब पंडित कृपा राम दत्त और उनके साथी आनंदपुर साहिब से गुरु जी का भरोसा लेकर लौटे थे। इस बीच कश्मीर के सूबेदार इफ्तिखार खान को यह खबर मिल गई थी कि गुरु तेग बहादुर जी खुद हिंदुओं की रक्षा के लिए मुगल बादशाह औरंगज़ेब के सामने पेश होंगे। गुरु जी ने अपनी पूरी तैयारी कर ली थी। आनंदपुर साहिब में संगत को बुलाया गया और एक बड़ी सभा हुई।
भाई जैता जी भी अपने परिवार के साथ वहां पहुंचे। गुरु तेग बहादुर जी ने संगत के सामने खुलकर अपनी बात रखी और दिल्ली जाने का फैसला बताया। उनके चेहरे पर एक अलग ही रौशनी थी, और वही जोश संगत के दिलों में भी दिख रहा था। अब जिम्मेदारी छोटे गोबिंद राय के कंधों पर आने वाली थी। दिल्ली जाने का फैसला पक्का हो चुका था, इसलिए गुरु जी ने परंपरा के अनुसार गोबिंद राय के माथे पर तिलक लगाया और उन्हें हिम्मत और भरोसा दिया। माता गुजरी जी ने भी बहुत हिम्मत के साथ आने वाले समय को समझा।
गुरु जी ने गोबिंद राय को उनके मामा किरपाल चंद की जिम्मेदारी में देते हुए कहा, “अब गोबिंद तुम्हारी जिम्मेदारी है।” साथ ही उनकी पढ़ाई-लिखाई का खास ध्यान रखने को कहा। गुरु जी की बड़ी बहन बीरो जी भी अपने भाई को नम आंखों से देख रही थीं। उनके दिल में बस यही दुआ थी कि उनके भाई की इज्जत और मर्यादा बनी रहे। उनके बेटे—सांगो शाह, गुलाब चंद, जीत मल, गंगा राम और महरी चंद—सब छोटे गोबिंद राय के साथ भाईयों की तरह मजबूती से खड़े थे।
अब आनंदपुर छोड़ने का समय आ गया था। गुरु जी का यह फैसला उनकी बाणी के इन शब्दों को सच कर रहा था—
“बांह जिना दी पकड़ीए, सिर दीजै बांह न छोड़ीए।”
जब गुरु तेग बहादुर जी आनंदपुर साहिब से रवाना हुए, तो उनके साथ पांच सिख पूरी श्रद्धा और हिम्मत के साथ चलने को तैयार थे। इनमें भाई मती दास, भाई सती दास, भाई दयाल दास, भाई उदा और भाई जैता जी शामिल थे। गुरु जी सबसे पहले कीरतपुर साहिब पहुंचे, जहां आसपास के गांवों से संगत उनसे मिलने आई। गुरु जी ने वहां सबको अपनी योजना के बारे में बताया। अगले दिन सुबह वे आगे के सफर के लिए निकल पड़े।
रूपनगर (रोपड़) के पास मलिकपुर रंगढ़ां नाम की जगह पर गुरु जी को गिरफ्तार कर लिया गया। पहले उन्हें बस्सी पठाना के किले में कुछ समय के लिए कैद रखा गया, फिर वहां से दिल्ली ले जाया गया। गुरु जी के कहने पर सिर्फ तीन सिख—भाई सती दास, भाई मती दास और भाई दयाल दास—को ही उनके साथ गिरफ्तार किया गया। दिल्ली में उस समय औरंगज़ेब मौजूद नहीं था, इसलिए वहां के सूबेदार, चांदनी चौक के कोतवाल और काज़ी ने गुरु जी के सामने तीन शर्तें रखीं।
पहली—इस्लाम कबूल कर लो।
दूसरी—कोई करामात (चमत्कार) दिखाओ।
तीसरी—मौत के लिए तैयार हो जाओ।
गुरु तेग बहादुर जी ने पहली दो शर्तों को साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि उनका धर्म उनके लिए सबसे प्यारा है, और वे किसी भी हालत में अपना धर्म नहीं बदल सकते। उन्होंने यह भी कहा कि सिख धर्म में चमत्कार दिखाने की कोई जगह नहीं है, इसलिए वे कोई करामात नहीं दिखाएंगे। तीसरी शर्त के लिए उन्होंने साफ कहा—वे इसके लिए पूरी तरह तैयार हैं।

