Patiala Shahi Jutti पहनने से न सिर्फ आपके लुक में इज़ाफा होता है, बल्कि ये पंजाब के इतिहास, शाही ठाठ और पारंपरिक कारीगरी की पहचान को भी दिखाता है। पटियाला अपने शाही अंदाज़ और पुरानी विरासत के लिए मशहूर है। क़िला मुबारक, शीश महल, गुरुद्वारा दुख निवारण साहिब जैसे ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल, फुलकारी कढ़ाई, पटियाला शाही सलवार, पगड़ी और इन्हीं सबके साथ Patiala Shahi Jutti ये सब मिलकर इस शहर की अलग पहचान बनाते हैं। Patiala Shahi Jutti को पहनना कभी रुतबे और शान की निशानी माना जाता था। आज भी देश-विदेश में इसकी ख़ूबसूरती और कारीगरी की तारीफ़ होती है।
शाही दरबारों से जुड़ी शुरुआत
माना जाता है कि Patiala Shahi Jutti की शुरुआत पटियाला के शाही दरबारों से हुई। उस दौर में राजा-महाराजा और शाही परिवार के लोग इसे पहनना अपनी शान समझते थे। इसी परंपरा को समझने के लिए जब हम पटियाला के जूता बाज़ार पहुंचे, तो देखा कि यहां आज भी सैकड़ों दुकानें और कारीगर मौजूद हैं, जो अपने पुश्तैनी काम को ज़िंदा रखने की कोशिश कर रहे हैं।

इतिहास पर नज़र डालें तो पता चलता है कि इस काम से जुड़े कई कारीगर परिवार पीढ़ियों से यही काम करते आ रहे हैं। इन कारीगरों के दादा-परदादा राजस्थान की जिनागर (जिनागढ़) बिरादरी से थे। पटियाला के महाराजा भूपिंदर सिंह इन्हें राजस्थान से पटियाला लेकर आए थे, ताकि ये घोड़ों के लिए चमड़े की काठी यानी सैंडल बना सकें। शुरुआत में ये कारीगर सिर्फ़ चमड़े की काठियां बनाते थे, लेकिन बाद में उन्होंने शाही परिवार के लिए चमड़े की जूतियां भी बनानी शुरू कर दीं। धीरे-धीरे यही जूतियां “Patiala Shahi Jutti” के नाम से मशहूर हो गई, जिनकी पहचान आज तक बनी हुई है।
जूती बनाने की पारंपरिक प्रक्रिया
आज भी Patiala Shahi Jutti ज़्यादातर हाथ से और पारंपरिक तरीकों से बनाई जाती हैं। चाहे जूती चमड़े की हो, कपड़े की, सिल्क, वेलवेट या किसी नए मटेरियल से बनी हो, बनाने का प्रोसेस लगभग वही रहता है। सबसे पहले पैर के नाप के हिसाब से जूती का पैटर्न तैयार किया जाता है। फिर ऊपर का हिस्सा काटकर उस पर सजावट की जाती है। इस सजावट में ज़री का काम, फुलकारी डिज़ाइन, शीशे का काम, मोती, सितारे, प्रिंटिंग या हाथ से की गई पेंटिंग शामिल होती है।
यही सब मिलकर जूती को शाही लुक देता है। इसके बाद ऊपर के हिस्से को मोटे चमड़े या रबर के तले के साथ सिलाई या गोंद की मदद से जोड़ा जाता है। जूती का आगे की ओर हल्का मुड़ा हुआ नोकदार सिरा ही इसकी सबसे बड़ी पहचान है। एक जोड़ी जूती बनने में कई दिन और कभी-कभी हफ़्तों भी लग जाते हैं।

रोज़गार और कारीगरों पर असर
Patiala Shahi Jutti का धीरे-धीरे कम होना सिर्फ़ एक कला का नुकसान नहीं है, बल्कि सैकड़ों परिवारों के रोज़गार का संकट भी है। कई कारीगर परिवार पूरी तरह इसी काम पर निर्भर हैं। लेकिन सरकारी मदद, ट्रेनिंग और सही बाज़ार न मिलने की वजह से कई लोग अपना पुश्तैनी काम छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। इस शाही विरासत को बचाने के लिए सरकार और संस्थाओं को आगे आना होगा। कारीगरों के लिए क्राफ़्ट क्लस्टर बनाना, नए डिज़ाइन पर काम करने में मदद देना, ऑनलाइन बाज़ारों से जोड़ना और Patiala Shahi Jutti को जीआई टैग दिलाने जैसे कदम बेहद ज़रूरी हैं। साथ ही, लोगों में हाथ से बनी चीज़ों के प्रति जागरूकता बढ़ाना भी उतना ही अहम है।
मॉडर्न डिज़ाइन से नई उम्मीद
अगर पारंपरिक कारीगरी को आज के मॉडर्न डिज़ाइन, टिकाऊ मटेरियल और बेहतर मार्केटिंग के साथ जोड़ा जाए, तो Patiala Shahi Jutti को फिर से नई पहचान मिल सकती है। फ़ैशन डिज़ाइनर, स्टार्टअप्स और सांस्कृतिक संस्थाएं इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। आज के दौर में Patiala Shahi Jutti को मशीन से बनी सस्ती फुटवियर से कड़ी टक्कर मिल रही है। ये जूतियां कम दाम में और कई डिज़ाइन में आसानी से मिल जाती हैं।

इसी वजह से Patiala Shahi Jutti की मांग और बिक्री में भारी गिरावट आई है। इसका असर ये है कि कारीगरों की तादाद घट रही है और नई पीढ़ी इस पेशे में दिलचस्पी कम ले रही है। अगर हालात ऐसे ही रहे, तो ये अनमोल विरासत धीरे-धीरे ख़त्म हो सकती है। आज ज़रूरूत है कि हम सब मिलकर इस कला को सहेजने की कोशिश करें।
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