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कैसे सर सैयद अहमद ख़ान ने देश की टॉप यूनिवर्सिटी क़ायम की? चंदे के लिए घूघंरू बांध नाचना भी पड़ा

एक मदरसे से लेकर वर्ल्ड की फेमस यूनिवर्सिटी बनने तक का सफ़र अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने बख़ूबी तय किया है। एएएमयू से हर साल हज़ारों बच्चे हाई क्लास एजुकेशन पाकर निकलते हैं। लाखों बच्चें तालीम हासिल कर देश और दुनिया में नाम रोशन कर रहे हैं। भारत की आज़ादी से पहले ही एएमयू को ब्रिटिश काउंसिल में यूनिवर्सिटी का दर्जा मिला हुआ है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का क़याम साल 1875 में सर सैयद अहमद ख़ान ने किया था। उस वक़्त प्राइवेट यूनिवर्सिटी बनाने की इजाज़त किसी को नहीं मिलती थी इसलिए पहले इसे मदरसे के तौर पर क़ायम किया गया था।

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की तर्ज पर बना इदारा

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की आलीशान इमारत हूबहू कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की तर्ज पर ब्रिटिश राज के दौरान बनाई गई थी। ये उस वक़्त का पहला आला तालीमी इदारा था। यूनिवर्सिटी की इमारतों के नाम भी अज़ीम तरीन शख़्सियतों के नाम पर रखे गये हैं। इस फ़ेहरिस्त में मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी, सर सैयद हाउस, इंदिरा गांधी हॉल, सरोजिनी नायडू हॉल,बीआर अम्बेडकर हॉल और विकारुल मुल्क़ हॉल शामिल है। सर सैयद अहमद ख़ां के नाम पर भी सर सैयद हॉल है। अब इसे दो हिस्सों में बांट दिया गया। जिसमें से एक सर सैयद हॉल (नॉर्थ) और दूसरा सर सैयद हॉल (साउथ) शामिल है।

इस यूनिवर्सिटी के तामीरी सफ़र के लिए भीख मांगनी पड़ी

सर सैयद अहमद ख़ां ने बिलख़ुसूस हिंदुस्तानी आवाम और पूरी दुनिया को एक बड़ा नायाब तोहफ़ा यूनिवर्सिटी की शक्ल में दिया। इस इरादें को क़ायम करने में उनको बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के बनने का सफ़र इतना आसान नहीं था। सर सैयद अहमद ख़ां को यूनिवर्सिटी शुरू करने में काफी मशक़्क़त करनी पड़ी। यूनिवर्सिटी के लिए पैसों की कमी थी, जिसे भीख लेकर और नाच कर पूरा करना पड़ा।  

प्रोफेसर बद्रुदुज्जा ख़ान ने DNN24 से बात करते हुए एक वाक्ये का ज़िक्र किया। सर सैयद अहमद ख़ां किसी शख़्स से चंदा मांगने गए तो उसने जूता फेंककर मारा, तो उन्होंने उसी जूते को चंदा समझ कर रख लिया। सैयद को यहां तक की घुंघरू बांध कर नाचना पड़ा और यूनिवर्सिटी के लिए तवायफ़ों से भी चंदा लिया। सैयद हमेशा कहते थे मैं अपने लिए नहीं क़ौम के लिए चंदा मांग रहा हूं। पाई पाई जोड़ कर साल 1920 में यूनिवर्सिटी खड़ी कर दी।

कैसे बना MAO कॉलेज से AMU

पहले इस कॉलेज का नाम मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल (MAO) था, जिसे बाद में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के नाम से दुनिया भर में जाना जाने लगा। तालीम के मैदान में मुस्लिम कॉम्युनिटी की तरक़्क़ी सर सैयद का ख़्वाब उस वक़्त पूरा हुआ जब भारत के तत्कालीन वायसराय और गवर्नर जनरल लॉर्ड लिटन ने 8 जनवरी,1877 को एमएओ कॉलेज की बुनियाद रखी। साल 1920 में एमएओ कॉलेज को यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया गया। स्ट्रेची हॉल मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज के परिसर में बनने वाली पहली इमारत थी।

