उत्तराखंड में ऐसी अनूठी परम्पराएं विद्यमान हैं जिनमें अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक धाराएँ सदियों से एक-दूसरे में घुल-मिलकर इस हिमालयी इलाके की एक नई पहचान रचती रही हैं. पौड़ी जिले के एकेश्वर क्षेत्र के बिजौली, हलूणी, पीपली और खुटेटा जैसे गाँव सिख नेगियों की परंपरा के प्रमुख केंद्र हैं। ये लोग गुरु नानक देव जी के अनुयायी हैं, लेकिन पंजाब के पारंपरिक सिखों जैसी बाहरी पहचान – केश, दाढ़ी या पगड़ी – नहीं रखते. इन्हें सहजधारी सिख कहा जाता है। सदियों से गढ़वाली समाज में पूरी तरह समाहित होने के बावजूद उन्होंने गुरु नानक की शिक्षाओं को अपनी आस्था का मूलभूत हिस्सा बनाए रखा है।
इस परंपरा को समझने के लिए सबसे पहले नेगी नाम को जानना आवश्यक है। नेगी गढ़वाल और कुमाऊँ दोनों क्षेत्रों में एक प्रतिष्ठित राजपूत उपनाम है। यह कोई एकल जाति नहीं, बल्कि विभिन्न क्षत्रिय कुलों द्वारा धारण किया जाने वाला सम्मानजनक पदनाम रहा है। राजशाही काल में ‘नेगी’ राज्य प्रशासन का महत्वपूर्ण पद था।
इतिहासकार डॉ. शिव प्रसाद डबराल ‘चारण’ अपनी पुस्तक उत्तराखंड का इतिहास में उल्लेख करते हैं कि प्राचीन संभ्रांत परिवारों के प्रतिनिधियों को राजमंत्रणा में स्थान मिलता था और उन्हें नेगी की उपाधि दी जाती थी। यह पद मुख्यतः वंशानुगत होता था, परंतु राजा विशेष सेवाओं के बदले किसी योग्य व्यक्ति को भी यह सम्मान दे सकते थे।
नेगी शब्द की उत्पत्ति पर विद्वानों के अलग-अलग मत हैं। कुछ इसे प्राचीन नागवंशी समुदायों से जोड़ते हैं, जिनका इस क्षेत्र में प्रभुत्व माना जाता है। आज भी कई नाग मंदिर इसकी गवाही देते हैं। दूसरा विचार यह है कि यह फारसी अथवा तुर्की शब्द ‘नागी’ से निकला, जिसका अर्थ विशेष अधिकार प्राप्त व्यक्ति होता है. कुलिंद, कत्यूर, खस और पंवार राजवंशों के काल में प्रशासनिक या सैन्य सेवाओं में उत्कृष्ट योगदान देने वालों को यह पद मिलता था।
इन्हीं नेगियों की एक विशिष्ट शाखा सिख नेगी कहलाती है। लोककथाओं के अनुसार उनके पूर्वज लगभग 300-400 वर्ष पहले गढ़वाल आए. माना जाता है कि गुरु नानक देव जी की हिमालयी यात्रा के दौरान, जिसे उनकी तीसरी उदासी बताया जाता है, उनके कुछ अनुयायी यहीं बस गए। गुरु जी के उत्तराखण्ड की अल्मोड़ा, बागेश्वर, हरिद्वार और उधम सिंह नगर जैसी बसासतों तक पहुंचने के ऐतिहासिक संदर्भ उपलब्ध हैं। यह कदाचित संभव है कि उस समय की धार्मिक और राजनीतिक अस्थिरता के कारण कुछ सिख परिवार पहाड़ों में सुरक्षित आश्रय की तलाश में आए हों।

जो भी हो, उस युग में गुरु नानक जी की वाणी को अपनाने वाले ये लोग गढ़वाली समाज में सहजता से घुल-मिल गए। उनके विवाह अन्य गढ़वाली राजपूत परिवारों के साथ होते हैं, वे स्थानीय पंडितों-पुरोहितों की सेवाएँ लेते हैं, और कुलदेवता, कुलदेवी, ग्राम देवता तथा इष्ट देवताओं की पूजा ठीक उसी श्रद्धा से करते हैं जैसी अन्य गढ़वाली परिवार करते हैं।
इस समन्वय का सबसे सुंदर प्रमाण इन गाँवों में गुरुद्वारा और मंदिरों का सह-अस्तित्व है। हलूणी में गुरुद्वारे में अरदास होती है तो उससे सटे हुए हिन्दू मंदिर में देवी-देवताओं की पूजा। स्थानीय परंपरा के अनुसार पंजाब से आए दयाल सिंह नामक व्यक्ति ने करीब चार सौ वर्ष पहले इस आस्था को स्थानीय रीति-रिवाजों के साथ जोड़ा। बिजौली और हलूणी गाँव दो सगे भाइयों द्वारा बसाए गए माने जाते हैं।
बिजौली के गुरुद्वारे में हर वर्ष गुरु नानक जयंती पर बड़ा मेला लगता है। आरंभ में केवल गुरु का निशान स्थापित था; बाद में पंजाब के सिख समुदायों से संपर्क बढ़ने पर पूर्ण गुरुद्वारों का निर्माण हुआ।
पीपली सिख नेगियों का दूसरा महत्वपूर्ण गाँव माना जाता है। लोकविश्वास है कि गुरु नानक देव जी यहाँ पीपल के वृक्ष के नीचे विश्राम करते थे. यहाँ भी एक गुरुद्वारा है जिसकी लोक में बड़ी मान्यता है. खुटेटा और उसके आसपास के क्षेत्रों में भी यही सौहार्द देखने को मिलता है।
सिख नेगियों की यह परंपरा हिमालय की उस साझा विरासत को दर्शाती है जहाँ पहचानें कठोर सीमाओं में बंधी नहीं रहतीं. गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ जैसे एक ईश्वर, समानता, सेवा भाव, स्थानीय देवी-देवताओं में आस्था, स्थानीय रीति-रिवाज और सामाजिक ढाँचा – ये सब मिलकर एक शानदार बहुलतावादी धारा बन जाते हैं।
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