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सुदर्शन फ़ाकिर: कम लिखा लेकिन जो भी लिखा क्या ख़ूब लिखा

उर्दू शायरी की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो ढोल नहीं पीटते, मगर दिल पर दस्तक दे जाते हैं। सुदर्शन फ़ाकिर भी उन्हीं में से एक थे। न उन्होंने बहुत लिखा, न बहुत बोले लेकिन जो लिखा, वो आज भी लोगों के ज़ेहन में ज़िंदा है। उनकी शायरी में ज़िंदगी की तल्ख़ी भी है, मोहब्बत की नरमी भी और इंसान के अंदर छिपा सन्नाटा भी।

सुदर्शन फ़ाकिर की पैदाइश 1934 में पंजाब के फ़िरोज़पुर ज़िले में हुआ। उनका असली नाम सुदर्शन कामरा था। वे सिख परिवार से थे, लेकिन उर्दू शायरी के ऐसे दीवाने कि उर्दू को सिर्फ़ ज़बान नहीं, जज़्बात मानते थे। उस दौर में, जब उर्दू को मज़हब से जोड़कर देखा जाता था, फ़ाकिर साहब ने ये साबित किया कि उर्दू दिल की ज़बान है किसी मज़हब की मोहताज नहीं।

बचपन, पढ़ाई और शायरी की पहली दस्तक

फ़िरोज़पुर की गलियों में खेलते हुए उनका बचपन बीता। किताबें पढ़ना, नाटक देखना, शेर सुनना। ये सब उन्हें शुरू से पसंद था। घर वाले चाहते थे कि पढ़-लिखकर कोई ढंग की नौकरी करें, लेकिन फ़ाकिर साहब का दिल कहीं और अटका हुआ था।

शुरुआती पढ़ाई फ़िरोज़पुर में हुई। बाद में जालंधर आए, जहां डीएवी कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। कुछ वक़्त दोआबा कॉलेज में पढ़ाया भी। लेकिन दिल तालीम से ज़्यादा तख़य्युल में लगता था। शायरी उनके लिए शौक़ नहीं, ज़रुरत थी जैसे सांस लेना।

इसी दौरान उन्हें आकाशवाणी, जालंधर में काम मिल गया। रेडियो स्टेशन उनके लिए सिर्फ़ नौकरी नहीं था, बल्कि एक ऐसी जगह थी जहां उनकी शायरी सांस ले सकती थी। वहां बैठे-बैठे वे लोगों को देखते, बातें सुनते और ज़िंदगी को महसूस करते। शायद इसी    वजह से उनकी शायरी बनावटी नहीं, बिल्कुल असली लगती है।

बेगम अख़्तर और वो दिन जिसने क़िस्मत बदल दी

फ़ाकिर साहब की ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब मशहूर गायिका बेगम अख़्तर आकाशवाणी जालंधर आईं। स्टेशन के डायरेक्टर ने फ़ाकिर साहब से कहा— “होटल स्काइलार्क जाओ, बेगम साहिबा को लेकर आओ।”

होटल में मुलाक़ात हुई। बेगम अख़्तर ने पूछा—रेडियो स्टेशन में क्या करते हो?”

फ़ाकिर साहब थोड़े झेंपे, बोले— “कभी-कभार शायरी कर लेता हूं। बेगम साहिबा मुस्कुराईं— “तो कुछ सुनाओ।”

फ़ाकिर साहब ने झिझकते हुए ग़ज़ल का एक मकता सुनाया—

कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया
और कुछ तल्ख़ी-ए-हालात ने दिल तोड़ दिया

बेगम अख़्तर चुप हो गईं। फिर बोलीं— “पूरी ग़ज़ल लिखो।”

काग़ज़ नहीं था, तो होटल के छपे हुए काग़ज़ पर ही फ़ाकिर साहब ने पूरी ग़ज़ल लिख दी।

रेडियो पर गूंजा फ़ाकिर का नाम

जब रेडियो से बेगम अख़्तर का कार्यक्रम शुरू हुआ, तो उन्होंने माइक पर कहा— अब मैं सुदर्शन फ़ाकिर की ग़ज़ल पेश कर रही हूं।

ड्यूटी रूम में बैठे फ़ाकिर साहब हैरान रह गए। बेगम साहिबा ने उस ग़ज़ल को जिस अंदाज़ में गाया, उसने पूरे स्टेशन को ख़ामोश कर दिया। कार्यक्रम के बाद लोग मुबारकबाद देने लगे।

बेगम अख़्तर बाहर आईं, फ़ाकिर साहब के कंधे पर हाथ रखा और कहा— तुम यहां क्या कर रहे हो? बंबई चलो। वहां तुम्हारी शायरी को सही जगह मिलेगी।

बस, यही वो लम्हा था जिसने फ़ाकिर साहब को उड़ान दी।

मुंबई: सपनों का शहर, संघर्ष और पहली बड़ी जीत

फ़ाकिर साहब ने रेडियो की नौकरी छोड़ दी और मुंबई पहुंच गए। नया शहर, नई दुनिया, नए चेहरे। लेकिन शायरी वही सच्ची और गहरी। मुंबई में उन्हें फ़िल्म दूरियां मिली। पहला ही गीत लिखा—

“मेरे घर आना ज़िंदगी…”

भूपेंद्र की आवाज़ में ये गीत दिलों तक पहुंच गया। 1980 में इस गीत को फ़िल्म वर्ल्ड अवॉर्ड मिला। ये अपने आप में बड़ी बात थी फ़ाकिर साहब पहले ऐसे गीतकार बने जिन्हें पहले ही गीत पर बड़ा अवॉर्ड मिला। इसके बाद फ़िल्मफेयर अवॉर्ड भी आया। सिनेमा जगत में उनका नाम होने लगा।

‘वो काग़ज़ की कश्ती’ और जगजीत सिंह की दोस्ती

जगजीत सिंह से दोस्ती ने फ़ाकिर की शायरी को नया आसमान दिया। “वो काग़ज़ की कश्ती” ये सिर्फ़ गीत नहीं, टूटे हुए दिलों की कहानी बन गया।

जगजीत और फ़ाकिर की महफ़िलें मशहूर थीं। घंटों शायरी पर बहस होती, हर मिसरे को तराशा जाता। 

“सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं
जिस को देखा ही नहीं उस को ख़ुदा कहते हैं”


“मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है
क्या मिरे हक़ में फ़ैसला देगा”


“इश्क़ है इश्क़ ये मज़ाक़ नहीं
चंद लम्हों में फ़ैसला न करो”

आख़िरी सफ़र और ज़िंदा विरासत

19 फ़रवरी 2008 को जालंधर में सुदर्शन फ़ाकिर इस दुनिया से रुख़्सत हो गए। उम्र 74 साल थी। लेकिन उनकी शायरी आज भी ज़िंदा है गीतों में, यादों में, और दिलों में। सुदर्शन फ़ाकिर ने कम लिखा, मगर जो लिखा—वह अमर हो गया। यही असली फ़कीरी है।

ये भी पढ़ें: अब्दुल मन्नान समदी: रूहानी एहसास और अदबी फ़िक्र का संगम

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