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2600 साल पहले प्लास्टिक सर्जरी करने वाले सुश्रुत को दुनिया के सबसे पुराने सर्जिकल कॉलेज ने कहा ‘Father of Plastic Surgery’

इमेजिन.. एक ऐसा वक्त जब यूरोप में अंधविश्वास का राज था, जब बीमारी को देवकोप या जादू-टोना माना जाता था। उसी दौर में भारत में एक चिकित्सक थे, जो न सिर्फ 1,120 बीमारियों के बारे में जानकारी दे रहे थे। बल्कि 300 से ज़्यादा सर्जिकल प्रोसेस और 120 सर्जिकल उपकरणों के बारे में जानकारी रहे थे। वे थे महर्षि सुश्रुत।

एडिनबर्ग की रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स (Royal College of Surgeons of Edinburgh) जिसे दुनिया की सबसे पुरानी सर्जिकल कॉलेज माना जाता है, ने सुश्रुत की 90 किलो की कांस्य प्रतिमा (Bronze statue) स्थापित की है। उन्होंने सुश्रुत को ‘Father of plastic surgery’ कहकर सम्मानित किया है। इससे पहले The Royal Australasian College of Surgeons in Melbourne  भी ऐसा कर चुकी है।

ये दोनों महाद्वीप, दोनों संस्थान एक ही परिणाम पर पहुंचे हैं, सर्जरी का इतिहास सुश्रुत के बिना अधूरा है।

Image-wikipedia

सुश्रुत संहिता: एक अद्भुत चिकित्सा विश्वकोश

सुश्रुत संहिता केवल एक किताब नहीं, बल्कि चिकित्सा विज्ञान का Encyclopedia है। ये दो भागों में है पहली पूर्वतंत्र और दूसरी उत्तरतंत्र। इसमें सर्जरी, औषधि, बालरोग, विष विज्ञान, मनोचिकित्सा, नेत्र-कर्ण-नासा रोग, वृद्धावस्था देखभाल, सब कुछ  है।

लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि सुश्रुत ने प्लास्टिक सर्जरी की तकनीकें सदियों पहले डेवलप कर ली थीं। नाक, कान, होंठ की Reconstructive surgery जिन्हें आधुनिक चिकित्सा 20वीं सदी में समझ पाई, उनका विवरण 600 ईसा पूर्व में ही मिल जाता है।

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चीरा-फाड़ से लेकर सिलाई तक

सुश्रुत ने सर्जरी को 8 कैटेगरी में बांटा:

  • अपहरण (Excision)
  • अपच्छेदन (Incision)
  • वेधन (Puncturing)
  • अनुवेधन (Probing)
  • अपनयन (Extraction)
  • विस्रावण (Drainage)
  • स्यूत (Suturing)
  • तंतुकरण (Suturing with thread)

उन्होंने 120 से ज़्यादा सर्जिकल उपकरणों का वर्णन किया। जिनमें चिमटी, चाकू, खोखली सुइयां, लेंस, प्रोब शामिल हैं। ये उपकरण आज भी अपने मूल रूप में यूज किए जाते हैं।

जलन से लेकर मधुमेह तक

सुश्रुत ने जलन, लू लगना, शीतदंश और बिजली से होने वाली चोटों के बारें में बताया है। ऐसी अवधारणा जो आधुनिक सर्जरी में बहुत बाद में आई। उन्होंने मधुमेह (Diabetes), मोटापा और हृदय रोग का भी उल्लेख किया और बताया कि ये लाइफ स्टाइल से रीलेट करती हैं। जो आज के वैज्ञानिक शोध से पूरी तरह मेल खाता है।

पश्चिम से 1000 साल पहले

फ्रैंक मैकडॉवेल ने अपनी पुस्तक ‘The Source Book of Plastic Surgery’  में लिखा है:

“सुश्रुत की सभी पुष्पमय भाषा, मंत्रों और अप्रासंगिकताओं के बीच, एक महान सर्जन की अमिट छवि चमकती है। अपनी असफलताओं से अविचलित, अपनी सफलताओं से अप्रभावित, उन्होंने अथक रूप से सत्य की खोज की और उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया।”

ये सच है कि सुश्रुत ने हिप्पोक्रेट्स से 1000 साल पहले और गैलेन व सेल्सस से 2000 साल पहले ये सभी सर्जरी कीं। ये फैक्ट वेसटर्न वर्ल्ड के लिए आज भी हैरान कर देने वाला है। 

IIT में नया चैप्टर 

अब भारतीय संस्थान इंडियन नॉलेज सिस्टम (IKS) पर गंभीर शोध कर रहे हैं:

  • आईआईटी रुड़की ने चिकनगुनिया में गौ-आधारित फॉर्मूलेशन पर शोध किया
  • आईआईटी मंडी ने पारंपरिक भारतीय संगीत के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव का अध्ययन किया—जिसमें ध्यान और एकाग्रता में अभूतपूर्व बढ़ोतरी पाई गई।

एक विरासत जो सीमाओं से परे

सुश्रुत ने अपने गुरु से सीखा, उसे प्रेक्टिकल बनाया और फिर आने वाली पीढ़ियों के लिए लिखकर छोड़ा। यही भारतीय ज्ञान परंपरा की सबसे बड़ी ताकत है, श्रुति से स्मृति तक का सफर।

आज एडिनबर्ग, मेलबर्न, लंदन, जहां देखो, वहां सुश्रुत की प्रतिमाएं। ये केवल मूर्तियां नहीं, बल्कि उस ज्ञान का प्रतीक हैं जो कालजयी है।

क्या हम सच में उस विरासत को समझ पा रहे हैं जो हमारे पास है? क्या हम उस ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से जोड़ पा रहे हैं?

‘जहां रास्ता नहीं था, वहां उन्होंने रास्ता बनाया।’

ये पंक्ति सुश्रुत पर ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय ज्ञान परंपरा पर लागू होती है। अब समय आ गया है कि हम उस रास्ते पर चलें, जो हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए बनाया था और उसे नई ऊंचाइयों तक ले जाएं।

ये भी पढ़ें:   गंडिकोटा-दिगुवापट्टनम की गुफाओं में मिला 10 लाख साल पुराना रहस्य,मद्रास यूनिवर्सिटी के छात्र की चौंकाने वाली खोज 

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