कभी-कभी एक छोटा सा फ़ैसला पूरी ज़िंदगी बदल देता है और कई ज़िंदगियों में रोशनी भर देता है। रांची के धुर्वा इलाके में ‘के.पी सर’ के नाम से मशहूर डॉ. के.पी. डे की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। उन्होंने तालीम को एक ऐसा मुक़द्दस काम बना दिया है, जहां इल्म बेचा नहीं जाता, बल्कि हर ज़रूरतमंद बच्चे तक पहुंचाया जाता है। साल 1982 में जब वो वेस्ट बंगाल से रांची घूमने आए, तो जगन्नाथ मंदिर के पास कुछ ग़रीब और मजबूर बच्चों को देखकर उनका दिल पसीज गया। उसी पल उन्होंने फ़ैसला कर लिया कि अब उनकी ज़िंदगी इन बच्चों के बेहतर मुस्तक़बिल के लिए समर्पित होगी।
चार बच्चों से सात सौ तक का सफ़र
एक पेड़ के नीचे सिर्फ़ चार बच्चों से शुरू हुआ ये छोटा सा कदम आज एक बड़ी तहरीक बन चुका है। आज Birsa Shiksha Niketan में 700 से ज़्यादा बच्चे तालीम हासिल कर रहे हैं। केपी. सर ने अपनी पूरी ज़िंदगी इस मक़सद के लिए समर्पित कर दी है। उन्होंने शादी नहीं की, ताकि पूरी तरह से समाज सेवा में लगे रह सकें। आज इस नेक काम में 35 से ज़्यादा लोग जुड़े हुए हैं। इस स्कूल में पढ़ाने वाले टीचर्स इसे नौकरी नहीं, बल्कि इबादत समझते हैं। आस्था सिन्हा, जो पिछले 10-11 साल से यहां पढ़ा रही हैं, कहती हैं कि ये काम उनके लिए सिर्फ़ पेशा नहीं, बल्कि दिल से की जाने वाली ख़िदमत है।

तालीम के साथ हर हुनर पर ध्यान
यहां बच्चों को सिर्फ़ किताबों तक सीमित नहीं रखा जाता। कंप्यूटर, म्यूज़िक, डांस और स्पोर्ट्स – हर फील्ड की तालीम दी जाती है। बच्चों के खेलने के लिए भी जगह है, ताकि उनका बचपन भी खुशहाल रहे। ये बच्चे अलग-अलग मुकाबलों में हिस्सा लेते हैं और अपनी काबिलियत से सबको हैरान कर देते हैं। यहां पढ़ने वाले ज़्यादातर बच्चे स्लम एरिया से आते हैं। आस्था सिन्हा बताती हैं कि उनके पैरेंट्स ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं। उनके आर्थिक हालात ठीक नहीं है, कोई ऑटो चलाता है, तो कोई घर-घर काम करता है। लेकिन हर मां-बाप की ख़्वाहिश है कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर बेहतर ज़िंदगी जिएं। के.पी. सर उनकी इसी ख़्वाब को हक़ीक़त में बदल रहे हैं।

समाज का भी साथ
इस मुहिम में समाज के कई लोग भी आगे आकर मदद कर रहे हैं। एचईसी के रिटायर्ड डीजीएम राजीव कुमार झा लाइब्रेरी संभाल रहे हैं, वहीं डॉ. आलोक कुमार जैसे डॉक्टर बच्चों को मुफ़्त इलाज दे रहे हैं। हर कोई अपने-अपने तरीके से इस नेक काम में हिस्सा डाल रहा है। के.पी. सर का ये सफ़र हर दिन नई उम्मीद पैदा करता है। ये कहानी हमें सिखाती है कि अगर नियत साफ हो और इरादा मज़बूत, तो एक अकेला इंसान भी सैकड़ों ज़िंदगियों में रोशनी भर सकता है। यहां तालीम सिर्फ़ किताबों तक नहीं, बल्कि इंसानियत और मोहब्बत भी सिखाई जाती है।
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