एएमयू का कैंम्पस हिंदुस्तान में मुसलमानों के दिलों पर नक़्श है। सर सैयद हॉल (साउथ) इलाके में स्ट्रेची हॉल, मुश्ताक़ मंज़िल, आसमान मंज़िल, निज़ाम म्यूज़ियम और लिटन लाइब्रेरी जैसी कई विरासत इमारतें शामिल हैं। इन इमारतों के अलावा, मशहूर विक्टोरिया गेट (1883) हॉल के साउथ में और जामा मस्जिद नॉर्थ वेस्ट में मौजूद है।

सर सैयद अहमद ख़ा का घर (सर सैयद हाउस)

सर सैयद अहमद ख़ान साहब बनारस से अपनी नौकरी से फ़ारिग़ होकर वापस आये तो साल 1876 में उनके बेटे सैयद महमूद ने सर सैयद साहब के लिए एक मकान ख़रीदा,जो आज सर सैयद हाउस के नाम से जाना जाता है। सर सैयद हाउस में सर सैयद अहमद ख़ां ने अपने ज़िंदगी के आख़िरी 20 साल बिताए। सर सैयद के इंतिक़ाल के बाद साल 1974 में सर सैयद अकादमी क़ायम हुई। इस मकान में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के बानी सर सैयद अहमद ख़ान की कुछ ज़ाती चीज़ें सोफा-सेट, वर्किंग टेबल, शॉल, वॉकिंग स्टिक और कंपास भी मौजूद है।

 Sir Syed Day पर Exhibition का आग़ाज़ होता है। उनके कमरे में कीमती चीज़ों में शुमार ख़त, Photographs और Campus life sir Syed period की तस्वीरें मौजूद है, जो शीशे के फ्रेम में महफ़ूज़ है। लोग इनको देखकर सर सैयद के ज़माने को तरोताज़ा करते है। सर सैयद ख़ां के चाहने वालों के लिए ये किसी तोहफ़े से कम नहीं है।

सर सैयद हाउस में बेशकीमती किताबें

हिंदुस्तान में Modern Education की मज़बूत बुनियाद रखने वाले सर सैयद अहमद ख़ां एक महान शिक्षाविद, दार्शनिक, समाज-सुधारक होने के साथ-साथ आला दर्जे के लेखक भी थे। उनके घर में बेशुमार कीमती किताबें मौजूद है। सैयद ने 100 से भी ज़्यादा किताबें लिखीं हैं, इसमें ‘हयात-ए-जावेद’, ‘तहज़ीब-उल-अख़्लाक़’, ‘मक़ालात-ए-सर सैयद’, ‘हयात-ए-सर सैयद’, ‘आसार-उस-सनादीद’, ‘महफ़िल-ए-सनम’ और ‘असबाब-ए-बग़ावत-ए-हिंद’ शामिल है।

सर सैयद अहमद ख़ान की यौमे पैदाइश को (Sir Syed Day) के तौर पर 17 अक्टूबर को जोश-व-ख़रोश के साथ मनाया जाता है। सुबह यूनिवर्सिटी मस्जिद में नमाज़ -ए-फ़ज्र अदा करने के बाद क़ुरआन-ख़्वानी होती है।  कुलपति, यूनिवर्सिटी के शिक्षकों और अधिकारियों के साथ ‘चादर पोशी’ की रिवायती रस्म के साथ सर सैयद की (कब्र) पर दुआ की जाती है और इस तरह सर सैयद डे की शुरूआत होती है।

कौन थे सर सैयद अहमद ख़ान

सर सैयद अहमद ख़ां ने भारत के मुसलमानों के लिए आधुनिक शिक्षा का आगाज़ किया था। हिन्दुस्तानी टीचर्स होने के साथ अपने वक्त के सबसे असरदार मुस्लिम नेता भी थे। खां ने उर्दू को भारतीय मुसलमानों की इजतेमाई ज़बान बनाने पर ज़ोर दिया था। सैयद अहमद ख़ान उस दौर के सबसे ज़हीन शख़्सियतों में से एक थे। गणित, चिकित्सा और साहित्य कई विषयों में महारत हासिल थी।  

