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अब्दुर्रहमान मोमिन: “चांद में तुझे देखा था…” नई नस्ल की शायरी का चमकता नाम 

उर्दू अदब की नई पीढ़ी में कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने कम उम्र में ही अपनी पहचान बना ली। उन्हीं युवा शायरों में एक अहम नाम है अब्दुर्रहमान मोमिन का। उनका असली नाम सैयद अब्दुर्रहमान अल-मोमिन है, लेकिन अदबी दुनिया उन्हें अब्दुर्रहमान मोमिन के नाम से जानती है। अब्दुर्रहमान की पैदाइश 21 जुलाई 1996 को ऐसे परिवार में हुई, जहां इल्म और अदब की रिवायत पहले से मौजूद रही है। यही वजह है कि बचपन से ही उनके अंदर शायरी और साहित्य के प्रति रुचि पैदा हुई।

उन्होंने कराची की जामिया यूनिवर्सिटी से बीए ऑनर्स की पढ़ाई की। पढ़ाई के साथ-साथ उनका रिश्ता अदबी दुनिया से लगातार मज़बूत होता गया। वे मशहूर बच्चों के रिसाले ‘माह-नामा साथी’ के एडिटोरियल बोर्ड से भी जुड़े रहे। इसके अलावा उन्होंने Radio Pakistan के लोकप्रिय कार्यक्रम “बज़्म-ए-तलाबा” में भी हिस्सा लिया। आजकल वह एक निजी चैनल पर साहित्यिक कार्यक्रम होस्ट कर रहे हैं, जहां उनकी बातचीत और अंदाज़ लोगों को खूब पसंद आता है।

अब्दुर्रहमान मोमिन ने 2011 में शायरी लिखना शुरू किया। बहुत कम समय में उन्होंने कराची के युवा शायरों में अपनी ख़ास जगह बना ली। उनकी शायरी पर Mirza Ghalib और Allama Iqbal जैसे महान शायरों का असर साफ़ दिखाई देता है। हालांकि वे किसी एक ख़ास विधा तक सीमित नहीं हैं, लेकिन उनकी ग़ज़लों में भावनाओं की गहराई और सादगी सबसे ज़्यादा नज़र आती है।

उनकी शायरी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह मुश्किल अल्फ़ाज़ के बजाय आसान ज़बान में गहरी बातें कह देते हैं। उनकी ग़ज़लें मोहब्बत, तन्हाई, रिश्तों और जिंदगी की सच्चाइयों को बेहद खूबसूरती से बयान करती हैं। 

“ज़माने को ज़माने की पड़ी है
हमें वादा निभाने की पड़ी है”

अब्दुर्रहमान मोमिन

इस शेर में आज के दौर की खुदगर्ज़ी और इंसानी रिश्तों की अहमियत दोनों झलकती हैं। इसी तरह उनका एक और शेर लोगों के दिल को छू जाता है।

“ये दुनिया चांद पर पहुंची हुई है
तुझे लाहौर जाने की पड़ी है”

अब्दुर्रहमान मोमिन

इस शेर में हल्के अंदाज़ में समाज की सोच और इंसानी उलझनों को बयान किया गया है।

अब्दुर्रहमान मोमिन की शायरी में मोहब्बत का एहसास भी बहुत गहरा है। उनका यह शेर आज के युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय है।

“जिस रास्ते में तुम मिल जाओ
वो रास्ता मंज़िल होता है”

अब्दुर्रहमान मोमिन

कम शब्दों में मोहब्बत की इतनी खूबसूरत तस्वीर पेश करना उनकी ख़ास पहचान बन चुका है।

उनकी शायरी सिर्फ़ इश्क तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इंसान की अंदरूनी भावनाओं और अकेलेपन को भी बयान करती है। 

“खुद को कितना भुला दिया मैंने
तू भी अब अजनबी सा लगता है”

अब्दुर्रहमान मोमिन

यह शेर रिश्तों में बदलते एहसास और वक़्त की दूरी को बहुत सादगी से पेश करता है।

अब्दुर्रहमान मोमिन आज उर्दू शायरी की नई आवाज़ माने जाते हैं। उनकी ग़ज़लों में परंपरा की खूबसूरती भी है और नए दौर की सादगी भी। यही वजह है कि युवा पीढ़ी उनके कलाम से खुद को जुड़ा हुआ महसूस करती है। कम उम्र में उन्होंने जिस तरह अपनी पहचान बनाई है, वह आने वाले समय में उन्हें उर्दू अदब का एक बड़ा नाम बना सकती है।

ये भी पढ़ें: वहीद जहां बेग़म: तालीम के ज़रिए समाज बदलने वाली शख़्सियत

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