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 मोहम्मद हुसैन आज़ाद: “आब-ए-हयात” से उर्दू को नई ज़िंदगी देने वाले शायर

उर्दू अदब की तारीख़ में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने सिर्फ़ किताबें नहीं लिखीं, बल्कि पूरी तहज़ीब और ज़बान को नई दिशा दी। ऐसा ही एक नाम है मोहम्मद हुसैन आज़ाद। वह सिर्फ़ शायर या लेखक नहीं थे, बल्कि उर्दू ज़बान के ऐसे रहनुमा थे जिन्होंने अदब, तन्क़ीद, नज़्म और नसर को एक नई पहचान दी।

मोहम्मद हुसैन आज़ाद की पैदाइश 5 सितंबर 1830 को दिल्ली में हुयी। उनके वालिद मौलवी मोहम्मद बाक़र उर्दू पत्रकारिता के शुरुआती दौर के बड़े नामों में शामिल थे। उन्होंने “देहली उर्दू अख़बार” नाम का अख़बार शुरू किया था, जो उत्तर भारत का पहला उर्दू अख़बार माना जाता है। लेकिन 1857 की जंग-ए-आज़ादी के दौरान अंग्रेज़ों ने उन्हें बग़ावत फैलाने के इल्ज़ाम में फांसी दे दी। यह हादसा छोटे हुसैन आज़ाद की ज़िंदगी पर बहुत गहरा असर छोड़ गया।

आज़ाद की वालिदा का इंतिक़ाल बचपन में ही हो गया था। पहले मां का साया उठा और फिर बुआ भी दुनिया से रुख़्सत हो गईं, जिन्होंने उन्हें पाला था। इन दुखों ने उनके दिल में तन्हाई और दर्द भर दिया। लेकिन शायद यही दर्द आगे चलकर उनकी तहरीरों की जान बन गया।

वह दिल्ली कॉलेज में तालीम हासिल कर रहे थे, तभी मुल्क की हालत बिगड़ने लगी। अंग्रेज़ी हुकूमत का ज़ुल्म बढ़ रहा था और 1857 की लड़ाई ने सब कुछ बदल दिया। उनके वालिद गिरफ़्तार हो चुके थे और खुद आज़ाद को छिप-छिपकर ज़िंदगी गुज़ारनी पड़ी। कई बार भूख, डर और बेबसी का सामना करना पड़ा। कुछ समय तक वह लखनऊ में रिश्तेदारों के यहां रहे और फिर लाहौर चले गए।

लाहौर में उन्होंने पोस्ट ऑफ़िस में छोटी नौकरी से शुरुआत की। बाद में डायरेक्टर पब्लिक इंस्ट्रक्शन के दफ़्तर में काम मिला। लेकिन असली मोड़ तब आया, जब “अंजुमन-ए-पंजाब” की स्थापना हुई। वहां उन्हें सेक्रेटरी बनाया गया। यही वह जगह थी जहां मोहम्मद हुसैन आज़ाद की इल्मी और अदबी सलाहियत खुलकर सामने आई। बाद में उन्हें गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर में उर्दू और फ़ारसी का प्रोफे़सर भी नियुक्त किया गया।

मोहम्मद हुसैन आज़ाद ने उर्दू अदब को सिर्फ़ अल्फ़ाज़ की खूबसूरती तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने उर्दू नज़्म को नई सोच और नया रास्ता दिया। उस दौर में ज़्यादातर शायरी इश्क़ और रूमानी एहसास तक सीमित थी, लेकिन आज़ाद चाहते थे कि शायर समाज, इंसान और ज़िंदगी की बात भी करें। उन्होंने मुशायरों में नए विषयों पर शायरी की परंपरा शुरू की ताकि अदब आम लोगों से जुड़ सके।

उनकी तहरीरों में सादगी, रवानी और दिलकशी थी। वह मुश्किल बात को भी आसान अंदाज़ में कहने का हुनर रखते थे। यही वजह है कि उनकी किताबें आज भी दिलचस्प लगती हैं। उनकी मशहूर किताब “आब-ए-हयात” उर्दू अदब की सबसे अहम किताबों में गिनी जाती है। यह सिर्फ़ उर्दू शायरी की तारीख़ नहीं, बल्कि एक ज़िंदा दस्तावेज़ है जिसमें पुराने शायरों की ज़िंदगी, उनकी महफिलें और उस दौर की तहज़ीब सांस लेती हुई महसूस होती है।

इसके अलावा “सुख़नदान-ए-फारस”, “क़िसस-ए-हिंद”, “दरबार-ए-अकबरी”, “नैरंग-ए-ख़याल” और “सैर-ए-ईरान” जैसी किताबें भी उनकी इल्मी गहराई का सबूत हैं। “सैर-ए-ईरान” में उन्होंने अपने सफ़र के अनुभव इतने खूबसूरत अंदाज़ में लिखे कि पाठक खुद को ईरान की गलियों में महसूस करने लगता है।

मोहम्मद हुसैन आज़ाद सिर्फ़ बड़े लेखक ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन शिक्षक भी थे। उन्होंने बच्चों के लिए उर्दू की किताबें लिखीं, जो कई पीढ़ियों तक पढ़ाई जाती रहीं। उनका मानना था कि ज़बान सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का ज़रिया नहीं, बल्कि सोच और तहज़ीब की पहचान होती है।

उन्होंने यह भी कहा कि उर्दू की जड़ें ब्रज भाषा में हैं और उर्दू को दूसरी भाषाओं, ख़ासकर अंग्रेज़ी से सीखना चाहिए। उस दौर में यह सोच काफी नई और अलग मानी जाती थी।

ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में उनकी सेहत खराब रहने लगी। बीवी के इंतिक़ाल ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया। धीरे-धीरे उनका मानसिक संतुलन भी प्रभावित होने लगा। लेकिन इसके बावजूद उनकी इल्मी और अदबी पहचान कभी कम नहीं हुई।

22 जनवरी 1910 को लाहौर में उनका इंतिक़ाल हुआ। उन्हें दाता गंज बख़्श के करीब सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। एक अजीब इत्तेफ़ाक यह भी रहा कि जिन अंग्रेज़ों ने उनके वालिद को फांसी दी थी, उन्हीं अंग्रेज़ों ने बाद में मोहम्मद हुसैन आज़ाद को “शम्स-उल-उलेमा” का ख़िताब देकर सम्मानित किया।

आज भी मोहम्मद हुसैन आज़ाद का नाम उर्दू अदब में बड़े एहतराम से लिया जाता है। उन्होंने उर्दू को सिर्फ़ एक ज़बान नहीं रहने दिया, बल्कि उसे एक ज़िंदा तहज़ीब और सोच में बदल दिया। उनकी तहरीरें आज भी नई पीढ़ी को यह एहसास दिलाती हैं कि इल्म, अदब और सोच इंसान को हमेशा ज़िंदा रखते हैं।

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