‘दै पानी, एरिर कानी यानी जहां दही ठंडक देता है, वहीं एरी रेशम का कपड़ा बख़्शता है गर्मी और सुकून। ये कहावत है असम की, जिसने रेशम की उस अनोखी किस्म को जन्म दिया, जिसे दुनिया ‘अहिंसा सिल्क’ या ‘एरी सिल्क’ (‘Ahimsa Silk’ or ‘Eri Silk’) के नाम से जानती है।
भारत रेशम का जन्नत है। यहां मुलबेरी, तसर, मूगा और एरी,हर किस्म अपनी एक अलग रवायत लिए है। लेकिन इन सब में एरी रेशम (‘Eri Silk’) का मुकाम सबसे मुनफ़रद (अनोखा) है। क्योंकि यह वो रेशम है, जहां रेशम के कीड़े को ज़िंदा जलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। यही वजह है कि आज पूरी दुनिया के सस्टेनेबल फैशन (टिकाऊ फैशन) का दिल इसी की धड़कन सुनता है।

एरी सिल्क का : कौन सा राज्य है मशहूर?
अगर किसी एक राज्य का नाम लें जो एरी सिल्क का गढ़ हो, तो वो है असम। हां, असम न सिर्फ भारत का सबसे बड़ा एरी सिल्क उत्पादक राज्य (Eri Silk Producing States) है, बल्कि यहां की पहचान, यहां की मिट्टी और यहां की औरतों की उंगलियां इस रेशम से सजी हैं। Central Silk Board के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि नॉर्थईस्ट इंडिया में जितना नॉन-मुलबेरी रेशम होता है, उसमें असम का हिस्सा सबसे बड़ा है। और एरी सिल्क के मामले में तो असम बेताज बादशाह है।
‘एरी’ नाम कहां से आया?
‘एरी’ शब्द असमिया के ‘एरा’ से बना है, यानी अरंडी का पौधा (रिसिनस कम्युनिस)। इसकी पत्तियां एरी के रेशम के कीड़े (सामिया रिसिनी) की खुराक हैं। ये कीड़ा सिर्फ अरंडी की पत्तियां खाता है। यही वजह है कि असम में हर गांव, हर छोटी ज़मीन पर अरंडी आसानी से उग जाती है।
एरी ही ‘अहिंसा सिल्क’ क्यों?
ये सवाल सबसे बड़ी हकीकत छुपाता है।
दुनिया के ज़्यादातर रेशम (जैसे मुलबेरी) में कोकून को उबाला जाता है, जबकि उसके अंदर ज़िंदा प्यूपा (कीड़े का बच्चा) होता है। इसे ‘सिल्क पर हिंसा’ भी कहा जाता है।
लेकिन एरी सिल्क में कहानी बिल्कुल उलट है। यहां कीड़े को पूरी तरह बड़ा होने दिया जाता है। वो कोकून तोड़कर तितली बनकर उड़ जाता है (पतंगा बनकर)। उसके बाद जब खाली कोकून बचता है, तब उसे इकट्ठा करके काता (Spinning) जाता है।
यही वजह है कि एरी को ‘अहिंसा सिल्क’ कहा जाता है। ये पूरी तरह क्रूरता-मुक्त रेशम है। बुद्धिस्ट भिक्षु और जैन समुदाय भी इसी रेशम को अपनाते हैं।

‘पूरब का ऊन’ क्यों है ख़ास?
एरी रेशम की बनावट बाक़ी रेशमों से बिल्कुल जुदा है।
- यह चमकदार नहीं, बल्कि मैट फिनिश वाला होता है।
- छूने में रुई और ऊन के बीच का एहसास देता है।
- गरमी में ठंडा और जाड़े में गर्म-यानी हर मौसम में सुकून।
- बेहद मज़बूत, लचीला और पसीना सोखने वाला।
असम की बुजुर्ग औरतें कहती हैं: ‘एरी का चादर ओढ़ लो, तो अलावा की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।’

असम की ‘रंगीन’ परंपरा
एरी सिर्फ कपड़ा नहीं, असम की सांस्कृतिक पहचान है। हर असमिया घर में औरतें चरखे और हथकरघे पर एरी बुनती हैं। बिहू हो या विवाह, हर शुभ मौके पर एरी का चादर (शॉल) गिफ्ट किया जाता है। इसे ‘देखाउ’ नहीं, बल्कि दिल का उपहार माना जाता है।
आज असम के सिवसागर, लखीमपुर, दरांग और सोनितपुर जिलों में हज़ारों परिवार अरंडी उगाते हैं, कीड़े पालते हैं, रेशम कातते हैं और हथकरघे पर शॉल, स्टोल, साड़ी और जैकेट बनाते हैं।
मॉडर्न वर्ल्ड ने पहचाना एरी का ‘किरदार’
पिछले कुछ सालों में ग्लोबल फैशन ब्रांड न्यूयॉर्क से लंदन तक, एरी की तरफ़ मुतवज्जह (Attract) हुए हैं। क्यों?
- इको-फ्रेंडली: 100% प्राकृतिक, बिना रसायन के।
- जीरो क्रूएल्टी : पशु-प्रेमी और जैन समाज में ख़ास पसंद।
- रोज़गार : गांव की औरतों को आत्मनिर्भर बनाता है।
प्रधानमंत्री ने भी ‘मन की बात’ में एरी सिल्क का ज़िक्र कर इसे ‘वोकल फॉर लोकल’ का बेहतरीन उदाहरण बताया।

कैसे बनता है एरी सिल्क?
- अरंडी के पत्ते उगाए जाते हैं।
- उन पर एरी का कीड़ा (सामिया रिसिनी) पाला जाता है।
- कीड़ा कोकून बनाता है, फिर तितली बनकर उड़ जाती है।
- खाली कोकून को हाथ से काता जाता है (स्पिनिंग)।
- धागा तैयार होता है: हथकरघे पर बुनाई : तैयार है एरी सिल्क।
आख़िर में…
असम ने हमें वो रेशम दिया है, जो जानवरों का दर्द नहीं ख़रीदता, बल्कि गांव की औरतों की इज़्ज़त और हुनर को सलाम करता है। एरी सिल्क सिर्फ कपड़ा नहीं, ये एक फलसफा है।
फलसफा अहिंसा का, हरियाली का, और हस्तशिल्प की ज़िंदा परंपरा का।
तो अगली बार जब आप रेशम ख़रीदें, तो एरी को हाथ लगाइए। गर्मी हो या जाड़ा ये वो ‘लिबास’ है, जो आपको तो सजाएगा ही, साथ में पूरे असम का दिल भी जीत लेगा।
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