श्रीनगर में क्रिसमस (Christmas) की तैयारियां पूरे जोश के साथ चल रही हैं। ठंड के बीच यहां की गलियों में छोटी-छोटी वर्कशॉप रोशनी और रंगों से जगमग हो रही है। कश्मीरी पेपर माशी कारीगर देश और विदेशों से आने वाले क्रिसमस (Christmas) ऑर्डर को पूरे करने में दिन-रात जुटे हुए हैं। इन वर्कशॉप में हाथ से बनाई जा रही घंटियां, हैंगिंग डेकोर, सांता की मूर्तियां और रंग-बिरंगी क्रिसमस (Christmas) बॉल्स न सिर्फ़ क्रिसमस की खुशी बढ़ाती हैं, बल्कि कश्मीर की सदियों पुरानी कला को भी ज़िंदा रखती हैं।
पेपर मेशी: कश्मीर की पुरानी पहचान
पेपर मेशी कश्मीर की सबसे पुरानी और ख़ास कलाओं में से एक है। ये सिर्फ़ सजावट का सामान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक विरासत है। जैसे ही क्रिसमस (Christmas) का फेस्टिवल आता है, इसकी मांग बढ़ जाती है। बड़े-बड़े ऑर्डर पहले ही आ जाते हैं, इसलिए कारीगर महीनों पहले से तैयारी शुरू कर देते हैं। कई कारीगरों के लिए यही मौसम सालभर की सबसे बड़ी उम्मीद लेकर आता है, क्योंकि इसी समय उनकी कमाई सबसे ज़्यादा होती है।
30 साल का सफ़र: ज़फ़्फ़र हुसैन ख़ान की कहानी
श्रीनगर के आलमगारी बाज़ार के रहने वाले ज़फ़्फ़र हुसैन ख़ान पिछले 25–30 सालों से पेपर मेशी के काम से जुड़े हुए हैं। उनके लिए ये काम सिर्फ़ रोज़गार नहीं, बल्कि उनकी पहचान है। ज़फ़्फ़र हुसैन ख़ान कहते हैं कि पिछले करीब 20 सालों से क्रिसमस (Christmas) से जुड़े सामान की मांग लगातार बढ़ी है। उनके बनाए आइटम जर्मनी, ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका जैसे देशों तक भेजे जाते हैं, साथ ही भारत के कई शहरों में भी इनकी सप्लाई होती है।

महीनों की मेहनत, समय की चुनौती
ज़फ़्फ़र हुसैन ख़ान बताते हैं कि आमतौर पर ऑर्डर दो से चार महीने पहले मिलने शुरू हो जाते हैं। इसके बाद सबसे बड़ी चुनौती होती है वक़्त पर काम पूरा करना। अगर माल तय वक़्त पर नहीं पहुंचा, तो उसकी कोई वैल्यू नहीं रहती और ऑर्डर कैंसिल भी हो सकता है। ख़ासकर क्रिसमस (Christmas) के लिए बॉल्स, बेल्स, बर्ड्स, हार्ट शेप, एलिफेंट और सांता जैसे आइटम्स बनाए जाते हैं। अगर 10,000 बॉल्स का ऑर्डर हो, तो उसे पूरा करने में 5 से 6 महीने तक का समय लग जाता है। इसलिए उनका काम आमतौर पर अप्रैल से ही शुरू हो जाता है।
बढ़ती लागत, घटती मांग
ज़फ़्फ़र कहते हैं कि इस साल मार्केट थोड़ा डाउन रहा। हालात की वजह से काम पर असर पड़ा, लेकिन इसके बावजूद ज़फ़्फ़र हुसैन ख़ान और उनकी टीम ने करीब 20,000 बॉल्स का ऑर्डर पूरा किया। काम का रेट डिज़ाइन और मेहनत पर निर्भर करता है कुछ आइटम 50 रुपये के होते हैं, तो कुछ 100 या 200 रुपये तक के भी। कच्चा माल महंगा हो है और पेपर माशी का काम बेहद मेहनत वाला है।
ज़फ़्फ़र कहते हैं कि वो पिछले 30 सालों से इस काम में हैं, लेकिन आज भी हर दिन कुछ नया सीखते हैं। इस हुनर में सीखने की कोई सीमा नहीं है। पहले सिर्फ़ बॉल और बेल ही बनाए जाते थे, लेकिन अब स्टार, एलिफेंट और नए-नए डिज़ाइन भी बनने लगे हैं। ये नए डिज़ाइन ख़ासतौर पर विदेशों में ज़्यादा पसंद किए जाते हैं।

कई परिवारों की रोज़ी-रोटी
पेपर मेशी का काम सिर्फ़ एक इंसान तक सीमित नहीं है। ज़फ़्फ़र का कारखाना उनके घर पर ही है। उनके बड़े भाई उनके उस्ताद हैं और कई कारीगर इसी काम पर निर्भर हैं। लोकल कश्मीरी भी शादी और गिफ़्ट के लिए यहां से सामान खरीदते हैं। अगर ये काम रुक जाए, तो कई परिवारों के सामने रोज़ी-रोटी का संकट खड़ा हो सकता है।
ज़फ़्फ़र का मानना है कि इस पारंपरिक क्राफ्ट को बचाने और आगे बढ़ाने के लिए सरकार का सहयोग बेहद ज़रूरी है। आज की नई पीढ़ी इस काम की ओर कम आ रही है, क्योंकि डिमांड पहले जैसी नहीं रही। पहले लोग पढ़ाई के साथ-साथ ये हुनर भी सीखते थे, लेकिन अब ये परंपरा धीरे-धीरे ख़त्म होती जा रही है। अगर समय रहते इसे संभाला नहीं गया, तो ये ख़ूबसूरत कला सिर्फ़ किताबों और यादों में रह जाएगी।
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