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एक नूर ते सब जग उपज्या

पंजाब के अमृतसर जिले के सरियाली कलां के रहने वाले जगराज सिंह ने जब अपना जीवन गुरुद्वारे की सेवा के लिए समर्पित करने का मन बनाया तो उनकी उम्र कुल सत्रह साल की थी. तब तक दाढ़ी-मूंछ भी नहीं आई थी। पंजाब की गर्म आबोहवा से 1998 के साल सेवाकार्य के लिए जगराज सिंह सैकड़ों किलोमीटर दूर उत्तराखंड के गोविन्दघाट पहुंचे (Govindghat gurudwara in Uttrakhand)। पवित्र हेमकुंड साहिब से 19 किलोमीटर दूर, पान्डुकेश्वर नामक विख्यात तीर्थ के समीप स्थित गोविन्दघाट बद्रीनाथ यात्रा का भी एक प्रमुख पड़ाव माना जाता रहा है। गोविन्दघाट से आगे पहले 13 किलोमीटर दूर घांघरिया (जिसे अब गोविन्द धाम कहा जाता है) और वहां से छः किलोमीटर की चढ़ाई के बाद तीर्थयात्री अपने गंतव्य तक पहुँच पाते हैं।

हेमकुंड साहिब- image-wikipedia

1930 के दशक में हेमकुंड साहिब के निर्माण के साथ ही इस दुर्गम तीर्थ के निकट ऐसे स्थान की आवश्यकता गहराई से महसूस की जाने लगी थी जहाँ दूर-दराज़ से आने वाले श्रद्धालुओं को विश्राम, भोजन और आश्रय मिल सके। उन दिनों न सड़कें थीं, न यात्रियों के लिए कोई व्यवस्थित व्यवस्था. ऊँचे पहाड़ों, घने जंगलों, बर्फीले रास्तों और अनिश्चित मौसम के बीच यह यात्रा अत्यंत कठिन मानी जाती थी।

गुरु गोविन्द सिंह जी के पूर्वजन्म से जुड़े इस पवित्र तपोस्थान की खोज और उसके निर्माण में जिन संतों का सबसे बड़ा योगदान रहा, उनमें बाबा सोहन सिंह और बाबा मोदन सिंह का नाम अत्यंत श्रद्धा से लिया जाता है। इन्हीं संतों ने सबसे पहले गोविन्दधाम और बाद में गोविन्दघाट में गुरुद्वारों की स्थापना की नींव रखी।

उस समय गोविन्दधाम से श्री हेमकुंड साहिब तक कोई बना-बनाया रास्ता नहीं था. लोगों को जंगलों, चट्टानों और झाड़ियों के बीच से अपना रास्ता स्वयं बनाना पड़ता था। श्रद्धालुओं की कठिनाइयों को देखकर बाबा मोदन सिंह जी ने गोविन्दधाम से हेमकुंड साहिब तक पैदल मार्ग बनाने का संकल्प लिया। प्रतिदिन कठिन श्रम के बाद वे वापस गोविन्दधाम लौटते और रात पेड़ों के खोखलों में बिताते, क्योंकि वहाँ रहने के लिए कोई आश्रय उपलब्ध नहीं था। जंगली जानवरों से भरे उस निर्जन इलाके में कभी-कभी उन्हें अपनी बंदूक से फायर कर पशुओं को दूर भगाना पड़ता था। भोजन के नाम पर वे चना, गुड़ और पानी से ही काम चला लेते थे।

गोविन्दघाट- Image-wikipedia

1944-45 में उन्होंने ठेकेदार श्री हयात सिंह भंडारी की सहायता से गोविन्दघाट में एक गुरु-स्थान बनवाया. तभी से वहाँ नियमित रूप से कीर्तन, कथा और अरदास होने लगी. श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए उन्होंने दो कमरे भी बनवाए – एक यात्रियों के लिए और दूसरा अपने लिए. वे प्रायः वहीं रहकर यात्रियों की सेवा और देखभाल करते थे।

उन्होंने अनुभव किया कि पैदल चलकर घांघरिया पहुँचते-पहुँचते यात्री पूरी तरह थक जाते थे। इसलिए गोविन्दधाम में भी विश्राम-स्थल बनाना आवश्यक था. बाबा मोदन सिंह जी ने संत थंडी सिंह जी को इसके लिए प्रेरित किया। दिल्ली की संगत से चंदा एकत्र किया गया और दोनों संतों के संयुक्त प्रयासों से गोविन्दधाम में भी यात्रियों के लिए एक कमरा बन सका।

