पंद्रहवीं सदी के आख़िर में अमृतसर के पास एक गांव में भैंसें चराने वाला एक बच्चा ऐसा सवाल पूछ बैठा, जो बड़े-बड़े लोग भी नहीं सोचते। वो जानना चाहता था कि मौत के डर से कैसे बचा जाए? जिस शख़्स से उसने पूछा, वो थे Guru Nanak Dev जी — सिख मज़हब के बानी। उस वक़्त तक Guru Nanak Dev जी अपनी चार बड़ी यात्राएं पूरी कर चुके थे और पूरे मुल्क़ में रब के नाम और इंसानियत का पैग़ाम फैला चुके थे। सफ़र के बाद वो करतारपुर में रहने लगे, जो आज पाकिस्तान में है। वहां रोज़ हज़ारों लोग उनसे मिलने आते, कीर्तन सुनते, लंगर खाते और उनकी मौजूदगी में दिली सुकून महसूस करते।
इन हज़ारों लोगों में से इतिहास ने सिर्फ़ बीस लोगों को ख़ास तौर पर याद रखा। सिख Bhai Gurdas Ji ने अपनी लिखावट में उन लोगों का ज़िक्र किया, जिन्होंने रूहानी बुलंदी हासिल की थी। उस फेहरिस्त में अठारहवें नंबर पर थे Baba Budha जी। भाई गुरदास जी ने उनके बारे में लिखा — “बुढा एक मन होकर रब का सिमरन करता है।” ये छोटी-सी लाइन उनकी पूरी ज़िंदगी की इबादत और सेवा को बयान करती है।
बचपन में मिली बड़ी समझ
महान कोश के मुताबिक Baba Budha जी की पैदाइश 22 अक्टूबर 1506 को अमृतसर के पास कथू नंगल गांव में हुई थी। उनके वालिद का नाम भाई सुंघे रंधावा और वालिदा का नाम माता गौरां था। घरवालों ने उनका नाम बुरा रखा था। कुछ अरसे बाद उनका परिवार रामदास गांव में आकर बस गया। वहीं खेतों में भैंसें चराते हुए उनकी पहली मुलाक़ात गुरु नानक देव जी से हुई।
उस वक़्त उनकी उम्र करीब 11 या 12 साल थी। गुरु नानक गांव के पास रुके हुए थे। छोटा बुरा वहां पहुंचा, उनकी बातें सुनी और उन बातों ने उसके दिल पर गहरा असर छोड़ा। इसके बाद वो अक्सर गुरु जी के पास जाने लगा और ख़ामोशी से बैठकर उनकी वाणी सुनता।
एक दिन वो गुरु जी के लिए दूध का कटोरा लेकर आये और बोले, “गरीबों के सहारे, मुझे आपके दर्शन हो गए हैं। अब मेरा जन्म और मौत का चक्कर ख़त्म कर दीजिए।” गुरु नानक मुस्कुराए और उससे नाम और काम पूछा। फिर प्यार से बोले कि इतनी छोटी उम्र में बच्चों को खेलने-कूदने और खाने-पीने की फ़िक्र करनी चाहिए। मौत और निजात जैसी बातें बड़े लोग सोचते हैं। अभी तुम छोटे हो, बड़े होकर आना।

लेकिन बुरा का जवाब सुनकर हर कोई हैरान रह गया। उसने कहा कि कुछ दिनों पहले पठान सिपाही गांव से गुज़रे थे और उन्होंने खेतों की सारी फसल काट दी थी — पकी हुई भी, कच्ची भी और आधी उगी हुई भी। तब से वो सोच रहा था कि मौत भी ऐसे ही आती है। वो छोटे-बड़े किसी को नहीं छोड़ती। जब कोई पठानों को नहीं रोक पाया, तो मौत को कौन रोकेगा? हो सकता है कि वो बूढ़ा होने तक ज़िंदा ही न रहे। इसलिए वो अभी से इसका जवाब जानना चाहता है। गुरु नानक ये सुनकर ख़ुश हुए। उन्होंने कहा, “तुम बच्चे नहीं हो। तुम्हारी सोच बुज़ुर्गों जैसी है। तुम तो अभी से बूढ़े हो।”
फिर गुरु जी ने समझाया कि रब मौत से भी बड़ा है। जो इंसान रब से जुड़ जाता है, उसे मौत का डर नहीं सताता। हर वक़्त रब का नाम लो, उसकी बनाई दुनिया से मोहब्बत करो और लोगों की ख़िदमत करो। जब दिल में रब का डर और मोहब्बत बस जाएंगी, तब मौत का डर भी ख़त्म हो जाएगा। उसी दिन से गुरु नानक ने उसे “बुढ़ा” कहना शुरू कर दिया। तभी से वो Baba Budha जी के नाम से मशहूर हो गए।
