दिल्ली सिर्फ़ एक शहर नहीं, बल्कि सदियों से धड़कती एक ज़िंदा कहानी है। ये वो शहर है जिसने कई बार उजड़ने का दर्द भी देखा और हर बार खुद को नए सिरे से संवार कर खड़ा होना भी सीखा। यहां की गलियों, हवाओं और मिट्टी में इतिहास की गूंज बसी है। भीड़, ट्रैफिक और शोर के बीच दिल्ली में आज भी कुछ ऐसी इमारतें मौजूद हैं, जो ख़ामोशी से खड़ी होकर अपने दौर की कहानियां बयान करती हैं। उनके हर पत्थर में वक़्त की एक दास्तान छुपी है। ऐसी ही एक ऐतिहासिक जगह है Khair-ul-Manazil।
Khair-ul-Manazil: मुग़ल दौर में ले जाती एक झलक
Khair-ul-Manazil दिल्ली के पुराना किला के सामने आज भी खड़ा है। वहां पहुंचते ही ऐसा महसूस होता है जैसे वक़्त यहां ठहर सा गया हो और आप मुग़ल पीरियड में जा रहे हों। Khair-ul-Manazil न सिर्फ़ एक इमारत है, बल्कि दिल्ली की उस समृद्ध विरासत और इतिहास की कहानी है, जो सदियों पहले यहां सुनी गई थी।

Khair-ul-Manazil को 1561 में माहम अंगा ने बनवाया था। बता दें कि माहम अंगा मुग़ल बादशाह अकबर की धाय मां और उनके दरबार की एक बहुत ही पावरफ़ुल महिला थी। सोचिए, उस वक़्त एक महिला के पास इतनी ताक़त और समझ थी कि वो अपने काम और सोच से इतिहास बना सकती थी। इसलिए Khair-ul-Manazil सिर्फ़ नमाज़ पढ़ने की जगह नहीं है, बल्कि उनकी सोच, कला और ताक़त का प्रतीक भी है।
इंडो-इस्लामिक आर्किटेक्चर की बेमिसाल मिसाल
Khair-ul-Manazil मस्जिद लाल बलुआ पत्थर से बनी है और इसमें एक बड़ा आंगन, ऊंचे मेहराबदार दरवाज़े और नमाज़ पढ़ने का हॉल है। दीवारों पर नक़्क़ाशी और रंग-बिरंगी टाइलें अभी भी हमें उस वक्त की बारीक कला और इंडो इस्लामिक आर्किटेक्चर की ख़ूबसूरती दिखाती हैं। मस्जिद के अंदर और बाहर हर चीज़ बड़ी सावधानी और प्यार से बनाई गई थी।
हालांकि समय के साथ Khair-ul-Manazil के कुछ हिस्से जर्जर हो गए हैं, लेकिन इसे देखते हुए भी हमें इतिहास की गूंज महसूस होती है। Khair-ul-Manazil मस्जिद हमें याद दिलाती है कि हमारे शहर दिल्ली में कितनी गहरी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत है, और कैसे महिलाएं भी इतिहास बनाने में अहम भूमिका निभाती थी। अगर आप भी इस मस्जिद में आएंगे, आप सिर्फ़ एक इमारत नहीं देख रहे होंगे, बल्कि उस दौर की कहानियां, उस समय के लोग और उनकी ज़िन्दगी भी महसूस भी करेंगे।

इबादत से सियासत तक: कहानी का दूसरा पहलू
अभी आपने पढ़ा माहम अनगा की बनाई हुई मस्जिद और मदरसा, लेकिन अब उसी माहम अनगा की कहानी के उस दर्दनाक हिस्से की पढेंगे, जिसने उनके बेटे अधम ख़ान और ख़ुद उनकी ज़िंदगी को ख़त्म कर दी। जहां पहली कहानी इबादत और इल्म की थी, ये कहानी सज़ा और सियासत की है। अधम ख़ान का मकबरा दिल्ली के महरौली में बना हुआ है, जो कुतुबमीनार से काफ़ी नज़दीक है। ये सिर्फ़ एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि मुग़ल दरबार की सबसे दर्दनाक कहानी का गवाह भी है। यहां वो दास्तान दफ़्न है, जहां रिश्तों और सत्ता की लड़ाई ने एक बेटे और मां दोनों की ज़िंदगी को ख़त्म कर दिया था।
अंगा और कोका: मुग़ल दरबार के रिश्ते
मुगल सल्तनत के वक़्त फॉस्टर मदर को अंगा कहा जाता था और उनके बेटे को कोका। फेमस राइटर शाज़ी ज़मा की किताब में इस बात का ज़िक्र मिलता है कि अधम ख़ान, बादशाह अकबर की रज़ाई मां माहम अनगा के बेटे थे। अकबर को बचपन में माहम अनगा ने पाला था, इसलिए अधम ख़ान उनका दूध-शरीक भाई था।
बादशाह सलामत के दरबार में मुनीम ख़ान वकील के पद थे। जब मुनीम ख़ान का ओहदा शम्सुद्दीन मोहम्मद अतका ख़ान को दिया तो इस घटना का बुरा मुनीम ख़ान और माहम अनगा दोनों को लगा। इस घटना के बाद मुनीम ख़ान माहम अनगा के बेटे अधम ख़ान को उकसाने लगे। और अकबर के दरबार में बढ़ती शम्सुद्दीन अतका ख़ान की इज़्ज़त से अधम ख़ान जलने लगे।

