संत कबीरदास भारतीय संत परंपरा के सबसे बड़े कवियों में गिने जाते हैं। उन्होंने लोगों को धर्म, जाति और ऊंच-नीच से ऊपर उठकर इंसानियत और मोहब्बत का रास्ता अपनाने की सीख दी। उनकी बातें आज से करीब 600 साल पहले जितनी सच थीं, उतनी ही आज भी हैं।
कबीरदास की पैदाइश को लेकर अलग-अलग मत हैं। माना जाता है कि उनका जन्म 1398 ईस्वी में काशी (वाराणसी) में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन हुआ था। उनका पालन-पोषण नीरू और नीमा नाम के जुलाहा दंपति ने किया। कई लोग उन्हें संत रामानंद का शिष्य मानते हैं, जबकि कुछ लोग उनका संबंध सूफ़ी संतों से भी जोड़ते हैं।
कबीर ऐसे समय में आए, जब समाज जात-पात, छुआछूत, अंधविश्वास और धार्मिक भेदभाव में बंटा हुआ था। उन्होंने इन सभी बुराइयों का खुलकर विरोध किया। उनका कहना था कि भगवान को मंदिर या मस्जिद में नहीं, बल्कि अपने दिल में ढूंढो। अगर मन साफ़ है, तो वही सबसे बड़ी पूजा है।
कबीर ने हमेशा प्रेम, सच्चाई और इंसानियत की बात की। वे कहते थे कि ईश्वर एक है और उसका रास्ता भी प्रेम से होकर जाता है। उन्होंने किताबों के ज्ञान से ज़्यादा अपने अनुभव को महत्त्व दिया और लोगों से कहा कि अच्छे काम करो और सबके साथ बराबरी का व्यवहार करो।
उनके दोहे और पद आज भी लोगों को सही रास्ता दिखाते हैं। उनका एक प्रसिद्ध दोहा है।
“मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा।
तेरा तुझको सौंपता, क्या लागे है मेरा॥”
कबीर की रचनाओं का सबसे प्रसिद्ध संग्रह ‘बीजक’ है। उनके कई पद ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब’ में भी शामिल हैं। उनकी भाषा बहुत आसान थी, इसलिए आम लोग भी उनकी बातें आसानी से समझ लेते थे।
“हमन हैं इश्क़ मस्ताना, हमन को होशियारी क्या,
रहें आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या।”
कबीर के विचारों से प्रेरित होकर आगे चलकर कई संत हुए। उनके अनुयायी कबीर पंथी कहलाए, जिनमें हिंदू और मुस्लिम दोनों शामिल थे। यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है कि उन्होंने लोगों को जोड़ने का काम किया, तोड़ने का नहीं।
हर साल ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन कबीर जयंती मनाई जाती है। इस दिन लोग उनके दोहे पढ़ते हैं, उनके जीवन से प्रेरणा लेते हैं और प्रेम, भाईचारे और इंसानियत का संदेश फैलाने का संकल्प लेते हैं।
कबीरदास का जीवन हमें सिखाता है कि धर्म का मतलब सिर्फ़ पूजा-पाठ नहीं, बल्कि अच्छा इंसान बनना है। उनका संदेश आज भी हमें यही याद दिलाता है कि नफ़रत से नहीं, बल्कि मोहब्बत से समाज बेहतर बन सकता है।
हर साल ज्येष्ठ पूर्णिमा के पावन अवसर पर संत कबीरदास की जयंती पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है। इस साल 29 जून 2026 को कबीर जयंती मनाई जा रही है। इस अवसर पर उनके दोहों और वचनों का पाठ किया जाता है तथा प्रेम, समानता और इंसानियत के उनके संदेश को याद किया जाता है।
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