गुरुओं की ख़िदमत में गुज़़री ज़िंदगी
बाबा बुड्ढा जी ने अपनी पूरी ज़िंदगी गुरु नानक की सेवा में लगा दी। वो करतारपुर में रहकर खेती करते, संगत की ख़िदमत करते और रब का नाम लेते। उन्होंने सिख मज़हब की तीन अहम बातें अपने अमल से दिखाई — रब का नाम लो, मेहनत से रोज़ी कमाओ और दूसरों के साथ बांटकर खाओ।
जब गुरु नानक देव जी ने Guru Angad Dev Ji को अगला गुरु बनाने का फ़ैसला किया, तब बाबा बुड्ढा जी उन चुनिंदा लोगों में थे जो आख़िर तक गुरु जी के साथ रहे। गुरु नानक ने उनसे कहा, “तुम कभी मेरी नज़रों से दूर नहीं रहोगे।” गुरु अंगद देव जी को गुरुगद्दी देने के वक़्त तिलक लगाने का सम्मान बाबा बुड्ढा जी को मिला। बाद में यही इज़्ज़त उनके ख़ानदान को भी मिलती रही।
उन्होंने लगातार पांच गुरुओं को तिलक लगाया — गुरु अंगद देव जी, गुरु अमर दास जी, गुरु राम दास जी, गुरु अर्जन देव जी और आगे भी गुरुओं की सेवा करते रहे। सिख तारीख़ में ये सम्मान किसी और को नहीं मिला।
हर मुश्किल में गुरु के साथ
जब गुरु अंगद देव जी, गुरु नानक के देहांत के बाद एकांत में चले गए थे और संगत उन्हें ढूंढ नहीं पा रही थी, तब लोग Baba Budha जी के पास पहुंचे। बाबा जी ने रातभर इबादत और सिमरन किया और उन्हें पता चल गया कि गुरु जी खडूर साहिब में माई भिराई के घर में हैं। अगले दिन वे संगत को वहां ले गए। बाद में जब गुरु अमर दास जी भी छिपकर रहने लगे, तब Baba Budha जी ने उन्हें भी ढूंढ निकाला और संगत के सामने आने के लिए राज़ी किया।
जब गुरु अर्जन देव जी ने अमृतसर में Sri Darbar Sahib की तामीर शुरू करवाई, तब Baba Budha जी ने पूरा इंतज़ाम संभाला। वो मज़दूरों और सेवकों की निगरानी करते थे। Baba Budha जी का बेरी का पेड़ आज भी श्री दरबार साहिब की परिक्रमा की उत्तर-पूर्वी दिशा में मौजूद है। इस बेरी के पेड़ के नीचे बैठकर वे संगत से ठीक से सेवा लेते थे और राज्य के कर्मचारियों को वेतन बांटते थे। Baba Budha जी श्री दरबार साहिब के पहले मुख्य ग्रंथी भी बने। गुरु ग्रंथ साहिब की स्थापना के बाद पहला हुक़मनामा भी उन्होंने ही लिया।
श्री दरबार साहिब की सेवा पूरी करने के बाद बाबा जी ने दूसरी सेवा संभाली। अमृतसर ज़िले के गांव झबल के पास गुरु जी को बहुत सारी ज़मीन तोहफ़े में दी गई थी। यहां गुरु साहिब का सामान चरता था। इसे बीर कहते थे। इस बीर और इसमें रखे सामान की देखभाल Baba Budha जी को सौंपी गई थी। बाबा जी ने अपनी ज़िंदगी का ज़्यादातर हिस्सा इसी बीर में गुरु घर की सेवा में बिताया।

वो घास काटते थे और गुरु जी के घोड़ों, गायों और भैंसों को चारा खिलाते थे। इसीलिए वो खुद को गुरु जी का घा (घास काटने वाला) कहते थे। यह बीर Baba Budha जी की बीर या बाबा की बीर के नाम से मशहूर हुई। यहां इस नाम का एक ऐतिहासिक गुरुद्वारा भी है।