सर सैयद अहमद की पैदाइश 17 अक्टूबर 1817 में दिल्ली के सैयद घराने में हुई थी। उनके वालिद (पिता) सैयद मुतक़्क़ी व्यक्तिगत रूप से शहंशाह अकबर II के सलाहकार थे। दादा सैयद हादी आलमगीर शाही दरबार में आला दर्जे पर आसीन थे और नाना जान ख़्वाजा फ़रीदुद्दीन शहंशाह अकबर II के दरबार में वज़ीर थे। इनका पूरा परिवार मुगल दरबार से जुड़ा हुआ था। उनकी वालिदा अज़ीज़ुन्निसा उस ज़माने की बहुत ही पावरफुल माहिला थीं। सर सैयद के इब्तिदाई ज़िंदगी पर अपने परिवार के लोगों का गहरा असर पड़ा। अहमद ने नाना ख़्वाजा फ़रीदुद्दीन से तालीम हासिल की और फिर अपने ख़ालू मौलवी खलीलुल्लाह की सोहबत में अदालती कामकाज सीखना शुरू किया।

इस सिलसिले में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के Public Relations Officer उमर सलीम पीरज़ादा ने DNN24 से बात करते हुए कहा कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के बानी सर सैयद अहमद ख़ां एक ऐसी अज़ीमुश्शान शख़्सियत थे जिन्होंने बताया कि आंधियों में चराग कैसे जलते हैं। सर सैयद ने ये सबक दिया कि इल्म के चराग से कितने घरों को रोशन कर सकते है और साथ में ये भी बताया कि ज़रूरत ही ईजाद की मां होती है।

”शाम दर शाम जलेगे तेरे यादों के चराग़

नस्ल दर नस्ल तेरा दर नुमायां होगा’’

सर सैयद को “सर” के ख़िताब से नवाज़ा 

सर सैयद को पहली नौकरी आगरा की अदालत में नायब मुंशी के तौर पर मिली और फिर दिन रात मेहनत करके तरक्क़ी पाते रहे। मैनपुरी और फतेहपुर सीकरी में भी सेवाएं दीं। इसके बाद दिल्ली में सदर-ए-अमीन हुए और बिजनौर में उसी पद पर रहे। मुरादाबाद में सद्रुस्सुदुर की हैसियत से तैनात हुए। यहां से गाज़ीपुर और फिर बनारस में नियुक्त रहे। इन इलाक़ो में बेहतरीन ख़िदमत की वजह से बहुत ख़ां मक़बूल रहे। ब्रिटिश गवर्मेंट ने सर सैयद अहमद ख़ां को साल 1888 में ‘सर’ के ख़िताब से नवाज़ा था।

एएमयू से की नामचीन हस्तियों ने पढ़ाई

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में सिर्फ भारत के ही नहीं बल्कि, पाकिस्तान समेत दुनिया की कई मशहूर हस्तियों ने पढ़ाई की है। भारत के राष्ट्रपति डॉ ज़ाकिर हुसैन और खान अब्दुल गफ्फ़ार ने इसी यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की थी। दोनों को ही भारत रत्न से सम्मानित किया जा चुका है। एएमयू से पढ़े हामिद अली अंसारी देश के उप राष्ट्रपति का पद संभाल चुके हैं। वहीं, पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली ख़ान भी एएमयू से तालीम हासिल कर चुके है।

प्रोफेसर इरफान हबीब, उर्दू शायर असरारुल हक मजाज़, शकील बदायूंनी, प्रोफेसर शहरयार यहीं से पढ़े हैं। हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यान चंद,  पूर्व क्रिकेटर लाला अमरनाथ, कैफी आज़मी, फेमस राइटर राही मासूम रज़ा, मशहूर गीतकार जावेद अख्तर के साथ ही फिल्म एक्टर नसीरुद्दीन शाह ने भी एएमयू से पढ़ाई की है। एएमयू से लाखों बच्चें तालीम हासिल कर देश दुनिया में नाम रोशन कर रहे हैं।

ये भी पढ़ें: ‘तहकीक-ए-हिंद’: उज़्बेकिस्तान में जन्मे अल-बीरूनी का हिंदुस्तान की सरज़मीं से ख़ास रिश्ता

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