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‘ऐब-ए-रवां’ से ‘बाफ़्त-हवा’ तक : वो भारतीय शान जिसने मुगलों को दीवाना बनाया, मलमल जिसे देख यूरोप हैरान रह गया

वो जादुई कपड़ा जो महज़ अंगूठी से गुज़र जाता था, जिसे देख यूनानी यात्री हैरान रह गए, और जिसकी चमक ने मुगल बादशाहों का दिल चुरा लिया।

भारत सिर्फ ज़मीन का टुकड़ा नहीं है, ये तहज़ीबों की वो दास्तां है जहां हर रेशे में इतिहास बसता है। चाहे वो मसाले हों, चाहे बर्तन, या फिर वह अनमोल चीज़ जिसे हम ‘बाफ़्त-हवा’(Baft Hawa)  कहते हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं मलमल (Muslin) की। वो कपड़ा जिसे देखकर यूरोपीय सौदागरों (European merchants) की आंखें ठहर जातीं और मुगल दरबार की रानियां इसे पहनकर फख्र महसूस करती थीं।

जब कपड़ा हवा सा लगे

अगर आप ये सोचें कि इतना महीन कपड़ा कैसे होता है, तो एक किस्सा याद आता है। एक पूरी साड़ी का वज़न 100 ग्राम से भी कम होता था। यानी चार-पांच बड़े आम से भी हल्की। ये कपड़ा इतना नरम और शफ़्फ़ाफ़ था कि कई गज़ मलमल आसानी से एक अंगूठी के अंदर से गुजर सकती थी। यही वजह है कि इसे लोग ‘ऐब-ए-रवां’ (Aab-e-Rawan) यानी बहता पानी और ‘बाफ़्त-हवा’ (woven air) कहते थे। हवा को जैसे बुन दिया गया हो। 

क्या सिर्फ कपड़ा था, या कोई सोने का तमगा?

मलमल (Muslin) आम आदमी के बस की बात नहीं थी। मुगल बादशाह अकबर से लेकर औरंगजेब तक (Mughal Emperors from Akbar to Aurangzeb), हर बादशाह को ये दीवानगी सी थी। ये गरमी में ठंडक देता और ठंड में हल्कापन। इसे देखकर यकीन नहीं होता था कि ये इंसानी हाथों ने बुना है। फ्रांस और इंग्लैंड की रानियां इसके लिए सोने के मोल लेती थीं। हां, आपने सही सुना- ये सोने के बराबर की कीमत रखता था।

जब यूनानी इतिहासकार मेगस्थनीज रह गया हैरान

भारत की इस शान का जिक्र हमें सिर्फ किताबों में ही नहीं, बल्कि विदेशी यात्रियों के दिलों में भी मिलता है। यूनानी इतिहासकार मेगस्थनीज (Greek historian Megasthenes) ने चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में आकर देखा तो हैरान रह गया। उसने लिखा ‘यहां के लोग ऐसे कपड़े पहनते हैं जैसे बादलों की परत हो।’ इतना ही नहीं, बंगाल की मिट्टी से निकली मूरतों (टेराकोटा) में भी इस कपड़े के निशान मिलते हैं।

अंग्रेजों की बर्बादी: जो हवा थी, वो धूल हो गई

जब अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी आई, तो उसने इस अनोखी कारीगरी को बर्बाद कर दिया। उन्होंने मशीनों का बाजार लगा दिया और बंगाल के उन जादूगर बुनकरों को गरीब बना दिया जिनके हाथों में बाफ्त-हवा जन्म लेती थी। ‘फूटी कर्पास’ (Phuti Karpas) नाम का वो ख़ास कपास का पौधा, जो सिर्फ ब्रह्मपुत्र के किनारे पनपता था, वीरान हो गया। धीरे-धीरे, मलमल ने अपना वजूद खो दिया।

आज की कोशिश: 1200 के धागे की तलाश

आज 21वीं सदी में मलमल को दोबारा जिंदा करने की जद्दोजेहद चल रही है। असली मलमल में 1200 धागों (thread count) की बारीकी हुआ करती थी। आज अच्छे से अच्छे मशीनी कपड़े में 80 धागे होते हैं। भारत और बांग्लादेश के कुछ कारीगरों ने 700 तक पहुंचने की कोशिश कर ली है, लेकिन असली ‘बाफ्त-हवा’ अब भी सिर्फ यादों में रह गया है।

यूनेस्को ने अब इस कला को World Heritage का दर्जा दे दिया है (UNESCO has now granted World Heritage status to muslin art form)। शायद एक दिन फिर वो घड़ी आएगी जब हम अपनी विरासत के उस धागे को थाम सकेंगे।

हम हारे क्यों?

सच पूछिए तो, भारत ने मलमल नहीं खोया, भारत ने अपनी पहचान की बारीकी खो दी। ये सिर्फ एक कपड़ा नहीं है, ये एक तहज़ीब का नक्शा है। बाफ्त-हवा हमें याद दिलाता है कि इस ज़मीन ने कभी सिर्फ साम्राज्य नहीं चलाए, बल्कि हवा को कपड़े की सूरत दी थी।

आज जब आप किसी महीन सूती कुर्ते को छूएं, तो रुकिएगा, सोचिएगा-क्या ये उस मलमल जैसा है, जिसे देख मुगल शहंशाह भी कहते थे ‘वाह!’

क्या आप जानते हैं ? क्या आपको पता है? ‘मसलिन’ नाम मोसुल (इराक) से आया, जहां यूरोपीय लोगों ने इसे पहली बार खरीदा। लेकिन हम भारतीय इसे हमेशा ‘मलमल’ कहेंगे क्योंकि ये हमारे ख्वाबों की भाषा है।

ये भी पढ़ें:  हीरे के पेपरवेट और 50 Rolls-Royce वाले बादशाह: जब TIME मैगज़ीन ने निज़ाम को कहा था ‘The World’s Richest Man’

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