नवंबर 1675 में, गुरु तेग बहादुर जी की आंखों के सामने ही उनके साथियों को बहुत ही दर्दनाक सज़ाएं दी गईं। भाई दयाल दास को खौलते पानी में उबाल दिया गया, भाई मती दास को आरी से चीर दिया गया और भाई सती दास को जिंदा जला दिया गया। लेकिन गुरु जी अपने फैसले पर अडिग रहें, ज़रा भी नहीं डोले। उनकी इस अटल हिम्मत को देखकर, औरंगज़ेब के हुक्म पर चांदनी चौक में गुरु तेग बहादुर जी का सिर कलम कर दिया गया। गुरु जी ने अन्याय, ज़ुल्म और जबरदस्ती के खिलाफ खड़े होकर अपनी शहादत दी।
इसके बाद एक बहुत ही साहस भरी घटना हुई। भाई लखी शाह वंजारा गुरु जी के शरीर को अपने घर ले गए और अंतिम संस्कार करने के लिए अपने ही घर को आग लगा दी। आज उसी जगह गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब बना हुआ है।

उधर, गुरु घर के सच्चे सेवक भाई जैता जी ने फैसला किया कि वे गुरु जी का कटा हुआ शीश आनंदपुर साहिब लेकर जाएंगे। उस समय मुगलों का सख्त पहरा था और हर जगह निगरानी थी। लेकिन वाहेगुरु की कृपा और अपनी हिम्मत के दम पर भाई जैता जी ने अपने साथियों—भाई नानू राम दिलवाली और भाई उदे राठौरे—के साथ मिलकर गुरु जी का शीश दिल्ली से बाहर निकालने में कामयाबी हासिल की। भाई जैता जी को दिल्ली से बाहर निकलने के कई अलग-अलग रास्ते अच्छे से पता थे।
एक रात दिल्ली में रुकने के बाद, अगले दिन सुबह-सुबह वे गुरु जी का शीश लेकर निकल पड़े। उनके साथ भाई नानू राम दिलवाली और भाई उदे राठौरे भी थे। वे यमुना नदी पार करके आगे बढ़े। पूरा दिन चलने के बाद भाई जैता जी और उनके साथियों ने दूसरा दिन करनाल के पास तरावी गांव में बिताया। यहां भाई जैता जी ने रात भाई देवा राम के घर पर बिताई, जो गुरु घर के भक्त के तौर पर धोबी का काम करते थे। अगले दिन सुबह उन्होंने अपने सफर का तीसरा पड़ाव शुरू किया। मुगलों की नजरों से बचते हुए वे अंबाला के पास टांगरी नदी के किनारे पहुंचे।

