उर्दू, पंजाबी और हिंदी अदब की दुनिया में कुछ ऐसे शायर हुए हैं, जिनकी पहचान किसी एक ज़ुबान तक महदूद नहीं रही। उनकी शायरी ने सरहदों, मज़हबों और भाषाओं की दीवारों को पार करके सीधे इंसान के दिल तक रास्ता बनाया। सरदार पंछी ऐसे ही शायरों में शुमार किए जाते हैं।
सरदार पंछी का असली नाम करनैल सिंह था। उनकी पैदाइश 14 अक्तूबर 1932 को पंजाब के गुज़रांवाला ज़िले (जो अब पाकिस्तान में है) के एक गांव में हुयी। बचपन अपने वतन की मिट्टी में गुज़रा, लेकिन 1947 में मुल्क के बंटवारे ने उनकी ज़िंदगी का रुख़ बदल दिया। उस समय वह महज़ 17 साल के थे। लाखों लोगों की तरह उन्हें भी अपना घर-बार छोड़कर परिवार के साथ भारत आना पड़ा। यह दर्द, बिछड़ने का एहसास और इंसानियत की तलाश उनकी शायरी में बार-बार दिखाई देती है।
करनैल सिंह ने अपने लिए “सरदार पंछी” का तख़ल्लुस चुना। जैसे पंछी एक जगह बंधकर नहीं रहता, वैसे ही उनकी शायरी भी किसी एक ज़ुबान या एक सोच की मोहताज नहीं रही। उन्होंने पंजाबी, उर्दू और हिंदी तीनों भाषाओं में ख़ूब लिखा और हर ज़ुबान में अपनी अलग पहचान बनाई।
सरदार पंछी सिर्फ़ किताबों तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने हिंदी फ़िल्मों के लिए भी गीत लिखे। “एक चादर मैली सी” और “वारिस” जैसी फ़िल्मों के गीतों ने उन्हें फ़िल्मी दुनिया में भी पहचान दिलाई। उनकी लेखनी में शायरी की नज़ाकत और आम आदमी की ज़िंदगी का दर्द, दोनों साथ-साथ चलते हैं।
उनकी अदबी दुनिया बेहद समृद्ध रही। उन्होंने पंजाबी में सात, उर्दू में नौ और हिंदी में दो किताबें लिखीं। उनकी प्रमुख कृतियों में मज़दूर की आवाज़, सांवले सूरज, सूरज के साखे, अधूरे बुत, दर्द का तर्जुमा, टुकड़े-टुकड़े आईना, वंजली दे सुर, शिवरंजनी, नक़्श-ए-क़दम, मेरी नज़र में आप, उजालों के हमसफ़र, गुलिस्तान-ए-अक़ीदत, बोस्तान-ए-अक़ीदत और पंछी दी परवाज़ जैसी किताबें शामिल हैं।
सरदार पंछी की शायरी की सबसे बड़ी ख़ूबी उसकी सादगी है। वह मुश्किल अल्फ़ाज़ के बजाय ऐसे लफ़्ज़ चुनते हैं जो सीधे दिल में उतर जाएं। उनकी ग़ज़लों और नज़्मों में मोहब्बत, इंसानियत, उम्मीद, वक़्त की बेवफ़ाई और ज़िंदगी का फलसफ़ा बड़ी ख़ूबसूरती से झलकता है।
उनका एक मशहूर शेर इंसानियत का ऐसा पैग़ाम देता है, जो आज भी उतना ही मायने रखता है।
“ख़ुदा भी अपनी रहमत से तुम्हारी झोली भर देगा,
तुम अपनी-अपनी रोटी का निवाला बांटते रहना।”
इस एक शेर में पूरी ज़िंदगी का सबक़ छिपा है। वह कहते हैं कि जो इंसान दूसरों के साथ अपनी ख़ुशियां और अपनी रोटी बांटना जानता है, उस पर ख़ुदा की रहमत हमेशा बरसती रहती है।
एक और शेर में वह इल्म और रोशनी की अहमियत यूं बयान करते हैं।
“यहां से पढ़ के जाने वालो, तुम हो जल रहे दीपक,
जहां देखो अंधेरा है, उजाला बांटते रहना।”
यानी तालीम सिर्फ़ नौकरी पाने का ज़रिया नहीं, बल्कि समाज में रोशनी फैलाने की ज़िम्मेदारी भी है। ज़िंदगी की नश्वरता पर भी उनका अंदाज़ बेहद दिलकश है।
“हर पतंगे को पता है ज़िंदगी इक रात की,
शम्अ का ये हुस्न और ये रौशनी इक रात की।”
इस शेर में वह याद दिलाते हैं कि ज़िंदगी बहुत छोटी है, इसलिए इसे मोहब्बत, नेकियों और अच्छे कामों में गुज़ारना चाहिए। सरदार पंछी की शायरी में ख़ुदा की कारीगरी के प्रति हैरत भी दिखाई देती है। वह लिखते हैं।
“वो कौन मुसव्विर ठहरा जिसने है तुझे बनाया,
वो क़लम कहां से आया, ये रंग कहां से आया।”
वहीं एक और शेर में वह वक़्त की सच्चाई को बेहद ख़ूबसूरती से बयान करते हैं।
“हम न होंगे, तुम न होगे, याद इक तड़पाएगी,
रास्ते में सिर्फ़ गर्द-ए-कारवां रह जाएगी।”
सरदार पंछी की शायरी हमें यह एहसास दिलाती है कि इंसान चला जाता है, लेकिन उसके अल्फ़ाज़ और उसके अच्छे काम हमेशा ज़िंदा रहते हैं।
आज भी सरदार पंछी का नाम उन चुनिंदा शायरों में लिया जाता है जिन्होंने तीन भाषाओं में लिखकर अदब को समृद्ध बनाया। उनकी रचनाएं सिर्फ़ पढ़ी नहीं जातीं, बल्कि महसूस की जाती हैं। मोहब्बत, इंसानियत, भाईचारा और उम्मीद—यही उनकी शायरी की असली पहचान है। शायद यही वजह है कि उनके अशआर आज भी नई पीढ़ी के दिलों में उसी ताज़गी के साथ जगह बनाते हैं, जैसे बरसों पहले बनाते थे।
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