दरबार में खून: वज़ीर की हत्या
अधम ख़ान और उनके लोग आगरा का क़िला के दीवानखाने में हंगामा करते हुए आ गए जहां वकीले सल्तनत शम्सुद्दीन मोहम्मद अतका ख़ान काम कर रहे थे। अधम ख़ान के आदेश पर उनके सिपाहियों ने तलवार को शम्सुद्दीन मोहम्मद अतका ख़ान के सीने के आर-पार कर दिया। अतका ख़ान ज़ख़्मी हालत में वो दीवानखाने के दरवाज़े की तरफ भागे तो अधम ख़ान के दूसरे आदमी ने तलवार से वार कर के उन्हें मौत के घाट उतार दिया। शम्सुद्दीन अतका ख़ान अकबर के सबसे भरोसेमंद वज़ीर थे, लेकिन उसी दरबार में उनका खून बहा। जब बादशाह अकबर तक ये ख़बर पहुंची, तो वो ग़ुस्से में आग बबूला हो गए।
अकबर का सामना: रिश्ते और इंसाफ़ आमने-सामने
दीवानख़ाने में शोर की आवाज़ से बादशाह अकबर बाहर आए निकले तो उन्होंने ख़ादिम यानि सेवक रफ़ीक़ से पूछा कि ये किसकी लाश है तब रफ़ीक़ ने जवाब दिया, “मेरे बादशाह ये आपके अतका है।” बादशाह सलामत ने पूछा “किसने मारा?” रफ़ीक़ ने कहा “अधम ख़ान ने”। जब बादशाह अकबर ने अधम ख़ान से पूछा कि तूने हमारे अतका को क्यों मारा ? तो अधम ख़ान ने कहा कि वो दगाबाज़ था। बादशाह सलामत ने अधम ख़ान के चेहरे की तरफ़ देखा।
तो उन्हें अधम ख़ान की मां माहम अनगा की याद आई। अकबर वो दिन कभी भूल नहीं सकते थे जब हुमायूं बादशाह के भाई मिर्जा कामरान ने नन्हे अकबर को तोप के गोलों के सामने कर दिया था और माहम अनगा ढाल बन कर सामने बैठ गई थीं। अब बादशाह सलामत की नज़र के सामने उन्हें दूध पिलाने वाली जीजी अंगा के शौहर शम्सुद्दीन मोहम्मद अतका ख़ान की लाश पड़ी थी, और सामने ही वो क़ातिल खड़ा था जिसकी मां माहम अनगा ने उन्हें पाला था।
पुरानी गलतियां और अकबर की यादें
इसी दौरान बादशाह अकबर को अधम ख़ान की पुरानी गलतियां याद आई। मालवा फ़तह के बाद उसने जीत का सामान अपने पास रख लिया था और सिर्फ़ कुछ हाथी भेजे थे। इससे नाराज़ होकर अकबर खुद मालवा पहुंचे थे। उनके साथ माहम अनगा भी मौजूद थी। तब अधम ख़ान ने सारा सामान और हिसाब अकबर के सामने पेश किया था।
जब शाही क़ाफ़िला आगरा की तरफ लौट रहा था तो बादशाह सलामत को पता चल गया कि अधम ख़ान ने फिर एक चालाकी की है। हरम की दो ख़ूबसूरत लड़कियों को छुपा लिया था, जिन्हें बाद में माहम अनगा ने मार डाला। जब ये राज खुला तो फौरन लश्कर रोक कर लोग खामोश कर दिए ताकि हमेशा के लिए अधम ख़ान का नाम सामने ना आए। ये सभी घटनाएं बादशाह अकबर को याद आ रही थी।

सज़ा का फैसला: अकबर का इंसाफ़
उसी दौरान जब अकबर और अधम ख़ान आमने सामने थे तब दोनों के बीच लड़ाई हुई। और बादशाह अकबर ने सैनिकों को आदेश दिया कि अधम ख़ान के हाथ पैर बांध दिए जाए। बादशाह सलामत के हुक़्म से अधम ख़ान को छत से नीचे फेंक दिया गया। पहली बार में वो नहीं मरे तो दूसरी बार सर के बल फेंका गया। इस बार उनकी गर्दन टूट गई और उनकी रूह फानी हो गई। इसके बाद बादशाह सलामत ने माहम अनगा के पास जाकर कहा, “मामा’!
अधम ख़ान ने हमारे अतका को मार डाला। हमने उसका बदला लिया है।” “ठीक किया,” माहम अनगा ने इतना ही कहा। ये वही लम्हा था जब अकबर ने रिश्ते से ज़्यादा इन्साफ को चुना। बेटे की मौत की ख़बर सुनकर माहम अनगा टूट गईं। अधम ख़ान के चालीसवें का खाना खिलाकर कुछ ही दिनों बाद वो भी इस दुनिया से रुख़सत हो गई। अकबर ने दोनों के लिए ये मक़बरा बनवाया।
लॉर्ड कर्ज़न और बहाली की कोशिश
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ सन् 1830 में एक अंग्रेज़ अफ़सर ने मक़बरे को अपना रहने की जगह बनाई और कब्रें हटा दीं। ये एक रेस्ट हाउस, पुलिस स्टेशन और पोस्ट ऑफ़िस के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता रहा। ये भारत के वायसराय और गवर्नर जनरल लॉर्ड कर्ज़न थे जिन्होंने मक़बरे को बहाल किया। उनकी कोशिशों से अधम ख़ान के अवशेष वापस उस जगह पर लाए गए, लेकिन माहम अंगा के अवशेष कभी नहीं मिल सके। आज यहां सिर्फ़ अधम ख़ान की कब्र मौजूद है। वक़्त के साथ – साथ ज़र्ज़र होते इस मकबरे को संजो कर रखने की ज़रूरत है। जहां पर इतिहास को बनाने वाले दफ़न है।
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