गोविन्दघाट गुरूद्वारा

धीरे-धीरे यह छोटा-सा पड़ाव तीर्थयात्रियों के लिए जीवनदायी आश्रय में बदलने लगा। बाबा मोदन सिंह जी इस बात से अत्यंत प्रसन्न थे कि अब तपोस्थान आने वाले श्रद्धालुओं के लिए गोविन्दघाट और गोविन्दधाम, दोनों स्थानों पर रहने की व्यवस्था उपलब्ध हो गई थी। पर उनकी चिंता यहीं समाप्त नहीं हुई। उन्होंने महसूस किया कि यात्रियों के लिए चाय और लंगर की व्यवस्था भी उतनी ही आवश्यक है। इसके लिए उन्होंने अपने मित्रों, शुभचिंतकों और अपनी खेती की उपज बेचकर प्राप्त धन से चंदा जुटाया तथा दोनों स्थानों पर लंगर की परंपरा आरम्भ कर दी।

इन संतों की तपस्या, सेवा और त्याग ने ही आगे चलकर हेमकुंड साहिब यात्रा की बुनियादी संरचना तैयार की। आज हजारों श्रद्धालु जिस सुविधा के साथ इस पवित्र धाम तक पहुँचते हैं, उसके पीछे बाबा मोदन सिंह और उनके साथियों का अद्भुत परिश्रम, साहस और निस्वार्थ सेवा छिपी हुई है।

Image-wikipedia

वर्तमान में गोविन्दघाट का गुरुद्वारा इलाके भर में अपनी सेवा-भावना के लिए जाना जाता है। जिन जगराज सिंह का ज़िक्र इस आलेख के शुरू में किया गया था, वे आज गोविन्दघाट गुरुद्वारे के सहायक प्रबंधक हैं और लंगर की देखरेख करते हैं। वे बताते हैं कि गुरुद्वारे के परिसर में हर रोज पांच हज़ार यात्रियों के ठहरने और खाने की व्यवस्था उपलब्ध है। इतने बड़े पैमाने पर व्यवस्था करने के लिए दूर-दूर से दानदाताओं का योगदान आता रहता है। फिलहाल गुरुद्वारे के मुख्य प्रबंधक सरदार सेवा सिंह हैं जबकि बिजनौर से ताल्लुक रखने वाले मनोज सिंह ग्रंथी हैं।

स्थानीय गैर-सिख जनता का भी गुरुद्वारे की व्यवस्था को सुचारु रखने में लगातार सहयोग रहता है. इस सिलसिले में जगराज सिंह स्थानीय लोगों में से उन जयदीप भंडारी का नाम लेना नहीं भूलते जिनके दादा हयात सिंह भंडारी ने हेमकुंड साहब के निर्माण का कार्य संपन्न कराया था।

जगराज सिंह, सहायक प्रबंधक, गोविंदघाट गुरुद्वारा

वर्तमान में प्रत्येक यात्रा सीज़न के दौरान इस गुरुद्वारे में करीब ढाई लाख लोग आकर ठहरते और प्रसाद चखते हैं। मैं जगराज सिंह जी से विदा ले रहा होता हूँ कि सामने से एक बेहद निर्धन व्यक्ति गुरुद्वारे के परिसर में प्रवेश करता नज़र आता है। मैं देखता हूँ बिना देर किये उसे लंगर की तरफ ले जाया जा रहा है।

“हमारे यहाँ सब बराबर हैं! यही गुरुबानी भी है”  कहते हुए जगराज सिंह विदा कहते हैं. गुरुद्वारे की दीवार पर भी यही सन्देश लिखा हुआ है –

अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बंदे

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Ashok Pande
Ashok Pandehttp://kabaadkhaana.blogspot.com
अशोक पांडे चर्चित कवि, चित्रकार और अनुवादक हैं। उनका प्रकाशित उपन्यास ‘लपूझन्ना’ काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा है। पहला कविता संग्रह ‘देखता हूं सपने’ 1992 में प्रकाशित। जितनी मिट्टी उतना सोना, तारीख़ में औरत, बब्बन कार्बोनेट अन्य बहुचर्चित किताबें। कबाड़खाना नाम से ब्लॉग kabaadkhaana.blogspot.com। अभी हल्द्वानी, उत्तराखंड में निवास।

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