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नज़ीर की मस्ताना आवामी होली और ख़ुसरो की रूहानी इश्क़-ए-हक़ीक़ी होली

जब फ़ागुन की हवा चलती है और रंगों की खुशबू फ़िज़ा में घुल जाती है, तब होली सिर्फ़ एक त्योहार नहीं रहता है वो एक एहसास बन जाता है। यही एहसास हमें नज़ीर अकबराबादी और अमीर ख़ुसरो की शायरी में पूरी शिद्दत के साथ मिलता है। एक तरफ़ नज़ीर की ज़मीनी, आवामी और मस्ताना होली है, तो दूसरी तरफ़ ख़ुसरो की सूफ़ियाना, रूहानी और इश्क़-ए-हक़ीक़ी से भरी होली।

नज़ीर की होली: रंगों की रौनक़ और ज़िंदगी की गूंज

नज़ीर अकबराबादी की ये पंक्तियां होली के पूरे मंज़र को आंखों के सामने ज़िंदा कर देती हैं। ‘ढोल-ताशों की थाप, दफ़ की खनक, पिचकारी की फुहार, और रंग में भीगे चेहरे, नज़ीर ने होली को सिर्फ़ देखा नहीं, उसे जिया है।’

नज़ीर की ख़ासियत ये थी कि वे दरबारी शायर नहीं थे, बल्कि अवाम के शायर थे। उनकी शायरी में गली-कूचों की रौनक़, बाज़ार की चहल-पहल और आम इंसान की धड़कन सुनाई देती है। होली पर लिखते हुए वे महबूब, सखियों, गुलरू चेहरों और मस्ती से भरी महफ़िलों का ज़िक्र करते हैं। उनके यहां होली इश्क़ का इज़हार भी है और दिलों के ग़ुबार मिटाने का बहाना भी।

“मियां तू हम से न रख कुछ ग़ुबार होली में,

कि रूठे मिलते हैं आपस में यार होली में।”

ये सिर्फ़ शेर नहीं, बल्कि हिंदुस्तानी तहज़ीब का पैग़ाम है रंगों के बहाने दिलों को साफ़ करने का।

अमीर ख़ुसरो की होली – इश्क़ से इबादत तक

अगर नज़ीर की होली ज़मीन की ख़ुशबू है, तो अमीर ख़ुसरो की होली आसमान की रोशनी। ख़ुसरो, जो हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के मुरीद और आशिक़ थे, उन्होंने होली को सूफ़ी रंग में रंग दिया।

“आज रंग है ऐ मां, रंग है री…”

ये सिर्फ़ एक गीत नहीं, बल्कि रूह की पुकार है। दिल्ली की निज़ामुद्दीन दरगाह में आज भी यह कलाम अदब और मोहब्बत के साथ गाया जाता है। कहा जाता है कि जिस दिन ख़ुसरो अपने पीर से मिले, वो दिन होली का था। उसी मुलाक़ात की मस्ती और रूहानी सरूर ने “आज रंग है” जैसी अमर रचना को जन्म दिया।

ख़ुसरो के लिए रंग सिर्फ़ गुलाल नहीं था, बल्कि इश्क़-ए-इलाही का रंग था। वे कहते हैं।

“शाह निज़ाम के रंग में, कपड़े रंग के कुछ न होत है,

या रंग में तन को डुबोया री।”

यहां रंग तन पर नहीं, मन पर चढ़ता है। सूफ़ी रिवायत में होली बसंत और इश्क़ की मिसाल बन गई। ख़ुसरो ने हिंदवी भाषा में कृष्ण, कन्हैया और फाग के गीत लिखे। ये उस दौर की गंगा-जमुनी तहज़ीब का शानदार नमूना था, जहां सूफ़ी मठों में भी होली खेली जाती थी।

 फ़ागुन की बहार और सूफ़ियाना होली  

दरगाहों की होली और रिवायत

दिल्ली की दरगाहों में आज भी गुलाबजल और फूलों की पंखुड़ियों से होली खेली जाती है। कहा जाता है कि ख़ुसरो गुलाब के रंग और फूलों की खुशबू से होली मनाते थे। ये होली शोर-शराबे से नहीं, बल्कि क़व्वाली और दुआओं से सजी होती है।

सूफ़ी संतों ने होली को सिर्फ़ एक हिंदू पर्व के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे इश्क़ और इंसानियत का त्योहार माना। यही वजह है कि होली सूफ़ी सिलसिलों में भी रची-बसी। ख़ुसरो की रचनाएं आज भी देश-विदेश में गाई जाती हैं और हर बार वही रूहानी रंग बिखेरती हैं।

हिंदी-उर्दू साहित्य में होली

सिर्फ़ नज़ीर और ख़ुसरो ही नहीं, बल्कि कई बड़े कवियों ने होली पर अपनी कलम चलाई। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने “मार दी तुझे पिचकारी” में श्रृंगार और लज्जा की कोमल छटा दिखाई। फणीश्वर नाथ रेणु ने होली को दुखों को भुलाने का बहाना बताया “इसी बहाने क्षण भर गा लें…”। हरिवंशराय बच्चन ने तो पूरे विश्व को होली के रंग में रंगने का सपना देखा “विश्व मनाएगा कल होली!”

लेकिन नज़ीर और ख़ुसरो की बात कुछ और है। नज़ीर की होली में ज़िंदगी की गूंज है, तो ख़ुसरो की होली में रूह की आवाज़।

रंग से परे एक पैग़ाम

होली दरअसल रंगों का नहीं, रिश्तों का त्योहार है। यह मन की मैल धोने का दिन है। नज़ीर कहते हैं रूठे यार भी मिलते हैं होली में। ख़ुसरो कहते हैं पीर के रंग में डूब जाओ, वही असली रंग है।

आज जब समाज कई तरह की दीवारों में बंटा दिखाई देता है, तब नज़ीर और ख़ुसरो की होली हमें याद दिलाती है कि हिंदुस्तान की असली पहचान उसकी गंगा-जमुनी तहज़ीब है। यहां रंग सिर्फ़ चेहरे पर नहीं, दिलों पर भी चढ़ते हैं।

ये भी पढ़ें: होली(Holi): मिलन, मस्ती, मिठास और रंगों का त्योहार

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