शाह काज़िम क़लंदर सूफ़ी सिलसिले की एक बुलंद और रौशन शख़्सियत थे, जिनका नाम अदब, रूहानियत और इश्क़-ए-हक़ीक़ी के साथ बड़ी अकीदत से लिया जाता है। आप हज़रत शाह काशिफ़ चिश्ती के खुशक़िस्मत फ़रज़ंद(बेटा) थे और आपकी पैदाइश 17 रजब 1158 हिजरी को काकोरी (अवध) में हुई।
बचपन से ही आपकी शख़्सियत में नूरानी असरात नज़र आने लगे थे। आप बेहद ज़हीन, तेज़-हाफ़िज़ा, बुलंद हिम्मत और खुश-अख़लाक इंसान थे। साथ ही आप शरियत के पाबंद और दीन से गहरा लगाव रखने वाले थे। लोगों का कहना था कि कम उम्र में ही आपकी पेशानी पर विलायत और रहनुमाई के आसार झलकते थे।
तालीम और इल्म
शाह काज़िम क़लंदर ने अपनी शुरुआती तालीम मुल्ला अब्दुल अज़ीज़ काकोरी और मुल्ला हमीदुद्दीन काकोरी से हासिल की। इसके बाद उन्होंने आगे की पढ़ाई मुल्ला गुलाम यहया बिहारी और मुल्ला अहमदुल्लाह संदेली जैसे बड़े उलेमा से की। इल्म हासिल करने के दौर से ही उनका रुझान तसव्वुफ़ की तरफ़ था। वे पुराने और नए सूफ़िया की किताबों का गहरा मुताला करते और ख़ास तौर पर शाह वलीउल्लाह देहलवी की तहरीरों से बहुत मुतास्सिर थे।
रूहानी सफ़र और सिलसिला
आपको बैअत, इजाज़त और ख़िलाफ़त हज़रत शाह बासित अली क़लंदर इलाहाबादी से हासिल हुई। उन्होंने करीब 10 साल अपने पीर-ओ-मुर्शिद की ख़िदमत में गुज़ारे और तरीक़त के तमाम मराहिल को मुकम्मल किया। इस दौरान उन्होंने ज़िक्र, फ़िक्र और अस्मा-ए-इलाही की दावत जैसे रूहानी अमल सीखे। आख़िरकार उन्हें इजाज़त और ख़िलाफ़त से नवाज़ा गया और वो एक कामिल “आ’रिफ़ बिल्लाह” बनकर उभरे।
इसके बाद उन्होंने अपने वतन काकोरी में ही रहकर लोगों की रहनुमाई शुरू की। उनकी ख़ानक़ाह ख़ानक़ाह-ए-काज़िमिया न सिर्फ़ काकोरी बल्कि पूरे अवध में इल्म और रूहानियत का अहम मरकज़ बन गई। यहां दूर-दूर से लोग आते, उनकी सोहबत से फ़ैज़ हासिल करते और दीन और दुनिया की राह समझते।
शायरी और अदबी ख़िदमात
शाह काज़िम क़लंदर सिर्फ़ सूफ़ी बुज़ुर्ग ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन शायर और साहिब-ए-तसनीफ़ भी थे। उनकी मशहूर किताब “नग़्मातुल-असरार” है, जिसे “सांत-रस” के नाम से भी जाना जाता है। इसमें हिंदी और हिंदवी ज़बान में लिखा गया ऐसा कलाम है, जिसमें सूफ़ी तालीमात, इश्क़ और मआरिफ़ के गहरे रंग मौजूद हैं। उनकी शायरी में सादगी भी है और रूहानियत की गहराई भी।
“आंख खोल दिखते ‘काज़िम’ कां,
उठ गरे लागो कंवर कन्हाई।”
इन अशआर में इश्क़-ए-इलाही को बड़ी खूबसूरती से बयान किया गया है। उनकी शायरी में कभी विरह (जुदाई) का दर्द है, तो कभी मिलन (विसाल) की खुशी।
वफ़ात और मज़ार
हज़रत शाह काज़िम क़लंदर का इंतिक़ाल 21 रबीउल आख़िर 1221 हिजरी को हुआ। उस वक़्त आपकी उम्र करीब 62 साल थी। आपकी दरगाह ख़ानक़ाह-ए-काज़िमिया, काकोरी में मौजूद है, जहां एक खूबसूरत गुम्बद के नीचे आपका मज़ार शरीफ़ है। आज भी यहां अकीदतमंद हाज़िरी देते हैं और रूहानी सुकून महसूस करते हैं।
शाह काज़िम क़लंदर की ज़िंदगी इल्म, इश्क़ और इंसानियत का बेहतरीन संगम थी। उन्होंने अपनी तालीम, शायरी और रूहानी खिदमत के ज़रिये न सिर्फ़ अपने दौर को रौशन किया, बल्कि आने वाली नस्लों के लिए भी एक राह तय कर दी। उनकी शख़्सियत और कलाम आज भी दिलों को रोशन करते हैं और इंसान को खुदा की तरफ़ बुलाते हैं।
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