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From Myths to Science: गौहर रज़ा की Book Launch में वैज्ञानिक सोच पर गहरी बातचीत

ज्ञान, जिज्ञासा और इंसानी सोच की ताक़त का जश्न मनाती एक यादगार शाम में गौहर रज़ा की किताब “From Myths to Science: The Evolving Story of the Universe” का विमोचन हुआ। इस ख़ास मौके पर जावेद अख़्तर और प्रोफे़सर पुरुषोत्तम अग्रवाल भी मौजूद थे। ये सिर्फ़ एक किताब का लोकार्पण नहीं था, बल्कि इंसान की उस लंबी यात्रा पर बातचीत थी, जिसमें वो मिथकों से निकलकर विज्ञान तक पहुंचा है।

तीनों वक्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इंसान हमेशा से ब्रह्मांड, जीवन और अपने अस्तित्व को समझने की कोशिश करता आया है। पहले यह कोशिश मिथकों के ज़रिये हुई और आज विज्ञान के माध्यम से हो रही है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि अब सवाल पूछने और जवाब ढूंढने का तरीका बदल गया है।

जावेद अख़्तर ने कहा कि प्राचीन सभ्यताओं के लिए मिथक ज़रूरी थे। वे उस दौर की समझ थे, जिनके सहारे इंसान ने प्रकृति और जीवन के रहस्यों को समझने की कोशिश की। लेकिन विज्ञान भी उसी जिज्ञासा की अगली कड़ी है फ़र्क़ ये है कि विज्ञान तर्क और प्रमाण के आधार पर आगे बढ़ता है।

From Myths to Science: The Evolving Story of the Universe (Photo: DNN24)

प्रोफे़सर पुरुषोत्तम अग्रवाल ने भारतीय परंपरा की ओर इशारा करते हुए कहा कि सवाल पूछना, तर्क करना और संवाद करना हमेशा से हमारी सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा रहा है। भारत की बौद्धिक परंपरा में प्रश्न करने को कभी गुनाह नहीं माना गया।

गौहर रज़ा ने DNN24 से बात करते हुए कहा कि, समाज में आज सबसे बड़ा सवाल ये है कि विज्ञान क्या है, धर्म क्या है और इन दोनों का आपस में रिश्ता क्या है। इसी उलझन को समझाने की कोशिश करती है गौहर रज़ा की चर्चित किताब “मिथकों से विज्ञान तक”। यह किताब न सिर्फ हिंदी, बल्कि गुजराती, मराठी, कन्नड़, पंजाबी, उर्दू, मलयालम जैसी कई भाषाओं में प्रकाशित हो रही है, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इसे पढ़ और समझ सकें।

From Myths to Science किताब लिखने का विचार कैसे आया?

गौहर रज़ा बताते हैं कि इस किताब को लिखने का ख़्याल समाज में फैले उस भ्रम से आया, जिसमें लोग विज्ञान और धर्म को एक ही तराज़ू में तौलने लगते हैं। उनका कहना है कि तकरीबन हर धर्म यह दावा करता है कि उसकी किताबों में सारी जानकारी मौजूद है और वही सबसे ज़्यादा “वैज्ञानिक” है। लेकिन सच यह है कि विज्ञान और ज्ञान के बीच एक साफ़ रेखा खींचना बहुत ज़रूरी है।

वो कहते हैं कि विज्ञान वो है, जो सवाल पूछता है, जांच करता है और सबूत के आधार पर नतीजे तक पहुंचता है। वहीं ज्ञान कई रूपों में हो सकता है धार्मिक, साहित्यिक या दार्शनिक। कोई किताब सुंदर हो सकती है, प्रेरणा दे सकती है, लेकिन यह मान लेना कि किसी एक या दस किताबों में सारा ज्ञान मौजूद है, सही नहीं है।

Gauhar Raza with DNN24 Journalist Saboor Ali  (Photo: DNN24)

कवि, फ़िल्ममेकर और वैज्ञानिक—तीनों भूमिकाओं का असर

जब उनसे पूछा गया कि एक कवि, फ़िल्ममेकर और वैज्ञानिक होने का उनकी किताब पर क्या असर पड़ा, तो उन्होंने कहा कि इस किताब को लिखने की असली वजह लोगों के सवाल हैं। वो सवाल, जो समाज उनसे करता है और उनके अपने मन में उठते हैं।

उन्होंने बताया कि जन विज्ञान आंदोलन, रिश्तेदारों से होने वाली बातचीत और कुंभ मेले में पिछले 30 सालों से किए जा रहे सर्वे भी इस किताब की नींव बने। कुंभ जैसे बड़े आयोजन में लोगों से बात करते हुए जो सवाल सामने आए, उन्होंने उन्हें इस विषय पर सोचने के लिए मजबूर किया।

Myths क्या होते हैं?

गौहर रज़ा आसान शब्दों में बताते हैं कि मिथ पुराने ज़माने की व्याख्या हैं। जब इंसान ने पहली बार सवाल पूछे, तब उसके पास जितनी जानकारी थी, उसी के आधार पर उसने जवाब गढ़े। वे जवाब सही भी हो सकते थे और गलत भी।

समस्या तब शुरू हुई, जब धर्मों ने इन जवाबों को जमा कर दिया और समय के साथ सवाल पूछने पर रोक लगा दी गई। जब किसी विचार को पीढ़ी-दर-पीढ़ी बिना सवाल किए सच मान लिया जाता है, तो वही मिथ बन जाता है।

आज के दौर में मिथक और अंधविश्वास

आज के समय में सिर्फ़ मिथक ही नहीं, बल्कि अंधविश्वास भी बहुत फैला हुआ है। गौहर रज़ा मानते हैं कि इसे दूर करना सिर्फ़ सरकार या वैज्ञानिकों की ज़िम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के हर जागरूक नागरिक की ज़िम्मेदारी है।

Gauhar Raza explores the boundary of science and faith in his book “From Myths to Science”

गौहर रज़ा कहते हैं कि उन्हें युवाओं से बहुत उम्मीद है। वो चाहते हैं कि नई पीढ़ी सपने देखे, सवाल पूछे और जवाब ढूंढने की कोशिश करे। उनका मानना है कि युवाओं को पुराने ज्ञान की तरफ लौटने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उन्हें आगे बढ़ने और नई सोच अपनाने की आज़ादी मिलनी चाहिए।

कार्यक्रम के अंत में जावेद अख़्तर ने अपनी मशहूर नज़्म “वक़्त” सुनाई। उनकी आवाज़ और अल्फ़ाज़ों ने समय, बदलाव और इंसानी जज़्बे की ताक़त को बखूबी बयान किया। 

ये भी पढ़ें: मशहूर इतिहासकार प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब के साथ एक यादगार मुलाक़ात

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