वहां कई सिख परिवार रहते थे, लेकिन भाई जैता जी ने सिर्फ भाई रामदेव के घर रुकने का इंतजाम किया। दिन में वे तीनों ऐसे चलते थे जैसे एक-दूसरे को जानते ही नहीं, ताकि किसी को शक न हो। लेकिन रात को फिर एक साथ मिल जाते थे। अगली सुबह भाई रामदेव से विदा लेकर उन्होंने अपने सफर का चौथा पड़ाव शुरू किया। वे घग्गर नदी पार करके पंजाब के गांवों से होते हुए आगे बढ़े। रास्ता आसान नहीं था—कभी भटकना, कभी ठोकर खाना, कभी जंगलों से गुजरना—कई मुश्किलों का सामना करते हुए वे आखिरकार कीरतपुर साहिब के पास वेवंगढ़ पहुंच गए।
वहां से आनंदपुर साहिब खबर भेजी गई। वह से उन्हें वहीं रुकने का हुक्म आया। इसके बाद छोटे गोबिंद राय, माता नानकी जी और माता गुजरी जी सिख संगत के साथ कीरतपुर साहिब पहुंचे। वे अपने साथ फूलों से सजी हुई एक सुंदर पालकी लेकर आए थे। बीबी बीरो और उनके पांचों बेटे, साथ ही गुरु तेग बहादुर जी के बड़े भाई सूरज मल और उनका परिवार भी विवानगढ़ पहुंच गया। वहां सबने ध्यान से भाई जैता जी से पूरी घटना सुनी। भाई जैता जी की इतनी बड़ी और कठिन सेवा को देखकर छोटे गोबिंद राय ने उन्हें गले लगा लिया और आशीर्वाद देते हुए कहा—
“रंगरेटे गुरु के बेटे”
इसके बाद भाई जैता जी ने बहुत ही सम्मान और श्रद्धा के साथ गुरु तेग बहादुर जी का शीश गोबिंद राय जी को सौंप दिया। गोबिंद राय जी ने उस शीश को आदर से पालकी में रखा। संगत ने एक-एक करके माथा टेका और दर्शन किए। फिर पूरी संगत बारी-बारी से पालकी को अपने कंधों पर उठाकर “सतनाम-वाहेगुरु” का जाप करते हुए आनंदपुर साहिब पहुंची।

वहां एक रात के लिए शीश को घर में रखा गया। पांचवें दिन, गुरु के महल के सामने, छोटे गोबिंद राय ने खुद अपने हाथों से चंदन की चिता तैयार की और उस पर शीश रखा। पूरी संगत की आंखों में आंसू थे, दिल भारी था, और सबने गुरु जी को अंतिम विदाई दी। आज उसी जगह गुरुद्वारा शीश गंज साहिब बना हुआ है, जो इस बलिदान की याद दिलाता है।
यह दुनिया के इतिहास की एक अनोखी घटना थी—जहां एक ही इंसान के शरीर का अंतिम संस्कार दिल्ली में हुआ और उसका शीश 5 दिन बाद, 320 किलोमीटर दूर आनंदपुर साहिब में। भाई जैता जी ने गुरु घर के साथ अपने रिश्ते को एक अलग ही मिसाल बना दिया। इसके बाद वे आनंदपुर साहिब में ही गुरु गोबिंद सिंह जी के साथ रहने लगे और उनकी लड़ाइयों में भी उनका पूरा साथ दिया।
अप्रैल 1699 में, जब गुरु गोबिंद सिंह जी ने वैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना की और एक अलग सिख पहचान बनाई, तब भाई जैता जी ने भी खंडे-बाटे का अमृत छक कर खालसा में दीक्षा ली और उनका नाम भाई जीवन सिंह हो गया। उनके पूरे परिवार ने भी खालसा पंथ अपनाया और गुरु जी का आशीर्वाद लिया। जब गुरु गोबिंद सिंह जी आनंदपुर साहिब छोड़कर निकले, तब 1704 में भाई जीवन सिंह ने गुरु घर और सिख कौम की रक्षा करते हुए अपनी जान कुर्बान कर दी। जब तक दुनिया रहेगी, गुरु तेग बहादुर जी का यह बलिदान—जो इंसानियत, मानव अधिकार, बराबरी और आज़ादी के लिए दिया गया—कभी भुलाया नहीं जा सकता।

इसके साथ ही, भाई जैता जी की वह कहानी भी हमेशा याद रखी जाएगी, जब उन्होंने गुरु जी का पवित्र शीश दिल्ली से आनंदपुर साहिब तक पूरे सम्मान के साथ पहुंचाया। यह करीब 320 किलोमीटर का सफर उनकी बेमिसाल बहादुरी को दिखाता है। यह यात्रा सिर्फ एक सफर नहीं थी, बल्कि जैसे भाई जैता जी और गुरु तेग बहादुर जी के पवित्र शीश के बीच एक खामोश, दिल से दिल तक की बात थी—जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।
स्टोरी– असिस्टेंड प्रोफ़ेसर रविंदर सिंह
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