इसी बीर में श्री गुरु अर्जन देव जी की पत्नी माता गंगा जी ने Baba Budha जी की सेवा में हाज़िरी लगाई थी और उन्हें एक बेटा हुआ था जो एक महान योद्धा था। गुरु जी का खुद माता गंगा जी को ऐसा वरदान न दे पाना और उन्हें Baba Budha जी की शरण में भेजना न सिर्फ़ यह दिखाता है कि गुरु जी कितने विनम्र थे, बल्कि यह भी दिखाता है कि गुरु जी और भगवान की नज़र में Baba Budha जी कितने ऊंचे और काबिल थे। गुरु के घर में उनकी इतनी इज़्ज़त थी कि श्री गुरु अर्जन देव जी ने उन्हें अपने बेटे श्री हरगोबिंद साहिब को पढ़ाने का काम सौंपा।
Baba Budha जी ने श्री हरगोबिंद साहिब को गुरमुखी गुरबानी और गुरु का इतिहास सिखाया, साथ ही घुड़सवारी, हथियार, कुश्ती भी सिखाई। बाद में, Baba Budha जी ने श्री गुरु हरगोबिंद साहिब के बेटों को भी सिखलाई दी।
जब बादशाह जहांगीर ने गुरु हरगोबिंद साहिब को ग्वालियर किले में क़ैद किया, तब Baba Budha जी ने संगत तक गुरु जी की ख़ैरियत पहुंचाई। उसी दौरान उन्होंने दरबार साहिब में शाम की चौकियों और शबद-कीर्तन की रिवायत शुरू की, जो आज भी जारी है।
जब माता गंगा जी गुज़र गईं, तो Baba Budha जी ने श्री गुरु हरगोबिंद साहिब से गुज़ारिश की, “आप जंग की तैयारी कर रहे हैं। मैं अब बूढ़ा हो गया हूं और मेरा शरीर जंग में हिस्सा लेने के लायक नहीं है। कृपया मुझे बीर जाकर सेवा करने की इजाज़त दें।” गुरु जी ने इजाज़त दे दी और बाबा जी फिर झबल के पास बीर चले गए। जब श्री गुरु हरगोबिंद साहिब ब्यास नदी के किनारे श्री गुरु अर्जन देव जी के बसाए शहर हरगोबिंदपुर में रहने चले गए और उन्हें वहाँ युद्ध करना पड़ा, तो बाबा बुड्ढा जी उनसे मिलने श्री हरगोबिंदपुर गए।
उसी समय Baba Budha जी ने गुरु हरगोबिंद जी से विनती की कि अब मैं बहुत बूढ़ा हो गया हूं, कृपया मुझे बीर की सेवा से छुट्टी दें और मुझे अपने गांव रामदास जाने दें और अपने जीवन के आख़िरी दिन भजन और बंदगी करते हुए बिताने दें। साथ ही, वादा करें कि जब मैं दर्शन के लिए प्रार्थना करूंगा, तो आप ज़रूर आएंगे। गुरु हरगोबिंद जी ने वादा किया कि जब भी आप बुलाएंगे, मैं आपके पास ज़रूर आऊंगा। गुरु जी की इजाज़त लेकर, बाबा जी रामदास में रहने चले गए और भजन और बंदगी में व्यस्त हो गए।

आखिरी वक़्त
साल 1631 में, 125 साल की उम्र में Baba Budha जी ने गुरु हरगोबिंद साहिब को बुलाया। गुरु जी उनके पास पहुंचे। बाबा जी ने अपने बेटे भाना का हाथ गुरु जी के हाथ में देकर कहा कि उसे अपनी पनाह में रखिए। इसके बाद उनकी इच्छा के अनुसार, उन्होंने 125 साल की उम्र में गुरु हरगोबिंद जी के पवित्र हाथों में अपना शरीर छोड़ दिया।
गुरुओं को Baba Budha जी से बहुत प्यार था और गुरु हरगोबिंद महाराज जी को Baba Budha जी से इतना ज़्यादा प्यार था कि जब उन्होंने बाबा जी के शरीर को चिता पर रखा, तो उनकी मोती जैसी आंखों से पानी की दो बूंदें गिरीं।
जब गुरु जी ने Baba Budha जी की चिता को आग दी, तो उनकी आंखों से दो आंसू निकल पड़े। जिस इंसान ने अपनी पूरी ज़िंदगी छह पीढ़ियों के गुरुओं की सेवा में गुज़ार दी, उनके बनाए निज़ाम को संभाला, उनके बच्चों को तालीम दी और सिख मज़हब की बुनियाद मज़बूत की उसके लिए गुरु की आंखों से निकले वो दो आंसू ही सबसे बड़ा एहतराम थे।
स्टोरी: असिस्टेंट प्रोफ़ेसर रविंदर सिंह
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